मानस मंथन- पुस्तक समीक्षा

0
18

IMG_9988

किसी भी रचना प्रक्रिया से गुजरते हुए बड़ी सजगता व सचेतनता की ज़रूरत होती है। मेरे ख्याल से हर आदमी हर क्षण सृजन कर रहा होता है। क्योंकि अनुभवों से उत्पन्न होने वाली उपलब्धि सब में अनिवार्यत: होती ही है। हर कोई अपनी-अपनी वास्तविकताओं से जूझ रहा है। अब यह जूझना और बने-बनाए ढांचों को तोड़ना ही तो नया रचना भी है। यानी जो अपने से बाहर निजी दुखों सुखों से बाहर जाकर जूझते, लड़ते और तोड़ते हैं वही असली रचनाकार कहलाने के हकदार हैं। जयप्रकाश मानस जी ने अपनी इस पुस्तक पढ़ते-पढ़ते लिखते-लिखते को एक नया नाम दिया। कवि की डायरी। डायरी लिखना वैसे ही जोखिम का काम है और अगर वह कवि की डायरी है तो व्यक्तिगत स्तर पर समग्रता और गहराई को अलग-अलग ढंग से उभारने का काम बड़ी ईमानदारी का तलब रखती है। एक सजग सचेतन लेखक ज़रूरी नहीं साहित्यकार का जामा पहने हो। पर वह अपने समय और समाज को बहुत कुछ बताना चाहता है। मनुष्य का आदिम स्वभाव है मूल्यों के आदान-प्रदान चेतना का विस्तार और मानवीय संस्कारों को दूसरों तक सम्प्रेषित करना। मैं समझती हूं अपने जुझारू संघर्ष में यात्रा को दर्ज करने की सबसे उत्तम विधा डायरी ही हो सकती है। हर व्यक्ति मूलत: रचनाकार ही होता है। अपने-अपने सृजन में लीन वह साहित्य भाषा या कला परोसे न परोसे, पर गहन चिंतन व समाधान तो ढूंढता ही रहता है।

जयप्रकाश मानस की इस पुस्तक पढ़ते-पढ़ते लिखते-लिखते के शीर्षक ने मुझे इसलिए भी प्रभावित किया कि साहित्य समाज के लिए मानस चाहे आज एक सुप्रसिद्ध लेखक, समाज चिंतक या सुप्रसिद्ध समीक्षक हों, वे अपने पाठक समाज को बड़ी ईमानदारी से यह बता देना चाहते हैं कि लिखने से पहले उन्होंने पढ़ने को चुना। मेरा अपना भी यही मानना है कि लिखने के अनुशासन से भी बड़ा श्रमसाध्य है पढ़ने का अनुशासन। क्योंकि पढ़ना एक तपस्या है। इस साधना के दौरान, आपने जो कुछ चिंतन, मनन और गुनन किया, उसे ठीक-ठीक छान कूट कर अपने पास अर्क-तर्क की तरह जो कुछ सहेज रखा वही अपने पाठक समाज को सम्प्रेषित किया। लेखन से पहले लेखक जूझता है कई प्रश्नों, कई विचारों और दृश्यों से। क्योंकि बार-बार पढ़ी गई पुस्तक और सूक्तियाँ विचार हमारे स्मृति संग्रहालय को समृद्ध करते हैं और तभी हम डायरी लिखने का जोखिम उठाते हैं। एक समय था जब डायरी को नितांत निजी और गोपनीय स्मृति चित्र के रूप में देखा जाता था। जयप्रकाश मानस इस दृष्टि से भी एक ईमानदार या कहूँ तटस्थ संलग्नता लिए हुए वह लेखक हैं जो अपनी भूमिका में स्वयं स्वीकार करते हैं -“इस डायरी में मेरी अपनी चाहतों और अप्रिय हालातों के मध्य उपस्थित बौद्धिक और रचनात्मक संसार का सारांश है। विशेषकर उन घटनाओं और प्रसंगों पर की गई टिप्पणियाँ, जिसे लिखे बगैर मैं स्वयं के हस्ताक्षेपी भूमिका को साबित नहीं कर सकता। वैसे यह दीगर बात हो सकती है कि इसमें से कुछ भी किसी पाठक के लिए प्रासंगिक ही न हो। फिर भी कम से कम मैं, अपनी छोटे से रचनात्मक जीवन की सिद्धि के लिए ज़रूरी तो मानता ही हूं। हां, मेरी साहित्यिक दुनिया की ताकझांक शायद ज़रूर हो बावजूद इसके इस डायरी में मेरा ‘मैं’ बहुत कम उपस्थित हुआ है।”

