प्रवासी साहित्य की अवधारणा एवं प्रवासी साहित्य की कहानियों में यथार्थ का चित्रण

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डाॅ. सरिता देवी

ऐसा माना जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है फिर चाहे वोे भारतीय समाज हो या अपनाये हुए देश का समाज हो प्रवासी भारतीयों की सोच भारत में हो रही गति-विधियों से भी संचालित होती है और यह संचालित सोच प्रवासी लेखन में बखूबी दिखाई भी देती है। फिर चाहे वो कोई भी विधा हो। प्रवासी साहित्य में अपने अपनाएं हुए देश के परिवेश सघंर्ष विशिष्टताओं रिश्तों और उपलब्धियों पर जाने-माने प्रवासी कथाकरों ने अपने लेखन के द्वारा एक भिन्न समाज से परिचय करवाया है।
प्रवासी हिन्दी साहित्य ने अपनी एक अलग पहचान बनाए रखी है। व्यापक अर्थ मे जो लेखन अपने घर से दूर हुआ हो यानी विदेश में या अपने घर से दूर वह प्रवासी साहित्य है। हम इनके साहित्य को पढ़कर विदेशो के अनेक अनुभवों, भावनाओं, संवेदनाओं सेे जुड़ सकते है।
’’साहित्य के विंशाल वटवृक्ष की अनेक समृद्ध और सशक्त शाखाओं में से एक शाखा प्रवासी साहित्य की भी है। जो दिन प्रतिदिन अपनी रचनाधर्मिता से हिन्दी के साहित्य को सधन बनाने के साथ-साथ पाठक वर्ग को प्रवास की संस्कृति, संस्कार एवं उस भूभाग से जुड़े लोगों की स्थिति से अवगत कराने का कार्य कर रही है। प्रवासी हिन्दी साहित्य, हिन्दी साहित्य से जुड़ती एक नवीन विधा एवं चेतना है जो प्रवासियों के मनोविज्ञान से जुड़ी है। जो न केवल एक नई विचार धारा है बल्कि एक नई अन्तदृष्टि है। जिसे अपनी जगह बनाने में प्रयाप्त समय लगा है।
प्रवासी साहित्य की परम्परा बहुत पुरानी नहीं है किन्तु फिर भी प्रवासी साहित्य अपनी संवेदनात्मक रचनाधर्मिता से साहित्य के क्षेत्र में गहरी जड़े जमा चुका है। भारत से दूर अन्य
देशों में बसे भारतीयों के अथक प्रयासों से ही आज प्रवासी साहित्य समृद्ध और सशक्त बन पाया है।
अतः प्रवासी साहित्य का सम्बन्ध प्रवासी लोगों द्वारा लिखे साहित्य से है प्रश्न यह उठता है ये प्रवासी लोग कौन है और इनके साहित्य की विशेषता अथवा सुन्दरता क्या है, इसी से जुड़ा है इस साहित्य का स्वरूप और सौन्दर्य शास्त्र।
आजकल साहित्य में कई विमर्श प्रचलित है स्त्री विमर्श, दलित विमर्श की भाँति इधर प्रवासी विमर्श ने भी जगह बनाई है प्रवासी विमर्श की विशेषता यह है कि इसके अन्तर्गत रचनात्मक साहित्य अधिक लिखा गया है।
कमलेश्वर ने प्रवासी साहित्य पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि ’’रचना अपने मानदण्ड खुद तय करती है इसलिए उसके मानदण्ड बनाए नहींे जायेगें। उन रचनाओं के मानदण्ड तय होगें’’।
प्रवासी लोगों की तीन (3) श्रेणीयों बनाई जा सकती है। एक श्रेणी मेें वे लोग है जो गिरमिटिया मजदूरों के रूप में फिजी, मॅारीशस, त्रिनिड़ाड गुआना, दक्षिण अफ्रीका आदि देशों में भेजें गए थे। दूसरी श्रेणी में 80 के दशक में खाड़ी देशों में गए अशिक्षित, अर्द्धशिक्षित, कुशल अथवा अर्द्धकुशल मजदूर आते है। तीसरी श्रेणी में 80-90 के दशक में गए सुशिक्षित मध्यवर्गीय लोेग है जिन्होने बेहतर भौतिक जीवन के लिए प्रवास किया ।
