राज्यपाल श्री राम नाईक ने किया मेरठ लिटरेरी फेस्टिवल का उद्घाटन

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मेरठ। आईआईएमटी विष्वविद्यालय में शुक्रवार को तीन दिवसीय मेरठ लिटरेरी फेस्टिवल का का उद्घाटन हुआ। बतौर मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेशे राज्यपाल श्री राम नाईक कार्यक्रम में उपस्थित रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलन और राश्टंगीत वंदे मातरम् से किया गया। इस अवसर आईआईएमटी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति श्री योगेषमोहनजी गुप्ता, मेरठ लिटरेरी फेस्टिवल आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ विजय पंडित, सार्क विश्वविद्यालय, दिल्ली के अध्यक्ष प्रो. राजीव कृष्ण सक्सैना, भूटान से आए वरिष्ठ साहित्यकार छत्रपति फुएल, कनाडा के साहित्यकार सरन घई, नेपाल के साहित्यकार बसंत चैधरी और त्रिभुवन विश्वविद्यालय की वरिष्ठ लेखिका एवं विभागाध्यक्ष, भारत सरकार की साहित्य अकादमी के पूर्व सदस्य डाॅ. योगेन्द्र नाथ शर्मा अरूण मंचासीन रहे। आईआईएमटी विष्वविद्यालय के कुलाधिपति श्री योगेश मोहनजी गुप्ता ने राज्यपाल श्री राम नाईक का आभार व्यक्त किया और उन्हें प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया। राज्यपाल श्री राम नाईक ने कहा कि तीन दिन तक चलने वाले इस साहित्यिक महाकुम्भ में मंथन से अवशय ही हिन्दी साहित्य नई ऊंचाइयों को छूएगा। प्रदेश के राज्यपाल के नाते जो साहित्य प्रेमी राज्यपाल के नाते देश -विदेश से यहां पर जो साहित्य प्रेमी आए हैं उनका स्वागत और अभिनंदन करता हूं। राज्यपाल बोले कि प्रयाग में ऐसा है कि गंगा आती है यमुना आती है, सरस्वती दिखाई नहीं देती है लेकिन बोलते हैं कि त्रिवेणी संगम यहां है। उसके कारण प्रयाग का एक विषेश महत्व है। साहित्यिक महाकुम्भ में भी अलग-अलग साहित्य की धाराएं आ रही हैं और ऐसी धाराओं का महाकुम्भ के उद्घाटन के अवसर पर मुझे बुलाए जाने पर ग्रीन केयर सोसायटी और आईआईएमटी विष्वविद्यालय का धन्यवाद देता हूं। मेरठ की भूमि कितनी पावन है कैसी आग है कितनी ठंडाई है मेरे द्वारा कहा जाना ऐसा होगा कि कोई बनारस में जाए और वहां जाकर स्थानीय लोगों से कहे कि यह गंगा है और यह मंदिर है और इसका बड़ा महत्व है। मेरठ की भूमि और उसकी विविधता के बारे में मैं बचपन से जानता रहा। 1857 का यहां जो स्वातंत्रय समर का प्रारंभ हुआ था, उसको अंगे्रजों ने तो बगावत कह दिया। अंग्रेजों ने जो लिखा वही इतिहास पढ़ाया जा रहा था।
देश के स्वतंत्रवीर सावरकर को लगा कि गलत इतिहास पढ़ाया जा रहा है, उन्होंने सोचा कि मैं इतिहास लिखता
हूं और उन्होंने इतिहास लिखा और उस इतिहास को नाम दिया भारत का प्रथम स्वातंत्रय युद्ध। जहां प्रथम स्वतंत्र युद्ध की चिंगारी लगी ऐसे मेरठ में आना मेरे लिए विषेश आनंद और प्रसन्नता का अनुभव होता है। मेरठ की पावन धरती ऐतिहासिक परम्परा की है यहां के इतिहास में अनेक स्वर्णिम अध्याय लिखे हैं। उन्होंने कहा कि वैभव और पराभव के दिनों भी यहां के पूर्वजों ने हमें सम्यक् जीवन जीने की सीख दी। यह नगर महाभारत काल से सारी घटनाओं का साक्षी रहा है। ऐसे मेरठ में इस प्रकार का साहित्य सम्मेलन होना। भारत की संस्कृति में अनेक पकार का साहित्य है लेकिन वह साहित्य जो बन गया है वो एक जगह पर प्रभु राम के कारण रामायण बनी है और प्रभु श्री कृश्ण के कारण गीता बनी है।
राज्यपाल श्री राम नाईक ने कहा कि यहां के साहित्य का जिम्मा केवल मेरठ की पूंजी नहीं है यह पूरे भारत की पूंजी है, भारत के सांस्कृतिक इतिहास की पूंजी है। संस्कृत बेशक सिकुड़ती जा रही है, संस्कृत का विस्तार हमें समझना चाहिए। ये विस्तार जब हम समझेंगे तब अपने भारतीय साहित्य का अर्थ भी हम समझ पाएंगे। सभी भारतीय भाशाओं की जननी संस्कृत है। संस्कृत से उद्भव अर्थात जिनका निर्माण हुआ ऐसी कई भारतीय भाशाएं हैं और ये सभी भाशाएं एक दृश्टि से बहनें हैं। सबसे बड़ी बहन हिन्दी है इसीलिए इसे राश्टंभाशा के रूप में  पहचाना और समझा जाता है। साहित्य सम्मेलन में अन्य देशो से हिन्दी में लिखने बोलने वाले आते हैं तो हमें समझना चाहिए कि हिन्दी का प्रभाव दूनिया में है। कभी-कभी हम समझते नहीं हैं इसलिए ऐसा होता रहता है। हिन्दी बड़ी बहन है और बंगाली, गुजराती और मराठी समेत अन्य छोटी बहनें हैं। अपने यहां जो साहित्य निर्माण हो रहा है वो अन्य भाशाओं में भी ले जाने का दायित्व यदि किसी एक भाशा पर है तो वह हिन्दी है। अगर ऐसा होता रहेगा तो सभी भारतीय भाशाएं समृद्ध होती रहेंगी।

