नवगीत  “पर हम दले गए”

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प्यार-वफ़ा
बेमानी अब तो
हलाहली
ज़िन्दगानी
अब तो

हाथ की आई शून्य,
हम तो छले गए !

उपवन अब लगता
उजड़ा -सा
मौसम अब लगता
बिगड़ा- सा

बनकर मेहमाँ दुर्दिन,
आकर पले गए !

भाव सिसकते अब
मातमपुरसी होती
अब निशदिन सच्चाई
चुपके-चुपके रोती

पीर-व्यथा के लेप,
मुख पर मले गए !

हमने जीवन
जीना चाहा
सुख का प्याला
पीना चाहा

हुई मोथरी चाहत,
हम तो दले गए !

— प्रो.शरद नारायण खरे
विभागाध्यक्ष इतिहास
शासकीय जे.एम.सी.महिला महाविद्यालय
मंडला(म.प्र.)-481661

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