”प्रेम- प्यार, दोस्ती एवं संबंध”

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rajeshwar sharma

श्री राजेश्वर शर्मा (Duputy Secretary (retd.) Consultant. CBSE Delhi)

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। जीवन आरंभ होते ही हम संबंधों में बंधने आरंभ हो जाते हैं और उउत्तरोतर बंधते जाते हैं। पहले संबंधी फिर दोस्ती और प्यार के नाम से समाज से जुड़ते जाते हैं। नाम अलग-अलग हो सकते हैं परंतु सूत्र एक ही है लगाव व विश्वास। जीवन पथ पर जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं विभिन्न विचारों के लोगों से मिलते हैं तो व्यवहार भी अलग-अलग होता जाता है। मिलने के साथ बिछड़ने का विवादों का दौर भी शुरू हो जाता है और हम ऐसे स्थान पर पहुंच जाते हैं जहां यह तय करना होता है कि क्या हमारा व्यवहार, विचारधारा सही थी  अथवा गलत। अपने-अपने अनुभवों से हम सब अलग-अलग निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। मुझे भी जीवन से बहुत तरह के अनुभव प्राप्त हुए हैं जिन्हें व्यक्त करने का प्रयास इस उद्देश्य से कर रहा हूं कि शायद इनमें से कुछ आपके जीवन को प्रेममय  में बनाने में महत्वपूर्ण निर्णय करने में सहायक हो। यह मेरे व्यक्तिगत विचार है आपका सहमत होना या न होना आपकी इच्छा व अनुभव पर निर्भर है।

     विचार व्यक्त करने से पूर्व प्रेम- प्यार दोस्ती और संबंधों का अंतर स्पष्ट होना आवश्यक है। संबंधों का समझना सरल है जो हमारे जीवन में रक्त संबंधों विवाह अथवा जम्मू से उत्पन्न है, वह संबंध होता है। संबंधों की घनिष्ठता आपसी समझदारी, सहयोग और उपयोगिता पर निर्भर करती है उस पर अलग से विचार की आवश्यकता नहीं है। यह सभी संबंध प्रेम और प्यार के ही प्राथमिक रूप है।

      संबंधों के उपरांत महत्वपूर्ण है प्रेम और प्यार जो प्रत्येक जीवित प्राणियों में व्याप्त है में अंतर कर परिभाषित करना। प्रेम एक जन्मजात नैसर्गिक भावना है एक अनंत सागर जिसने संसार में विधमान प्रत्येक प्राणी, वस्तु समा सकती है, असीम अबाध इसमें पात्र की बाध्यता नहीं है प्राणी मात्र, पशु-पक्षी, प्रकृति, ईश्वर एवं कोई भी हमारे प्रेम का पात्र हो सकता है लेकिन अज्ञानतावश सामान्यतः नर -नारी के संबंधों को प्रेम का पात्र मानना सर्वथा भ्रममात्र है प्रेम को शब्दों में परिभाषित करना संभव नहीं है।

