मौत की बारगाहें क्यों बन रहे हैं विश्वविद्यालय

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एक सर्वे के मुताबिक़ भारत के कुल सारक्षरता प्रतिशत का केंद्रीय विश्वविद्यालयों में केवल तीन प्रतिशत हिस्सा  विद्यार्थी पढ़ पाते हैं। जबकि बाक़ी के राज्य अथवा पत्राचार आदि माध्यमों से उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं। हालिया सरकार के शिक्षा बजट को लेकर के देखें तो एक बड़ी संख्या में कटौती कि गई है। उच्च शिक्षा को खत्म करने का जैसे संकल्प लिया हो और दूसरी ओर केंद्रीय विश्वविद्यालय भी उन्हीं की तर्ज पर अथवा यों कहें उनके इशारों पर चल रहे हैं तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि केंद्रीय विश्वविद्यालयों को राजस्व भी केंद्र सरकार द्वारा ही प्राप्त होता है। अब उस राजस्व का कितना उपयोग अथवा दुरुपयोग होता है उससे ना सरकार को लेना देना है और ना ही किसी अथॉरिटी को। भले ही उसके दुरुपयोग के चलते अथवा उसके अनुचित इस्तेमाल के कारण किसी को परेशानी हो या यों कहें कि उसे उपयोग ही न करके भी कागजों में उसकी उपयोगिता मात्र दर्ज कर दी जाए तो भी शायद गलत नहीं कहा जाएगा। क्योंकि आप भी भलीभांति जानते ही हैं कि अंग्रेजों के एक नेता विशेष मैकाले ने इस देश को मानसिक रूप से गुलाम बनाने के लिए शिक्षा पद्धति में ही आमूल-चूल परिवर्तन की बात कही थी और उसे लागू भी किया। उसी  के परिणाम स्वरूप हम सभी देख पा रहे हैं कि बाबू लोगों के साथ साथ अंग्रेजी बोलने वालों की औलादें ही नजर आने लगी है। यहां अंग्रेजी की महत्ता को कम प्रतिपादित नहीं किया जा रहा है। लेकिन उसके चलते भी एक जो सरकार तथा नोकर की जमात बनी है उसी के चलते आज ये विद्यार्थी वर्ग भी एक तरह से नोकर जमात में खड़ा दिखाई देता है। दूसरी ओर सरकार तथा उसके रवैये शिक्षा बजट को लेकर विद्यार्थी वर्ग को हतोत्साहित कर रहे हैं। इस भारत देश में लगभर 42 केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं जिनमें से 10-11 नॉन परफॉर्मिंग लिस्ट में शामिल है। तो इससे बेहतर तो राज्य में स्थापित विश्वविद्यालय ही ठीक हैं। तो फिर एक अलग से केंद्रीय विश्वविद्यालय को स्थापित करने का क्या फायदा? भले वह राजस्थान का एकमात्र बांदरसिंदरी, किशनगढ़ स्थित विश्वविद्यालय हो या महाराष्ट्र से लेकर बिहार और हैदराबाद के विश्वविद्यालयों तक की बात कि जाए तो सभी में एक विशेष मुद्दा है विद्यार्थियों को किसी भी तरह से शांत रखना और अथॉरिटी तक या सरकार (विश्वविद्यालय कि सरकार तो कुलपति ही होती है) वहां तक किसी भी छात्र अथवा छात्रा की कोई शिकायत, परेशानी जिससे वह लगातार जूझ रहा है न पहुंच पाए। छात्रावास की समस्या हो या क्लास की, पानी की समस्या हो या बिजली की या फिर रैगिंग आदि की जिसकी अधिकता के चलते आजकल के युवा वर्ग आत्महत्या तक का भी कदम उठा लेते हैं। देखा जाए तो इन समस्याओं से पार पाया जा सकता है वह भी या तो अकेले या फ़िर विश्वविद्यालय के अथॉरिटी के समक्ष अथवा सरकार के समक्ष अपनी परेशानियां रखकर। लेकिन कहते हैं कि ताली एक हाथ से नहीं बजती। तो कहने का अभिप्राय यह है कि मरने वाला अथवा आत्महत्या करने वाला जानबूझ कर यह कदम नहीं उठाता। दूसरी बात जो ऊपर कही गई है नॉन परफॉर्मिंग लिस्ट में नाम आने कि तो उसी का सन्दर्भ लेते हुए कहा जाए तो नॉन परफॉर्मिंग लिस्ट में नाम कैसे आया? साक्ष्य के तौर पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग दोनों के द्वारा किए गए सर्वे की लिंक तथा उन विश्वविद्यालयों के नाम दिए गए हैं। अधिक जानकारी के लिए लिंक देखी जा सकती है तथा केवल नाम जानने के लिए यहाँ पढ़ सकते हैं।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय
जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय
त्रिपुरा विश्वविद्यालय
पॉन्डिचेरी विश्वविद्यालय
झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय
राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय
हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय
बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय ऑफ लखनऊ
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय
डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय
