इस मरुस्थल में देशप्रेम के पौध उगाने आया हूँ…

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इस मरुस्थल में देशप्रेम के पौध उगाने आया हूँ,
भारत माँ की माटी का मैं कर्ज चुकाने आया हूँ,

है पावन इस देश की रज घर घर नाद प्रलयंकर है,
हर पत्थर इक मूर्ति यहाँ हर कंकर शिवशंकर है,
ये देवभूमि ये तपोभूमि बस यही बताने आया हूँ
भारत माँ की माटी का मैं कर्ज चुकाने आया हूँ

सब संस्कार की सुता रही केवल भारत की माटी है,
बसता धरती में स्वर्ग जहाँ केवल केशर की घाटी है,
ऋषियों की इस पूण्यभूमि को शीश नवाने आया हूँ,
भारत माँ की माटी का मैं कर्ज चुकाने आया हूँ,

देशप्रेम अरु जनसेवा से ऊपर कोई धर्म नहीं,
कीट पतंगों सा जीवन है जिसमें ऐसा मर्म नहीं,
राष्ट्रधर्म के घृत से सच के दीप जलाने आया हूँ,
भारत माँ की माटी का मैं कर्ज चुकाने आया हूँ

नमन करूँ हर सैनिक को मैं शत शत नमन तिरंगे को,
करूँ नमन मैं तरण तारिणी पावन माते गंगे को,
मात्रभूमि की बलिवेदी में प्राण लुटाने आया हूँ
भारत माँ की माटी का मैं कर्ज चुकाने आया हूँ

इस मरुस्थल में देशप्रेम के पौध उगाने आया हूँ
भारत माँ की माटी का मैं कर्ज चुकाने आया हूँ,

कवि ‘चेतन’ नितिन खरे
सिचौरा, महोबा,बुन्देलखण्ड

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