      प्यार एवं दोस्ती एक आत्मिक संबंध का नाम है जो दो आत्माओं के मध्य कहीं भी संभव है। जब हम किसी के गुणों से प्रभावित होकर उनके प्रति आकर्षित होकर संबंधों को प्रगाढ़ बना लेते हैं और प्रशिक्षण लगता है कि हमारा प्यार ही हमारा जीवन है जिसके बिना जीवन निरर्थक और निर्जीव है जिसको देखे बिना तथा मिले  बिना जीवन में रिक्तता व्याप्त हो जाती है सर्वत्र केवल प्रिय पात्र ही नजर आता है परंतु कुछ समय बाद गहराइयों में जाने पर लगता है कि यह प्रगाढ़ता वास्तविक नहीं है और हम धीरे-धीरे पुनः कभी दूर कभी निकट आते जाते हैं और कभी सदैव के लिए अलग हो जाते हैं। इस प्रकार के संबंधों को प्यार और दोस्ती के नाम से परिभाषित किया जाता है। प्रश्न होता है कि क्या यह अवधारणा सही है कि प्यार एक बार होता है विशेष तौर पर यदि यह नर और नारी के मध्य हो, उत्तर है नहीं, प्रेम और प्यार का अंतर समझना महत्वपूर्ण है। प्रेम केवल एक बार होता है और जीवन प्रयत्न रहता है और उसकी पहचान है कि जब भी आप आत्मा का अवलोकन करते हैं, अकेले होते हैं,  दुखी या सुखी होते हैं जीवन के व्यथित एकांत क्षणों में जो आपके दिल के आंतरिक स्थल पर अपना सतत् आधिपत्य जमाये वो ही प्रेम हैं। पात्र कुछ भी हो। यह प्यार जीवन पर्यन्त स्थाई होता है। हम पास हो, या दूर दूर हो और चाहे संवाद का कोई साधन भी न हो वही प्यार दो प्राणियों के मध्य उनके गुणों पर आधारित संबंध है। जब दो आत्माओं के मध्य कुछ समान आकर्षण के केंद्र बिंदु होंगे यथा शारीरिक, सुंदरता, लगाव, पारस्परिक व्यवहार, व्यक्तित्व, पद, प्रतिष्ठा,, वैभव, सुडोलता, मोहकता, शालीनता तब हम एक या अधिक उपरोक्त गुणों से मोहित हो जो संबंध बनाते हैं वही प्यार है और प्यार सदैव आरंभ में अधिकतम उच्चतम स्तर पर सम्मोहन की स्थिति में होता है और आरंभिक दौर में व्यक्तित्व में छिपी अन्य कमियों की ओर ध्यान ही नहीं होता। समय के साथ विरोधाभास होने की संभावनाओं के उजागर होने पर हमारा प्रगाढ़य सम्मोहन साधारणता उदासीनता में बदल जाता है और लगभग तीन वर्ष में यह प्राय: नीरस व औपचारिकता मात्र रह जाता है परंतु पुनः कुछ समय उपरांत फिर किसी सुपात्र के एक या अन्य गुणों से प्रभावित होकर हमारे ह्रदय में पुनः किसी अन्य की ओर प्यार अनुकंपित होना शुरू होता है और पल्लवित होकर अनुभव देकर फिर नीरसता में बदल जाता है। कुछ ही प्यार के संबंध प्रेम के सागर से विशालता प्राप्त करते हैं। अतः प्रेम शास्वत व अथाह सागर है और प्यार समय साथ परिवर्तित होने वाली नदी। प्यार जीवन में एक से अधिक बार संभव है व  प्रेम होने का भ्रम पैदा करता है पर प्रेम हृदय में अपना स्थान जीवन पर्यन्त रखता है।

       दूसरा शास्वत प्रश्न क्या विवाह उपरांत किसी अन्य विवाहित स्त्री- पुरुष का प्यार, प्रेम पाप है, धोखा है और अनुचित है? उत्तर स्पष्ट है कि परमात्मा ने नर-मादा,स्त्री- पुरुष की रचना की है। पति-पत्नी मात्र केवल एक सामाजिक रिश्ता है जो आपसी व्यवहार और विश्वास पर आधारित है। साधारणतया  पति-पत्नी के मध्य प्यार तो होता है परंतु नैसर्गिक प्रेम नहीं। पाप और पुण्य सामाजिक अवधारणा है सामाजिक व्यवस्था का व्यवस्था बनाए रखने की। हम और हमारे जीवन साथी की वास्तविकता प्रेम है या प्यार कोई जीवन पर्यन्त नहीं जानता परंतु इसका जवाब के आत्मा ही दे सकती है।

यह सत्य है कि मूर्खतापूर्ण संबंध पूरे परिवार का जीवन नष्ट कर देता है। प्रकृति निर्माण से आज तक यह प्रश्न पूर्णता व्यक्तिगत है। पाप पुण्य से ऊपर चित्रलेखा फिल्म का गाना मार्गदर्शक है-

 ये पाप है क्या, यह पुण्य है क्या,

 रितो पर धर्म की मोहरे हैं ।

प्यार एकमात्र ऐसा संबंध अवश्य है जो रक्त के संबंधों की बाध्यता से दूर आपसी  सामंजस्य व स्वीकारता का प्रतीक है जिसमें रक्त संबंधों से अधिक प्रेम व आजादी है। वे सभी जिन्हें जीवन में प्यार का उपहार मिला वास्तव में सर्वाधिक भाग्यशाली प्राणी है। प्यार केवल मानव मात्र का सिंगार नहीं है वरन हर प्राणी, पक्षी, जानवर, नभ, नल तथा पृथ्वी पर विचरित प्राणी को इसकी नैसर्गिक आवश्यकता है इसमें किसी भाषा की आवश्यकता नहीं है केवल भावना परखने, समझने और निभाने वाले दो दिलों की आवश्यकता होती है।