समकालीन साहित्यकारों को पढ़ने-गुनने और मानव भविष्य के प्रति उनकी पक्षधरता को जाँचने की प्रतिभा और सामर्थ्य जयप्रकाश मानस में है। यानी जीवन में जो अन्य अभिव्यक्तियाँ हैं, उनको अपनी बौद्धिक परिपक्वता से मानस मंथन करते हुए अपनी डायरी में उतारते हैं। प्राय: मैं कहा करती हूं कि रचना का सुख रचने में ही है। यानी जब हम रच रहे होते हैं तो यह चिंता और सरोकार बराबर हममें बनी रहती है कि जो कुछ रचा जा रहा है यह आखिर कबतक बचेगा? मेरे हिसाब से सृजनात्मकता का मतलब ही अमरत्व है। जो कुछ रचा गया, वह कितनों को बचाएगा। या कितनों को जड़ता से उबरने से या यथास्थिति से टकराने से जूझने का जज्बा देगा।

रचना किसी भी विधा में लिखी जा रही हो, हमें अपने समकालीनों से सीखना ही चाहिए। व्यक्ति प्राय: अपने वरिष्ठ, अग्रज या पूर्व से प्रेरणा लेता रहता है। पर जयप्रकाश मानस जी की तरह मेरा भी यही मानना है कि पहले लिखे-पढ़े पर बहस होनी चाहिए। रचना के अलग-अलग हिस्सों पर खुलकर बातचीत हो। उसे जाँचा और परखा जाए, फिर प्रकाशन में लाया जाए। रचनाकार पानी का बुलबुला नहीं होता कि बुदबुदाकर मिट जाए। उसे अपनी खुद-बुद आखिरी साँस तक बचाए रखनी चाहिए। यानी रचना और जीवन में किसी तरह का फांक न रहे। रचनाकार को जीना सीखने के लिए हास और करुणा को यानी हँसने और रोने के क्षण को भरपूर जीना चाहिए। उसमें निकलने की सोचना, वस्तुत: उस क्षण विशेष के सुख को खो देना है। दुख के आते ही छटपटाहट इतनी बढ़ जाती है कि दुख के क्षण को जिए बिना ही रचनाकार पन्नों पर उतार लेता है। मेरा अपना भी मानना है कि जो विकल नहीं है वो नया कल नहीं ला पाएगा। संदर्भों की वास्तविकता को समझने के लिए उसके अंतरर्विरोध को भी समझना ज़रूरी है। रचनाकार एक साथ कवि, आलोचक, कथाकार हो सकता है। उसके जीवित संदर्भ में वास्तविकताएं कितनी जीवित रह जाती हैं, यही उसे बड़ा लेखक बनाती है। प्राय: लेखक और आलोचक इसी में उलझे रहते हैं कि हमारा लेखन समाज को बदलकर रख देगा। देश दुनिया और समाज को बदलने वाले खुद में बदलाव की कभी कल्पना भी नहीं करते। कभी कोई सोचकर या इंडेक्स बनाकर रचना नहीं करता। अपने बने-बनाए खाकों और खाचों से ही इंडेक्स की ज़रूरत होती है। जयप्रकाश मानस एक स्थान पर लिखते हैं —“संवेदना एक झरना है जो केवल लेखन में नहीं, लेखक की वाणी और व्यवहार में भी कल-कलकर बहती हुई, उसे बाहर और भीतर से संपूर्ण बनाती है।XXXXXXXXX अब पाठकों/समीक्षकों/प्रकाशकों/आलोचकों/प्रशंसकों/प्रचारकों को कौन समझाते फिर कि अखबार पढ़कर उपन्यास लिखा जाता तो आज सभी पत्रकार उपन्यासखोर न होते।” जयप्रकाश मानस ने व्हाट्सअप के एक संदेश को भी हवाला दिया और अपनी डायरी में शामिल किया—“प्रशंसा से पिघलना मत और आलोचना से उबलना मत।”

