मीडिया की भूमिका

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लोकतान्त्रिक देश के चतुर्थ स्तम्भ के रूप प्रतिस्थापित मीडिया की भूमिका नि:संदेह बहुत बड़ी व नीर – क्षीर विवेक चैतन्य होनी चाहिए | मीडिया न सिर्फ घटित घटनाओं की रिपोर्टिंग करता है बल्कि उचित निष्कर्ष निकालने हेतु मार्गगर्शन भी करता है | एक दर्पण की भाँति समाज का रूप हूबहू सामने रखता है और फिर एक मार्गदर्शक बनकर सही – गलत की मीमांसा में सहयोगी होता है | पूर्वानुमान के लिए आवश्यक आधार आकड़ों को उपलब्ध कराता है |

एक समय था जब मीडिया से जुड़ना मर्यादा और गौरव की बात थी । लोग इज्जत की नजर से देखते थे और मीडिया के कथन, रिपोर्टिंग या विश्लेषण को निर्विवाद रूप से सत्य मानते थे, ब्रह्मवाक्य मानते थे । मीडियाकर्मी भी अपनी जिम्मेवारी को पूजा समझते थे । मीडिया के अहर्निश विकास के साथ अर्थागमन का प्रभुत्व नहीं था । उचित उद्देश्य के साथ विश्वसनीयता परोसना ही जीवन का लक्ष्य होता था । गणेश शंकर विद्यार्थी की पावन छवि आज भी सभी के मन को श्रद्दा से ओत-प्रोत कर देती है।

आज दु:ख के साथ कटु सत्य स्वीकारना पड़ रहा है कि मीडिया निष्पक्षता और निरपेक्षता से विचलित हो रहा है | घटनाओं के यथार्थ प्रस्तुतिकरण में उसकी निजता आड़े आने लगी है |जन सामान्य पूर्ण विश्वास की जगह संदेह की नज़र से देखने लगा है मीडिया को | अब देर न करते हुए मीडिया को स्वयं के गिरहबान में झाँकना चाहिए | जनता पूरी तरह से मीडिया को नकार दे, उससे पहले ही मीडिया को स्वयं की भूमिका का पुनर्मूल्यांकन कर लेना चाहिए…..अपेक्षित मानदंड पर अमल करते हुए यथाशीघ्र सुधार कर लेना चाहिए | इससे पहले कि सारा तालाब गंदा हो जाये, संदिग्ध मछलियों को बाहर फेंककर तालाब की स्वच्छता को बचाना होगा । लोकतन्त्र को बनाए व बचाए रखने के लिए मीडिया का दूसरा विकल्प भी नहीं है ।

अवधेश कुमार ‘अवध’