इन तीन तरह की श्रेणियों में से, साहित्य के वर्तमान समय में अन्तिम श्रेणी का ही प्रभुत्व जैसा दिखाई देता है। गिर मिटिया मजदूरों की बाद की पीढ़ीयों में से अधिकांश ने रोजगार तथा अन्य कारणों से हिन्दी या भोजपुरी के अलावा दूसरी अन्र्तराष्ट्रीय भाषाओं को अपना लिया। माॅरीशस के अभिमन्यु अन्नत ही एक ऐसे लेखक है जिनको उल्लेखनीय माना जाता है। उनके उपन्यास ’लाल पसीना’ ने काफी प्रशंसा पाई है। फिजी त्रिनिडाड, अफ्रीका अथवा गुआना से कोई ऐसा लेखक चर्चित नहीं हुआ जिसको प्रवासी लेखन में ख्याति प्राप्त हुई हो।इन दो वर्गो के लेखन को ही प्रवासी साहित्य की संज्ञा दी गई है वस्तुतः पराए देशो में पराए होने की अनुभूति और उस अपरिचित परिवेश में समायोजन के प्रयास, नाॅस्टेल्जिया, सफलताएं और असफलताओं को ही प्रवासी साहित्य का आधार माना जा सकता है। राजेन्द्र यादव ने प्रवासी साहित्य को इसलिए संस्कृतियों के संगम की खूबसूरत कथाएं कहा है। हांलाकि यह केवल संगम नहीं है बल्कि कई अर्थो मे तो मुठभेड़ है। साथ ही यह भी कहा जा सकता है कि प्रवासी साहित्य, नाॅस्टेल्जिया के रचनात्मक रूपों के समुच्चय है। नाॅस्टेल्जिया को प्रथम दृष्टया नकारात्मक मूल्य माना जाता है परन्तु यह उचित नही होगा। नाॅस्टेल्जिया का अर्थ है – घर की याद या फिर अतीत के परिवेश में विचरना।
प्रवासी साहित्य में नाॅस्टेल्जिया या पराएपन की अनुभूति, रचनात्मक यात्रा का केवल पहला चरण है। दूसरे चरण में इस मन स्थिति में संधर्ष शुरू होता है। और तीसरे चरण में अपनी नई पहचान को स्थापित करने की जद्दोजहद दिखाई पड़ती है।
इन तीनों ही चरणों में सामजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिस्थितियों का चित्रण होता है। खान-पान, पहनावा, बोली-भाषा, पर्व त्योहार का भी उल्लेख आता है। प्रवासी साहित्य में कविता, कहानी, उपन्यास, गजल आदि विधाओं में मुखयतः लिखा जा रहा है।
आधुनिक युग में व्यक्ति की अधिकार सजगता ने उसकी स्थिति, मान्यताओं व संस्कारों को अत्यधिक प्रभावित किया है उसके लिए प्राचीन मान्यताएं बदल चुकी है व्यक्ति अपने जीवन में किसी दूसरे का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करता ऐसे में अनेक लोग ऐसे भी मिल जायेगें जिनके लिए विवाह संस्था से भी जुड़ी जन्म जन्मान्तर के सम्बधों की भारतीय कल्पना का कोई मूल्य नहीं रह जाता, भारतीय समाज की अपेक्षा विदेशी परिवेश में लिव इन रिलेशनशिप, प्रेम-प्रसंग, विवाह विच्छेद व पुनर्विवाह इत्यादि आसानी से स्वीकार किए जाते है।
