कुछ तो बदल रहा हैं हमारे दरमियाँ-दीप्ति सिंह

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कुछ तो बदल रहा हैं हमारे दरमियाँ   2015-04-17
क्या सच में ऐसा हैं
शायद इश्क़ की हवायें बदली हैं
या इश्क़ ने हवाओं का रूख बदला हैं
जो कभी बारिश सा भीगा देता था मुझे
आज वहीं गरमी के सूरज सा जलाने लगा हैं।।

शायद हमारे जज़्बात बदले हैं
या फिर जज़्बातो ने इश्क़ बदला हैं
कुछ चुभन सी हैं इन नज़दीकियों में
लगता हैं जैसे रिश्ता काँटे सा हो गया हैं
सुना था इश्क़ में काँटे भी गुलाब बन जाते हैं
यहाँ तो गुलाब काँटे में तब्दील हो गए

शायद हम बदले हैं तभी तुम बदले नज़र आते हो
जो कभी आँखों में पढ़ लेते थे तुम
शायद वो दर्द आज मेरे कहने पर भी नहीं समझ पाते हो
कुछ तो बदला नज़र और नज़रिए में

पहले कभी हम हुआ करते थे जिस इश्क़ में
अब सिर्फ़ तुम ही नज़र आते हो

सोचती हूँ इश्क़ से दूरी कर लूँ
ख़ुद से भी कुछ पल के लिए छुप जाती हूँ
इश्क़ में तुम्हारी रूसवाई को
दुनिया को इश्क़ के सबक़ की तरह सुनाती हूँ।

दीप्ति सिंह

 

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