पुस्तक परिचय:-

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दिनकर साहित्य को वर्तमान समय में पुनः आलोचित विवेचित करने की जरुरत है।दिनकर के साहित्य की सबसे बड़ी उपलब्धी है देश-प्रेम,राष्ट्रीयता एवं संस्कृति।दिनकर एक तरफ सांसद के साथ -साथ राष्ट्रकवि के पद पर रहे तो ,दूसरी ओर जयप्रकाश के आंदोलन में राष्ट्रप्रेमी के तौर पर शामिल भी रहे।

प्रस्तुत पुस्तक में दिनकर पर कुल 22 आलेख है।इन आलेखों में दिनकर साहित्य के विभिन्न पक्षों पर विचार -विमर्श है।सम्पादकीय में संपादक का कथन महत्वपूर्ण है”राष्ट्र प्रेम की सनसनाहट से ज्यादा उसकी गहराई की समझ की जरुरत है।राष्ट्रप्रेम दिल से महसूस किया जाना चाहिए न कि इसे किसी झंडे,दल या राजनैतिक विचारधारा से जोड़ा जाये।यही खूबसूरती राष्ट्रीयता को महत्वपूर्ण बनाती है।राष्ट्रीयता का स्वरुप भी देश काल के अनुसार बदलना है और राजप्रेम और राष्ट्रीयता दोनों को अलग परिप्रेक्ष्य में देखा जाना जरुरी है।राष्ट्रीयता प्रेम है जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है।”

‘दिनकर:हथौड़ा और काल के समुद्र में फूल’ लेख में अजयेन्द्र नाथ तिवारी दिनकर की तुलना जोश मलीहाबादी और काज़ी नजरुल इस्लाम से करते हैं।
खाना कैसे खाँऊ?-अरविन्द कुमार(दिनकर जी के पोते)ने दिनकर जी के मानसिक हालात और 1974 में बिहार ,पटना में विद्यार्थी आंदोलन में काफी संख्या में घायल हुए छात्रों के प्रति स्नेह का चित्रण है।

डॉ.इतु सिंह ने दिनकर की आलोचनात्मक कृतियों पर ‘शुद्ध कविता की खोज’पर तार्किक लेख है।
दिनकर के काव्य में स्त्री चेतना – डॉ.इन्दु सिंह दिनकर को  स्त्री के संदर्भ में परंपरावादी कवि प्रमाणीत की है।

डॉ.कमलेश जैनः ‘दिनकर का शिक्षा संबंधी दृष्टिकोण’लेख में मातृभाषा के प्रति दिनकर का प्रेम और शिक्षा एवं चिंतन का माध्यम मातृभाषा ही हो सकती है,पर विचारात्मक लेख है।
इसके अलावा डॉ.कम्मू खटीक,डॉ.काजू कुमारी साव,डॉ.गीता दुबे,ज्योति सिंह,डॉ.माजिद मिया,डॉ.मृत्युंजय पाण्डेय,डॉ.रेश्मी पांडा मुखर्जी,डॉ.विकास कुमार साव,डॉ.रुद्राक्षा पाण्डेय मिश्रा,डॉ.सत्या उपाध्याय,डॉ.सुनीता मंडल,डॉ.सूफिया
यास्मीन,श्री शत्रुघन प्रसाद एवं डॉ.जगदीश्वर चतुर्वेदी
का का लेख’अस्मिता और आत्मकथा की चुनौतियां’ में रश्मिरथी के जरिए अस्मिता विमर्श पर चर्चा है।रश्मिरथी में भी अस्मिता के विकल्प की तलाश की गयी है।कर्ण मर्द है।वीरता पर गर्वित है।पुरुषार्थ उसकी संपदा है।पुरुषार्थ के बल पर भाग्य पर विजय हासिल करता है।पुरुष पात्र पुरुषार्थ के जरिए भाग्य को पछाड़ते हैं।इसके विपरीत दिनकर ने कुंती के बहाने औरत की नियति का चित्रण किया है।स्त्री का अपने भवितव्य पर नियंत्रण नहीं होता फलतः वह अपनी कहानी सेंसर करती है।(पृष्ठ-75)

डॉ.सत्या उपाध्याय (तिवारी)ने उर्वशी का प्रतिपाद्य प्रेम मनोविज्ञान’लेख में  प्रेम को सात्विकता की श्रेणी में दिखाती है।’प्रेम में सात्विकता रहती है,यह प्रेम आध्यात्म के निकट पहुँचता है।यह सात्विक प्रेम शाश्वत होता है तथा जो शाश्वत है,वही सत्य है।इस सात्विकता के लिए उर्वशी में जो मार्ग अपनाया है वह उसका सोपान मात्र है।'(पृष्ठ-136)

“उर्वशी में मुख्य रुप से काम,प्रेम श्रृंगार की चर्चा की गयी है।मनोविज्ञान की दृष्टि से काम सृष्टि के समस्त प्राणियों में व्याप्त है,जो कि एक सजह प्रवृत्ति है।यह पशु जगत में भी नैसर्गिक रुप में व्याप्त है।काम वासना का पर्याय है।काम में चंचलता प्रमुख है।—–प्रेम की विभिन्न स्थितियों का परिचय,प्रेम में संवेगों की स्थिति मनःस्थिति आदि इस काव्य की विशेषताएँ है।”(138)

सभी लेख पठनीय है।दिनकर को नये ढंग से समझने में कुछ लेख है।सबसे बड़ी बात वर्तमान समय के राष्ट्रवाद एवं देश की हालात को समझने के लिए,यह पुस्तक बहुत ही उपयोगी है।मैथिलीशरण गुप्त के बाद दिनकर राष्ट्र कवि हुए।
अतः दिनकर की राष्ट्रीयता में क्या विशेषता है,यह जानने हेतु यह पुस्तक जऱुरी है।

अतिथि संपादक डॉ.सत्या उपाध्याय(तिवारी) एवं संपादक जितेन्द्र जितांशु , को बधाई।एक सार्थक पुस्तक उपलब्ध कराने हेतु।

मूल्य-200 रुपये,प्रथम संस्करण-2018
(नई लिल्ली,कोलकाता,आगरा,)
समीक्षक- डॉ.रणजीत कुमार सिन्हा,

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