परिणाम का इंतज़ार- शिवाँश भारद्वाज

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  परिणाम का इंतज़ार

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मार्च – अप्रैल में माह में अकसर पेपर होते हैं । यानी विद्यार्थियो के लिये बहुत महत्वपूर्ण । पुरे साल की पढ़ाई सिर्फ़ पढ़ाई को जांचने के लिये । बच्चों से ज़्यादा पेरेंट्स परेशान । डर कि कितने मार्क्स मिलेंगे हमारे को और कितने उस फलाना रिश्तेदार के बच्चे को । टेंशन दोनों और हैं इधर भी उधर भी । और यही कहीँ स्टूडेंट्स अपने को ग़ुलाम समझ पाते हैं यानी उनकी क़ाबिलियत का पता सिर्फ़ कुछ परसेंटेज और मार्क्स देखकर लगाया जायेगा । कोई ये नही पूछेगा की पुरे साल क्या क्या सिखने को मिला क्या कुछ तज़ुर्बा पाया पढाई को कैसे पढ़ा ? ऐसे प्रश्न तो कोई पूछने से रहा , पूछेंगे तो
सिर्फ़ यह की परसेंटेज कितनी आई ग्रेड क्या क्या आये हैं ।
पेरेंट्स को रिजल्ट तक चिंता और स्टूडेंट्स को सबसे बड़ी अपने पेरेंट्स को देखकर टेंशन । इस बीच कोई मार्क्स या परसेंटेज से हटकर बच्चे की क़ाबिलियत की उसने अपनी पढाई को कितना सीखा इस बात पर कोई ग़ौर नही करता ।
परसेंटेज या मार्क्स किसी की क़ाबिलियत नही बताते बल्कि क़ाबिलियत बताते हैं तो स्टूडेंट्स की रूचि उसका समझा हुआ ज्ञान उनकी सोचने समझने की शक्ति  और उसके नैतिक मूल्य । हर दिमाग एक जैसा नही होता और ये कहना की दिमाग तो उसके पास भी है तेरे पास भी ये कुछ ठीक नही । हर दिमाग में अलग अलग बाते चलती हैं हर स्टूडेंट हर आदमी अलग सोचने समझने की शक्ति रखता हैं । और किसी की प्रतिभा का मूल्यांकन सिर्फ़ कुछ मार्क्स या
परसेंटेज देखकर करना एक ग़लत धरना हैं । मार्क्स , परसेंटेज , ग्रेड ये सभी कभी भी असल कबिलता का पता लगा ही नही सकते । स्कूल , कॉलेज सिखाने के लिये हैं कुछ नया सिखने के लिये ।
पेरेंट्स को भी अपने बच्चों को एक आज़ाद परिन्दे की तरह सिखने व कुछ नया सिखने के लिये छोड़ देना चाहिये । ज़िन्दगी में हर दिन कुछ नया सिखने को मिलता हैं और हर दिन सोच का विस्तार होता रहता हैं । पेरेंट्स
को भी समझना होगा की वे परसेंटेज ज़्यादा लाने को अपने बच्चों पर भार न दे । ज़्यादा परसेंटेज  आना कोई बड़ा काम नही बड़ा काम हैं कि उन्होंने क्या कुछ सीखा । जो पेरेंट्स नही कर पाते वो वे अपने बच्चों से कराना सोचते पर पर उन्हें ऐसा नही करना चाहिये । उन्हें अपनी मर्ज़ी से पढ़ने व सिखने दिया जाए । और बड़े आदमी बनने के लिये ज़्यादा परसेंटेज आना या ज्यादा पढ़ना ऐसा भी कुछ नही हैं ज़रूरी हैं तो सीखना और पढाई को पढ़ने के लिये पढ़ना ना की
दुसरो को दिखाने या किसी से कम्पटीशन के लिये बल्कि पढ़ना हैं तो अपने लिये ।

शिवाँश भारद्वाज
दिल्ली

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