मेरे हिस्से का इतवार 

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मैं बीमार हुं
लेकिन
मैं किसी से कह नहीं सकती
कि मैं बीमार हुं
शरीर थकावट से चूर है
सुकून बहुत दूर है
लेकिन मैं कह नहीं सकती
आज आराम की जरुरत है
खडे होना भी दूभर है
हाथों में सूजन है
लेकिन मैं कह नहीं सकती
आज काम नहीं होगा मुझसे
आज तो इतवार है
छुट्टी का दिन
आराम का दिन
कोई दस बजे उठेगा
कोई बारह बजे
लेकिन मैं रोज़ की तरह आज भी
सुब्ह पांच बजे उठी
सिर में दर्द, कमर में दर्द
लेकिन मैं किसी से कह नहीं सकती
आज मैं दस बजे तक उठूगीं
फरमाईशें कल रात ही बता दी सबने
मैं ये खाऊगा, मैं वो
किसी ने पूछां ही नहीं
मैं क्या खाऊगीं ?
लेकिन मैं कह नहीं सकती
मैं आज ये खाना बनाऊगीं
सबके हिस्से का इतवार आ गया
मेरे हिस्से का कब आयेगा ?

जयति जैन “नूतन”, रानीपुर झांसी उ.प्र.
युवा लेखिका, सामाज़िक चिन्तक,

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