       आज जब जीवन के हर पक्ष में भावनाओं की गिरावट आ रही है तथा स्वार्थ सर्वोपरि होता जा रहा है तो प्यार भी इससे अछूता नहीं रह गया है। जीवन में समय-समय पर ऐसे उदाहरण सामने आते हैं जहां प्यार और दोस्ती में स्वार्थ के आंचल में दम तोड़ दिया और हम में से अधिकांश इस विश्वासघात को सह नहीं पाते और अवसाद में चले जाते हैं तथा हिंसक हो जाते हैं, बदला लेने पर उतारू हो जाते हैं और पिछले प्यार व दोस्ती को भूलकर केवल प्रतिशोध की आग में अपना व अपने पूर्व साथी का जीवन बर्बाद करने को जीवन का लक्ष्य बना लेते हैं। लाख धोखा हो परंतु यह भी सत्य है कि इसके बिना जीवन नीरस, अर्थहीन शून्य हो जाता है इसलिए आज आवश्यकता है कि हम एक मध्य मार्ग अपनाते हुए अपने जीवन को कुछ सिद्धांत बना ले और उनका पालन करें।

       जीवन के अनुभवों के आधार पर मैंने अपने लिए निम्नलिखित कुछ मार्गदर्शक रूपरेखा बनाई है और मैं चाहता हूं कि यदि आप मेरे अनुभवों पर भी विचार करेंगे तो अवश्य ही एक सुखद प्रेममय जीवन की ओर अग्रसर होंगे।

  1. जीवन में प्यार के पात्र को चुनने की जल्दबाजी न करें। पहले लंबे समय तक औपचारिक संबंध रख कर उसे परखे कि क्या इन संबंधों के पीछे कोई स्वार्थ, डर, लालच तथा एंजॉय करने की भावना तो नहीं। आपकी आत्मा कहती है कि आपका प्रभावित पात्र आप को स्वीकृत है और आप उसमें लक्षित और कुछ कमियों को स्वीकार कर सकते हैं तो संबंध स्वीकार करें और जीवन प्रयत्न उसे निभाने की भावना से संबंधों को पल्लवित व पुष्पित करें और यह संबंध स्वयं कब प्यार में परिवर्तित हुआ आपको पता ही नहीं चलेगा।

2 . जीवन में कोई प्यार व सामाजिक संबंध स्थाई नहीं है। समय तथा अनुभव के साथ -साथ इस में परिवर्तन आते रहते हैं। हमें सदा यह प्रयास करना चाहिए कि हम प्रत्येक को पूर्ण आदर, सम्मान तथा प्यार दें और उसे टूटने से बचाए परंतु यदि कोई दूर होना ही चाहे तो उस पर दुखित अथवा को कुपित न हो और सोचे कि यह संबंध इतने ही दिनों का था। यदि आपकी आत्मा आश्वस्त है कि आप कर्तव्य मात्र सही हैं तो जाने वाले को मनाये नहीं अपितु मौन रहकर प्रकृति का न्याय देखें। किसी को सुधारना हमारा नहीं प्रकृति का कार्य है। प्यार में हानि केवल स्वार्थी, चालक व अवसरवादी पात्र की ही होती है।

