मैं जिंदगी को जिंदादिली होकर…

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मैं जिंदगी को जिंदादिली होकर ,जीना जानती हूँ,    unnamed
चाहे दर्द मिले, अश्कों को भी पीना जानती हूँ,
मेरे शब्द मेरी ताकत हैं, मुस्कान मेरी हिम्मत,
अपनी कलम को मैं एक नगीना मानती हूँ ।

कई दौर देखे मैंने, जब नाव डगमगाई,
मैंने समुंदरों से कभी माँगी नहीं सफाई,
खुद बनके माँझी,अपनी पतवार खुद चलाई,
वक्त से भी ,खुद के लिए वक्त, छीनना जानती हूँ ।
अपनी कलम  को मैं एक नगीना मानती हूँ ।

सुनीता सिंह
कवियत्री व लेखिका
बहादुरगढ़ , हरियाणा

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