क्यों वहशी हो गया समाज…?

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krishan gopal
उठा लो कोई भी अखबार,
कोई दिन हो कोई भी वार।
खबर एक हर रोज मिलेगी,
    ‘गैंगरेप या बलात्कार’
मिलकर सभी विचारें आज,
क्यों वहशी हो गया समाज ?
किसके मन में पाप पल रहा, मन के भीतर जाए कौन?
वारदात जब घर में हो तो किससे किसे बचाए कौन?
हथियारों की खेप पुलिस हर रोज पकड़ती रहती है,
कौन कलंकित करेगा कुल को, इसका पता लगाए कौन ?
रोगपूर्व उपचार ही है इस बीमारी का सही इलाज…
सभ्य-सुशिक्षित हों नर-नारी,बच्चे हों आज्ञाकारी,
मर्यादा का पाठ पढ़ाकर उन्हें बनाओ संस्कारी।
क्षमा करे जब स्मार्ट फोन में कामुकता का जलवा हो,
आप कहेंगे किस मुंह से कि युवको बनो ब्रह्मचारी।
न पहले सा खानपान है, न पहले सा रहा अनाज…
न पूरब वाले रह पाए, बने नहीं पश्चिम वाले,
बातें तिलक-जनेऊ की और हाथों में विष के प्याले।
बेशर्मी पसरी आंखों में हया-शर्म का नाम नहीं,
आजादी का अर्थ नहीं कि घर में डाका भी डालें।
खुद ही सोचो ले जाएंगे कहां ये जीने के अन्दाज…
यह भी सच है अब लोगों के पहले से हालात नहीं,
बदल गया ढांचा समाज का, पहले जैसी बात नहीं।
भौतिकता ने नैतिकता का पीट दिया है दीवाला,
बहन-बेटियों के बारे में पहले से जज्बात नहीं।
काश हों नर नारायण जैसे, नारी पहने सुख का ताज…
मिलकर सभी विचारें आज,
क्यों वहशी हो गया समाज ?
★★★कृष्ण गोपाल विद्यार्थी★★★

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