कश्मीर भारत का एक महत्वपूर्ण अंग है। कश्मीर में भी 1947 से लगातार एक प्रकार का छद्म युद्ध या सतत्  संघर्श चल रहा है और संघर्श का भी साहित्य होता है। जैसे रामायण में जब संघर्श हुआ और महाभारत में कौरव-पांडवों की लड़ाई हुई उसी प्रकार की एक लड़ाई 1947 से कष्मीर के बारे में चल रही है। ये कैसे है, वहां सेना कैसे लड़ रही है, ये समस्या कैसी है इस पर भी एक साहित्यिक दृश्टिकोण से विचार होना चाहिए। जब संघर्श चलता है और लड़ाई में जाकर देखकर साहित्य लिखना। आप कल्पना कर सकते है कि भगवदगीता में संजय ने जो कहा है वो सब आंखें बंद करके तो नहीं देखा होगा। लेकिन संजय ने वहां क्या हो रहा है कुरूक्षे़त्र पर वो बताया। उसी प्रकार से कष्मीर में सेना के दृश्टि से क्या हो रहा है और हमको आगे किस प्रकार से करना चाहिए इसमें जो साहित्यिक दृश्टिकोण है उस पर भी इस साहित्यिक महाकुम्भ में चर्चा हो रही है। आजकल अभिव्यक्ति की आजादी चल रही है। साहित्यिाकारों को, कलाकारों को अभिव्यक्ति की आजादी की भी चर्चा समय-समय पर होती रहती है। तो
आजादी किसके लिए है, आजादी की कोई सीमा है या नहीं है या जैसे कहा जाता है कि मेरे हाथ में डंडा है उसे घुमाने की आजादी मुझे है लेकिन यदि वह डंडा किसी दूसरे की नाक पर पहुंचता है तो अपराध किया है। जब अभिव्यक्ति की चर्चा चलती है तो वह अभिव्यक्ति किस प्रकार की है उसकी क्या मर्यादा हैं, इस पर भी चर्चा आयोजित की है। मुझे ऐसा लगता है तीन दिन के समापन सत्र में साहित्यिकारों का दायित्व क्या है , साहित्यकारों को कलम किस प्रकार से चलानी चाहिए, उसके सृजन से लाभ होता है या नुकसान। साहित्य की अभिव्यक्ति की आजादी कहां तक होनी चाहिए। साहित्य वह है जो आपके मेरे मन के हृदय को छू जाता है जो साहित्य छू नहीं जाता है समाज के लिए उसकी कोई उपयोगिता नहीं है। यदि कोई अकेला आदमी है तो उसका सबसे अच्छा साथी किताब है। उन्होंने किताबों की प्रदर्षनी में लगे साहित्य की प्रशंशा की। कोई भी व्यक्ति लिखे तो ये सोचे कि यदि मैं लिखता हूं तो अपने समाधान के लिए लिखता हूं, दूसरे जो उस किताब को पढ़ेगा तो उसका भी समाधान होना चाहिए। सामाजिक और राजनैतिक कार्यकर्ता के रूप में मैंने 2014 तक कार्य किया। मैंने कभी कुछ नहीं लिखा, मैं केवल अपनी वार्शिक रिपोर्ट बनाता था। ये वार्शिक रिपोर्ट मतदाताओं को जानने के लिए कि उन्हें ये पता होना चाहिए कि आपके प्रतिनिधि को ये पता हो कि आपके प्रतिनिधि ने क्या काम किया। 1978 से लगातार 2014 तक यही काम किया। राज्यपाल बनने के बाद एक दैनिक पत्र ने मुझे संस्मरण लिखने के लिए कहा। इस दैनिक में पूर्व मुख्यमंत्रियों सुशील शिदे, मनोहर जोशी और शरद पंवार के भी संस्मरण थे। मैंने 15 दिन में एक आर्टिकल लिखा और कुल 27 आर्टिकल लिखे। सभी आर्टिकल मराठी में लिखे गए थे। जानने वालों ने कहा कि अन्य भाशाओं मे भी लिखों। मैंने एक किताब लिखी जिसका नाम है चरैवति चरैवति अर्थात चलते रहो चलते रहो।
जो सोया हुआ है उसका भाग्य भी सो जाता है।
जो बैठ जाता है उसका भाग्य भी बैठ जाता है।
जो खड़ा होता है उसका भाग्य भी खड़ा हो जाता है।
यदि कोई चलता है तो उसका भाग्य भी चलता है।

सूर्य सुबह से उठकर शाम तक चलता है और सारी दूनिया को प्रकाश देता है इसीलिए इसे जगद्गुरू कहा
जाता है। यदि आपको भी सूर्य की तरह जगद्गुरू होना है तो चलते रहो चलते रहो। इस अवसर पर आईआईएमटी विष्वविद्याल के प्रति कुलाधिपति श्री अभिनव अग्रवाल, कुलपति डाॅ. अशोक कुमार,
प्रति कुलपति डाॅ. दीपा शर्मा, रजिस्टंर अशोक कुमार, डाॅ. रेनू मावी, अंशू तेवतिया, डाॅ. आशा

 

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