व्यंग्य या कटाक्ष केवल असहमति व्यक्त करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। बल्कि जितना हो सके, झूठ का पर्दाफाश किया जाना चाहिए। किसी की पोल खोलना, किसी की टाँग खींचना अगर लोकप्रियता के पैमाने हैं तो अफसोस इसे मैं मानस मंथन नहीं कहूंगी। यह केवल मनोरंजन और मनभंजन है। जयप्रकाश मानस इससे बचते हैं। देश, दुनिया, समाज, व्यवस्था, सब पर इनकी छोटी-छोटी टिपप्णियां हैं। दिन तारीख की प्रमाणिकता दर्ज करते हुए, ऐसे कई स्मृति लेख इसमें संजोये गए हैं, जिनमें व्यक्ति और उनका व्यक्तित्व पूरी पारदर्शिता से उनमें मौजूद है। अपने तर्कों और तथ्यों के कारण ही कवि की डायरी ईमानदारी दस्तावेज बन पाई और जिसे मैंने मानस मंथन नाम दिया। ये टिप्पणियाँ एकबारगी देखने में बड़ी सपाट और सहज लगेंगी, लेकिन इन्हें लिखने में जिस दर्द का इन्हें अनुभव हुआ, मूल्यों के प्रति इनकी आस्था व्यंग्य में भी करूणा पैदा करने की जिद्द ही इनके लेखन की पहचान है। आज के समय में जब लोग खुद को उठाने में दूसरों को ध्वस्त करना, उनके प्रति अनास्था जागृत करना और उनपर तंज कसना नहीं भूलते, ऐसे समय में जयप्रकाश मानस अपने समकालीन कवि, लेखकों और साहित्यकारों की छोटी-छोटी स्मृतियों को, सूक्तियों को किसी न किसी बहाने अपनी डायरी में दर्ज करते हैं।

कई चीजों के विकल्प नहीं हैं

जैसे पत्थर आग या बारिश

तो यह असफल होना नहीं है

हमें पूर्वजों को प्रति नतमस्तक होना चाहिए

उन्हें जीवित रहने की अधिक विधियाँ ज्ञात थीं

जैसे हमें मरते चले जाने की ज्यादा जानकारियाँ है

किसी भी डायरी लेखक के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि वह आत्ममोह और दूसरों के सम्मोहन से बचा रहे। लेकिन समकालीनों की कमीबेशी को, दोस्त दुश्मन को, देश समाज को, स्वदेसी परदेसी को और सम्बन्धों की क्षीणता को अगर पहचान रहा है तो यह उसके लेखन की विशिष्टता है। फ़िराक गोरखपुरी के एक शेर को इस मानस मंथन का मैं समग्र समझती हूं

बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं

तूझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं

कवि की डायरी हो और कविताओं के कोटेशन न हों, इसकी तो कल्पना ही नहीं की जा सकती। इस पुस्तक में ऐसे कई कोटेशन मौजूद हैं जिनपर आपका ध्यान जाएगा।

फिर से वह हार गया आज

उदास है थोड़ा सा

फिर से वह जीतेगा कल

खुश है बहुत

उसने कमीबेशी का रखा नहीं हिसाब

खाता-बही नहीं जीवन की किताब

इन्हीं शब्दों के साथ जयप्रकाश मानस की रचनात्मक यात्रा के लिए हार्दिक शुभकामनाएं।

डॉ सुधा उपाध्याय

बी-3, टीचर्स फ्लैट

जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज

सर गंगाराम अस्पताल मार्ग

नई दिल्ली-110060

LEAVE A REPLY