लोककला जगत की पहचान थी -मांगीबाई आर्य

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    – कवि राजेश पुरोहित
राजस्थान के पीतापगढ़ की रहने वाली विश्व की ख्यातिप्राप्त लोक गायिका का गुरुवार को निधन हो गया। मांगीबाई के निधन से लोक कला जगत में शोक की लहर दौड़ गई। “केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देश” से मंत्रमुग्ध कर देने वाली गायिका न केवल भारत मे अपितु विदेशों में भी जानी जाती थी। उनकी गायकी में गजब का जादू था।
   आकाशवाणी महानिदेशालय की मांगीबाई ए ग्रेड की लोक गायिका थी।
  मांगी बाई का पूरा नाम मांगीबाई आर्य था। इनके पिता का नाम कमलाराम था। पिताजी शास्त्रीय संगीत के लिए जाने जाते थे। मांगीबाई को संगीत व गायिकी विरासत में मिली थी। इनकी माता मोहन बाई थी जिन्होंने इन्हें संगीत व गायिकी के क्षेत्र में आगे बढ़ने में सहयोग किया। इनके घर परिवार में गायिकी का माहौल था।
   इनका विवाह बड़ीसादड़ी राजघराने के प्रमुख गायक रामनारायण आर्य से हुआ। दोनों साथ साथ संगीत व गायिकी का अभ्यास करते थे।इनके चार पुत्र है गिरधारी आर्य,मदन आर्य,ओमप्रकाश आदि। मांगीबाई को सुनने व उनकी एक झलक पाने के लिए श्रोता हज़ारों की भीड़ लगा देते थे। उनकी आवाज़ का करिश्मा सुनने वालों को मंत्रमुग्ध कर देता था।
 मांगीबाई को 1982 में महाराणा कुम्भा संगीत परिषद ने पुरस्कार प्रदान किया। 1984 में मुम्बई के सिद्धार्थ मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा सम्मानित किया गया।1987 में बी एन नोबल्स महाविद्यालय प्रबंध समिति द्वारा सम्मानित किया गया।1994 में तत्कालीन मुख्यमंत्री राजस्थान भेरूसिंह शेखावत ने सम्मानित किया।2003 में मरुधरा संस्था कोलकाता ने सम्मानित किया।2006 में राजस्थानी भाषा साहित्त्य अकादमी ने सम्मानित किया।2007 में राज्यपाल द्वारा सम्मानित हुई।2008 में राजस्थान संगीत नाटक अकादमी और राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने सम्मानित किया। केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी ने भी सम्मानित किया।
2010 में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा सम्मान मिला।2011 में राजस्थान रत्नाकर सम्मान,नई दिल्ली से प्राप्त हुआ।
इन्हें हिंदुस्थान जिंक, जे के सिंथेटिक्स, महाभारत व कुरुक्षेत्र महोत्सव में भी सम्मानित किया।
   मांगीबाई के कई एलबम भी निकले है।टीवी सीरियल एलबम में भी भाग लिया। बहुमुखी प्रतिभा की धनी आर्य लगभग 20 वर्षों तक पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र उदयपुर की लोकगायक शिक्षिका रही।

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