आज मेरा मोबाइल मेरी इतनी औकात खा गया-अशोक सपड़ा

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आज मेरा मोबाइल मेरी इतनी औकात खा गया  FB_IMG_1491396242387
घर वालों के संग मेरे रिश्तें और जज्बात खा गया

कभी दोस्तों संग महफ़िल में शोरगुल मचाता था
आज ग़मों और खुशियों से भरें हालात खा गया

बरबादियों पर रो नहीं सकता अब मैं रात भर भी
कमबख्त मारा ये मेरी हंसी वो काली रात खा गया

लगता की दुनियां की साजिश का शिकार हुआ मैं
बचपन खोया और मेरी जवानी की ये बात खा गया

मेरे अरमान जलकर राख हो गए इस हादसें में यारों
कीमत चूका के बुझा देता पर ये मेरी बरसात खा गया

माँ बाप भाई बहन सब छूटे फेसबुकिया दुनियां में मेरे
रूठ गई मेरी चाहत मेरे सपनें ये मेरे ख्यालात खा गया

मैं गुमनाम अंधेरो में शोक बनाता रहा कई दिन तक
अशोक करता अपने आप से पर ये सवालात खा गया

पथरीली राहों पे चला हूँ फोन के सहारें रिश्तें निभाने मैं
मुद्दतो के रिश्तें ताक पर रखकर मेरी मुलाकात खा गया

इंटरनेट की दुनियां ने बड़ा मुगालता दिया इस कदर की
इंसानियत मार डाली इसने और आदमी की जात खा गया

अशोक सपड़ा की

कलम से दिल्ली से

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