  1. प्यार के संबंधो का एकमात्र आधार विश्वसनीयता व समर्पण होना चाहिए न की सुंदरता, पद, वैभव, जाति और किसी प्रकार का स्वार्थ। दोस्ती व प्यार का आधार विश्वास और सुख दुख व आपत्ति के समय साथ देने की भावना है। दुनिया भी यदि आपके मित्र के विरुद्ध है तो आप अडिग होकर साथ खड़े रहे उसे टूटने न दें यदि आपको उसकी सच्चाई पर विश्वास हो। साथ तो दो और उचित समय पर सलाह दें वह समझाएं कि वह कहां गलत था ।
  2. दोस्ती और प्यार का आधार केवल समर्पण है वह अटूट विश्वास है। ध्यान रखें कि प्यार और समर्पण अधिपत्य नहीं है। आपका कर्तव्य प्रेम करना है दोस्त को आधीन करना नहीं। प्यार पिंजरे में बंद पक्षी नहीं है उस पर विश्वास रखना उसे आजादी दो प्रतिक्षण नजर न रखें, परीक्षा न लेते रहो उसके जीवन में कम से कम हस्तक्षेप करो। प्यार के पंछी को उड़ने दो यदि तुम्हारा होगा तो अवश्य वापस आ जाएगा यदि नहीं तो स्वयं को भाग्यशाली मानो कि चलो जल्दी संबंध खत्म हो गया नहीं तो बाद में शायद हमें और दुख होता और हम यह अलगाव ना सहपाते।
  3. प्यार और औपचारिक सामाजिक संबंध अलग है। संभव है कि लंबे संबंध भी प्यार है दोस्ती में स्थानांतरित ना हो। नदी के दो किनारों जीवन पर्यंत आमने-सामने रहते हैं पर एक दूसरे से दूर रहते हैं क्योंकि अहंकार व स्वार्थ का जल बीच में बहता है अयोग्य से प्यार अथवा दोस्ती करना आपकी अक्षमता है दूसरों का गुण नहीं।
  4. यह सत्य है कि प्यार स्थाई संबंध नहीं है अतः यदि कोई किसी कारणवश दूर हो जाता है तो इसमें दुश्मनी नहीं आती थी उसकी मजबूरी हो जो उसे आप जैसे अच्छे व्यक्ति से दूर होना पड़ा है अतः प्रेम पूर्वक दूर हो जाओ और यदि वह कभी पुन: जीवन में आता है तो एक सागर की तरह उस नदी को अपने में पुन: समाहित कर लो आश्रय दो बिना किसी पिछली बातों को याद दिलाएं। सच मानो तुम्हारे पास पुन: आने से पहले उसने अपने मन में हजारों बार गलती मानी होगी पुन: याद दिला कर अपनी आत्मा को कलंकित ना करें।

    7. प्यार व दोस्ती के मध्य जीवन की गुप्त बातों का आदान-प्रदान सामान्य है। उचित तो यही है कि अपने गुप्त रहस्य को कभी भी किसी दूसरे को किसी भी अवस्था में उजागर न करो परंतु यदि किसी ने आपको कुछ बता भी दिया तो जीवन के अंतिम श्वांस तक उनको हृदय की गहराइयों में दफना दो चाय संबंध ना भी रहे। आपका उससे मतभेद होने पर वह तुम्हारे राज भी उजागर कर दे तब भी तुम उसकी गोपनीयता बातें और संबंधों को उजागर मत करो क्योंकि यह प्यार में दोस्ती का अपमान है। दूसरा गिर भी जाए परंतु हमें अपने सिद्धांतों पर कायम रहना चाहिए।

    8. प्यार और दोस्ती में समय के साथ कई बार लगने लगता है कि अब संबंधों में जाने-अनजाने दुरी आने लगी है नीरसता भी छाने लगती है इस अवस्था में सबसे पहले हमें अपना अवलोकन करना चाहिए कि कहीं जाने अनजाने में हमारी कोई गलती तो इसका कारण नहीं है यदि है तो सुधार लो परंतु यदि लगे कि हमारा मित्र जानबूझकर दूरियां बनाना चाहता तो फिर उसे रोको मत जाने दो बिना किसी वाद-विवाद के। जाते हुए को रोककर हम अपने मान सम्मान से गिर जाते हैं। भूल जाओ कि इस नाम का व्यक्ति कभी जीवन में आया। रेल के सफर में जैसे उतरने वाले से भागे चले जाते हैं उन्हें बिना किसी पश्चाताप के जाने दो।