अब रही बात इन विश्वविद्यालयों के नॉन परफॉर्मिंग लिस्ट में आने की तो उसके लिए आपको विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की वेबसाइट को देखना होगा कि उनके क्या मानदंड हैं इसे निर्धारित करने के। विश्वविद्यालय आज के दौर में ही मौत की बारगाहें क्यों बन जाते हैं? क्या इस ओर किसी ने ध्यान दिया? नहीं! क्योंकि यह सत्ता में बैठी सरकार की मानसिकता की भांति वाले ही लोग हैं। बस इनमें और उनमें फ़र्क इतना है कि इन्होंने उच्च शिक्षा पाई है। लेकिन देखा जाए तो इनकी और सत्ता में विराजित की मानसिकता तो एक ही है कि किसी भी सवाल का अथवा परेशानी का उचित समाधान नहीं निकलना ओर मात्र स्वयं को सत्यवादी हरिश्चंद्र समझ लेना। लेकिन अगर केवल राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय में इस साल कि प्रवेश प्रक्रिया को लेकर बात की जाए तो आप जानकर हैरान होंगे कि राजस्थान के एकमात्र केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्रवेश प्रक्रिया के तहत सारी सीट भरने के लिए 6,7 काउंसलिंग की लंबी प्रक्रिया से विश्वविद्यालय को गुजरना पड़ा और उसके बाद भी 50 प्रतिशत भी सीट पर प्रवेश प्रक्रिया सम्भव नहीं हो पाई है। इस बार की प्रवेश प्रक्रिया के बाद इस विश्वविद्यालय के लिए इससे अधिक शर्मनाक बात और कोई हो ही नहीं सकती। आप जानते हैं इसमें विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्र-छात्रों की भी भूमिका रही है। क्योंकि अपने परिचितों से निःसन्देह ही उन्होंने कहा कि आपको कहीं और प्रवेश मिलता है तो ले लीजिए यहाँ से तो सब अच्छा ही है। यहां थोड़ा अंदर की बात की जाए तो एक बात है कि पिछले साल 9 छात्रों  बिना गलती के विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिया गया। हालांकि छात्रों के लंबे दबाव के बाद अब उनसे परीक्षाएं ली जा रही हैं। लेकिन विश्वविद्यालय ने उनके खिलाफ की हुई एफ़. आई.आर तक को वापस नहीं लिया है। जब एफ़.आई.आर वापस लेना ही नहीं तो परीक्षा करवाने से क्या लाभ? उन छात्रों को डिग्रियां  तो मिल जाएंगी और उन लोगों से चरित्र प्रमाण पत्र भी मिल जाएगा जिनके खुद के चरित्र में दाग है या जिनके खुद के कपड़े छात्रों के खून से रंगे हैं। ऐसा विश्वविद्यालय अथवा ऐसे शिक्षक भी क्या दे पा रहे हैं अपने देश को। सरकार और अथॉरिटी के अलावा शिक्षकों का भी एक बड़ा वर्ग है जो संस्कार और परम्परा के नाम पर आज भी रूढ़ियों और ढकोसलों को बढ़ावा दे रहे हैं। अब आप अच्छे से समझ सकते हैं कि ऐसे विश्वविद्यालय जहां देश के मात्र 3 प्रतिशत छात्रों को पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हो पाता है। जब वे यहां से ऐसी मानसिकता तथा दलित होने का भाव लेकर कहीं जाएंगे तो आप नहीं स्वीकार करते इस चीज को की वे भी आगे बदला निकालेंगे? बदला लेना मनुष्य के स्वभाव में है किन्तु वह सहृदय है तब उससे ऐसी तवक्को नहीं कि जा सकती। केंद्रीय अथवा राज्य विश्वविद्यालयों के
अंतर्गत बने छात्रावास की स्थिति देखें तो आप पाएंगे कि आधे से ज्यादा छात्रावास खाली हैं लेकिन अगर किसी छात्र की किसी कमरे की समस्या है अथवा वह किसी व्यक्तिगत कारण से परेशान है या फिर वह इस आधुनिकता के चलते अकेले रहने का इतना आदि हो गया है कि उसे छात्रावास में अकेला रहना है तब भी उसे नही दिया जाता अकेले रहने को, भले ही वह पहले से आवंटित कमरे में दम घुटता हुआ सा जी रहा हो। वहीं कुछ विशेष योग्यता वाले पण्डित अथवा जाति विशेष के छात्रों को वी आई पी की तरह अकेले कमरा दे दिया जाता है तो आप इसे पक्षपात के अलावा क्या समझते हैं मैं नहीं जानता।
अगर छात्रावास की परेशानियों के चलते वह छात्र भावुक होकर यह कह दे कि दम घुटकर मरने से अच्छा मैं आत्महत्या ही कर लूं या रैगिंग के चलते या दलित होने के चलते वह आत्महत्या को मजबूर हो जाए तो उसमें आप किसका दोष मानेंगे? यह आपका अपना व्यक्तिगत विवेक है।

और हालिया खबर के अनुसार माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में गौशाला बनेगी। उसी में क्यों, हर स्कूल-कॉलेज में बनवाइए जहाँपनाह! स्टूडेंट्स की सीट काटिए, गायों की बढ़ाइए।
जो विद्यार्थी जितना गोमूत्र पिएगा, वह उतना बड़ा और देशभक्त तथा पत्रकार भी बनेगा। विश्वविद्यालयों को ऐसी मानसिकता से न जाने कब आजादी मिल पाएगी और न जाने वे कब अपने बेहतर भविष्य की तलाश इन विश्वविद्यालयों में कर पाएंगे।
तेजस पूनिया
हिंदी विभाग
राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय

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