उदाहरणार्थ ऊषा वर्मा की कहानी ’’सलमा’’ एक ऐसी भारतीय नारी सलमा के जीवन की गाथा है जो लंदन में विवाहोपरान्त अपने पति की उपेक्षाओं का शिकार होकर असुरक्षा की भावना और मानसिक दृंन्दृ के चलते आत्महत्या करने की कोशिश करती है परन्तु जल्दी ही वह सशक्त होकर अपने पति का परित्याग कर पुनर्विवाह के लिए रजामंद हो जाती है। उषा जी ने मानव मन की जटिल मानसिकता, दृंदृ और निर्णय लेने की क्षमता को कथा कौशल की तूलिका से कैनवास पर उतारा है।
कई बार वैवाहिक संस्था के अन्तर्गत पति-पत्नी द्वारा लिया गया सम्बन्ध विच्छेद का निर्णय उनके बच्चों में अविश्वास व अपराधबोध की स्थिति पैदा कर देता है जो ताउम्र बाल-मन को भीतर ही भीतर कचोटता रहता है माता-पिता के अहम् की टकराहटों का कुपरिणाम उनके बच्चे भोगते है। लेखिका उषा राजे सक्सेना जी की कहानी ’डैडी’ भी इसी विषय पर आधारित है माता-पिता के अलगाव से उत्पन्न मानसिक दृंदृ से त्रस्त्र होती है उनकी बेटी, यद्यपि बेटी को अपने सौतेले पिता द्वारा भरपूर प्यार मिलता है। तथापि उसके मन में एक ही सवाल कचोटता है। कि आखिर उसके पिता ने उनसे नाता क्यों तोड़ा था ? जिसके परिणामस्वरूप वह अपने जन्मदाता से मिलने का सपना लिए उनके घर जाती है परन्तु पिता की मुत्यु का पता लगने पर उसके मन में सवालों की गुत्थी अन-सुलझी ही रह जाती है। कहानी में नायिका अतीत की धुँधली तस्वीर से पर्दा उठाना चाहती है परन्तु वर्तमान के नए रिश्तो का समीकरण लेकर लौटती है लेखिका ने अतीत का पूनर्मूल्यांकन करके वर्तमान में नए रिश्तों की तल्ख सच्चाई को स्वीकारा है।
आज भारत में लिखी जा रही अधिकंाश हिन्दी कहानी स्त्री विमर्श के नाम पर दैहिक कहीं-कहीं दैहिक विमर्श भी करती नजर आती है। जबकि प्रवासी कहानियाँ मानवीय यथार्थ के भीतर मूल्यों की तलाश करती नजर आती है।
स्त्री पुरूष सम्बधों की काहानियाँ वहाँ भी है मगर उनमें उतना खुलापन नहीं है जितना भारतीय हिन्दी कहानियों में नजर आता है, भारतीय मानव-मन अपनी मातृभूमि व रिश्तों से अलग होकर विदेशी परिवेश में एडजस्ट नही हो पाता। यह स्वाभाविक ही है क्योंकि भारत व विदेश की संस्कृति सभ्यता व जीवन शैली में अत्यधिक अन्तर है वहां एक आकर्षण है। वहाँ की दुनियाँ कई बार स्वप्निल संसार भी रचती है। कहानीकार तेजेन्द्र शर्मा जी ने अपनी कहानी भारतीय ’अभिशप्त’ के माध्यम से एक प्रवासी भारतीय के उपेक्षित जीवन के यथार्थ को प्रस्तुत किया है जो अपना सर्वस्व त्यागकर दंृदृात्मक स्थिति को झेलता है रजनीकांत का भारत से लंदन जाना ओर वहाँ की संस्कृति व परिवेश में स्वयं को मिसफिट पाना उसके जीवन का कटु सत्य बन जाता है रजनीेकांत और उसकी पत्नी निशा के सम्बन्ध कानूनी कटधरे में न जाकर एक ही छत के नीचे साँस लेते है तेजेन्द्र जी ने यह स्पष्ट करना चाहा है कि विेदेशी परिवेश में वैवाहिक बन्धन व्यक्ति की अभिरूचि इच्छा व दृष्टिकोण के अलग-अलग होने के कारण अप्रसंागिक हो जाते है अपनों से अलग होकर असहनीय पीड़ा को व्यक्ति अन्दर ही अन्दर महसूस करता है और प्रत्येक स्थिति को नियति मानकर भोगने को अभिशप्त हो जाता है।