    9. जीवन में ऐसा अवसर भी आ सकता है कि हम अकेले रह जाएं अपने सभी कर्तव्य निष्ठा को निभा कर भी इसे यह न मानो कि हमारी कमी है यह समझो कि शायद भगवान हमें कोई अधिक प्यार करने वाला मित्र देना चाहता है। इस अवस्था में अकेलापन महसूस ना कर किसी इष्ट देवता को अपना मित्र बना लो और पूरी श्रदा के साथ प्यार करो। साक्षात मित्र प्रेमी मानकर। आपका जीवन प्यार में विश्वास समर्पण से भर जाएगा।
    अंत में मेरा विचार यह है कि प्यार वह मित्रता श्रेष्ठ संबंध है। उसे जीवन पर्यंत निभाओ परंतु किसी भी कारण संबंध ना हो तो भी हमें शांत व शालीनता से प्यार अथवा दोस्ती निभानी चाहिए यही भक्ति है, पूजा है। प्रेम व्यक्ति को याचक नहीं अपितु दाता बनाता है।
    यदि साथी की मृत्यु हो जाए और एकांकी जीवन बिताने पड़े तो भी प्रेम समाप्त नहीं होता जब भी आप कोई धार्मिक कृत्य करें तो उसकी आत्मा की शांति की प्रार्थना अवश्य मन ही मन करें और उसकी मुक्ति के लिए अपने पुण्य प्रदान करें विशेष तौर पर हरिद्वार जैसे धार्मिक स्थल में यदि हम ऐसा करते हैं तो जीवन धन्य है।

    10.  एक विचारणीय प्रश्न है कि जीवन में अर्थ अर्थात पैसे का भी महत्वपूर्ण स्थान है और जीवन में सामान्यता हमें कभी ना कभी अर्थ की आवश्यकता पड़ जाती है और इसका आदान-प्रदान एक महत्वपूर्ण सामाजिक व्यवस्था है परंतु यह लेनदेन मित्रों के मध्य हो तो हमारी नीति क्या हो? मुझे लगता है की सामर्थ्य अनुसार सहायता अवश्य करनी चाहिए बिना किसी शर्त के परंतु ध्यान रखें कि उतनी सहायता करें कि अगर कोई किसी कारणवस समय पर या सदैव के लिए वापस की स्थिति में ना हो तो आपको सहन करने का सामर्थ्य और सहनशक्ति बिना किसी विद्वेष के हो। कभी साथी को शर्मिंदा ना करें मांग कर क्योंकि आप अनुमान नहीं लगा सकते कि मित्र का पैसा ना लौटा पाना अपने आप में व्यक्तित्व को अंदर से बहुत शर्मिंदा व असहज कर देता है। दो और भूल जाओ कि आप जीवन में बहुत कुछ कर पाओगे।
    इस सन्दर्भ में एक अन्य मूल प्रश्न है कि क्या आयु की किसी सीमा पर पहुंचकर प्यार और प्रेम की अशक्ति में कमी आती है या यह समाप्त हो जाती है तो इसका उत्तर है की आयु के साथ विचारों में प्रगाढ़ता आती है प्रेम व प्यार में गहराई आती है, प्रदर्शन की भावना न्यूनतम हो जाती है परंतु प्रेम प्यार के समाप्त होने का तो प्रश्न ही नहीं वरन यह और प्रगाढ़ होता है। प्यार की इच्छा शारीरिक, मानसिक व आर्थिक स्थिति से प्रभावित होकर कम अवश्य होती है परंतु सदैव इच्छा बनी रहती है कि हम किसी के प्यार के पात्र हो और कोई हमारा आराध्य हो। वस्तुतः प्यार ही परिपक्वता देकर संतुष्टि में आत्मानुभूति प्रदान करता है। ईश्वर का साक्षात दर्शन संभव नहीं है परंतु जीवन में प्रेम प्यार का तत्व उसकी उपस्थिति का आभास अवश्य कराता है।
    अत: मैं ईश्वर के साक्षात उपस्थिति में प्रार्थना करता हूं कि हर उस आत्मा ने जिसने मुझे अपने प्रेम, प्यार, दोस्ती अथवा सामाजिक संबंधों से मेरे जीवन को सजाया, संवारा व मेरी गुस्ताखियों को सहन किया ईश्वर उनके जीवन को प्यार, सुख, समृद्धि एवं सांसारिक सुखों से भरपूर जीवन का अवसर दें व जीवन के अंतिम समय में अपने लोक में स्थापित करें। अगले जन्म में पुन: मिलन की अभिलाषा के साथ, तुम्हारा अपना…

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