लघुकथा भिक्षा

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FLOODS

रात पति के साथ सैर करते हुए हम मन्दिर के समीप से निकले तो ठाकुरजी के दर्शन की अभिलाषा हुई और ठाकुरजी के दर्शन के लिए कदम मन्दिर में बढ़ने लगे लेकिन मन्दिर के बाहर लगभग ग्यारह ,बारह बच्चों को कटोरा हाथ में लेकर भिक्षा मांगते देख ह्रदय विचलित हो गया *खिलौनों* से खेलने की उम्र में भीख मांगने की जरूर कोई मजबूरी होगी।
   दर्शन करके वापस कुछ कदम ही बड़े होंगे कि पेड़ के पीछे बड़ी गाड़ी देखकर मन में शंका हुई और दोनों
कुछ टोह लेने की कोशिश करने लगे।
   गाड़ी में दो सूटेड बूटेड नौजवान आपस में बात कर रहे थे जिसे सुनकर
पैरों तले ज़मीन खिसक गई….मैडम के आने पर ही पता चलेगा कितनी कमाई हुई……तभी एक महिला जो देखने में सभ्य लगती थी उसके पीछे सारे बच्चे आते दिखाई दिए और सभी गाड़ी में  बैठ गए पलक झपकते ही गाड़ी आंखों से ओझल हो गई।
  बच्चों को अगवा करके उनसे भीख मंगवाने वाले और कोई नहीं समाज के ही कुछ सफेदपोश थे।
   समाज के ये भेड़िए भले ही समाज  की नजरों में कितने ही पाक साफ़ बन जाएं लेकिन  ऊपर वाले की नजर से नहीं बच सकते।
✍?नाम-दीपा संजय”*दीप*”

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