वर्तमान युग में अनेक मध्यवर्गीय भारतीय परिवारों द्वारा अपनी बेटियों की शादी किसी अप्रवासी भारतीय युवा से करने का चलन कटु यथार्थ है। ऐसे रिश्ते करना और उसको प्रचारित करके गोरव-बोध से भर जाना, इतराना, यही मानसिकता हो गयी है लेकिन अनेक रिश्तों की दुखान्तिकाएं भी सामने आती रही हैं। इला प्रसाद जी द्वारा रचित ’ग्रीन कार्ड’ नामक कहानी इसी विषय को प्रतिपादित करती है कहानी में सीमा नामक भारतीय नारी का विवाह अमरीका के समीर से होना अत्यन्त हर्ष का विषय होता है परन्तु समीर का अमरीका अकेले वापस लौट जाना सीमा के हिस्से में प्रतीक्षा की धड़ियाँ छोड़ जाता है, ग्रीन कार्ड न मिलने पर समय और भाग्य भी सीमा का साथ छोड़ते नजर आते है इला जी ने इस कहानी में मानव-मन के सुनहरे सपनो की उड़ान के कारण हृदय में होने वाली विचलन और उदृेलन को वाणी दी है कहानी की शरूआत में वे लिखती है
’’अब हर दिन छुटटी का दिन है,
समय बेरहम है अपनी गति से गुजरता है’’
निष्कर्षतः़़़ मै यह कहना चाहूँगी कि प्रवासी साहित्य लेखन की यह परम्परा दीर्घकाल तक यथावत बना रहे। ताकि आने वाले समय की नई भारतीय पीढ़ी को प्रयास में संदर्भित सारी जानकारी सहज ही मिलती रहें। प्रवासी लेखक अपने लेखन की परम्परा को इसी प्रकार निभाते रहे और भारतवंशी होने के गर्व को सदा अपनी लेखनी से आगे बढ़ाते रहे, तभी अपने प्रवासी साहित्यकार के रूप को सहज रूप से परिभाषित कर सकेंगे अन्त में मै यह भी कहना चाहूँगी कि प्रवासी साहित्य के अन्तर्गत कहानीकार पूरी ईमानदारी से आधुनिक समाज खास कर भारतीय लोगो की सामाजिक, पारिवारिक समस्याओं का चित्रण करते हुए समाज की दशा व दिशा को सुधारने का अथक प्रयास कर रहे है जिसके फलस्वरूप उनके द्वारा रचित साहित्य में ह्रदय को स्पर्श करने की क्षमता व मार्मिकता का विशेष रूप से समावेश है इसलिए प्रवासी साहित्य को किसी दायरे में सीमित करने या भारत में लिखे जा रहे साहित्य से अलग करके देखने की जरूरत नहीं है अपितु जरूरत है उस मानवीय सम्वेदनाओं से रू-ब-रूह होकर उन्हें महसूस करने की जिनका जिक्र प्रवासी रचनाकार अपने साहित्य में बाखूबी कर रहे है यही कारण है कि प्रवासी कहानियों का द्रीटमेंट आम हिन्दी कहानियों से बिल्कुल अलहदा है और बहुत हद तक आश्वस्त भी करता है कि ये कहानियां भारतीय मन को एक हद तक समझती है और उनके दर्द को उनके हर्ष -विषाद को नया वैश्विक विस्तार देती है।

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची

1. डाॅ. कमल किशोर गोयनका, हिन्दी का प्रवासी साहित्य, प्रथम संस्करण 2011, अमित प्रकाशन गाजियाबाद पृ. स. 47

2. वही पृ. स. 50

3. वर्तमान साहित्य, कुंवरपाल सिंह (संपादक), प्रवासी हिन्दी लेखन तथा भारतीय हिन्दी लेखन, जनवरी-फरवरी 2006 पृ. स. 62

4. हिन्दी का भारतीय एवं प्रवासी महिला कथा लेखन, डाॅ. मधु संधु नमन प्रकाशन, नई दिल्ली 2013 पृ. सं 71

5. वही पृ. स. 91

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