पुस्तक समीक्षा : आतुर शब्द

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समीक्षक : अवधेश कुमार ‘अवध’

साहित्य समाज का दर्पण होता है और इस दर्पण में समाज का रूप – वैविध्य परिलक्षित होता है । मानस के भाव कभी – कभी एक बयार के रूप में व्यापक होकर बहने लगते हैं, तब उस बयार की तासीर से कोई नहीं बच पाता या बचना भी नहीं चाहता । पूर्वोत्तर भारत में युवा पीढ़ी ने कुछ ऐसे ही सरस, सौम्य, सुसंस्कृत, सर्वव्यापक एवं सारगर्भित बयार का राग छेड़ा है जो सबको अपने आँचल में लेकर मातृ सरिस वात्सल्य से आप्लावित कर रही है । आतुरता से विह्वल होकर नित नए समुदाय जुड़ रहे हैं । व्यष्टि से समष्टि की ओर उन्मुख इस बयार का नाम है ‘हिन्दी के प्रति अनुराग’ और इस अनुराग – यज्ञ में आहुति के लिए श्रीमती रीता सिंह ‘सर्जना’  और श्री मती अनीता पांडा ने अट्ठाइस पुरानव कलम के सिपाहियों के अर्पण, तर्पण और समर्पण को समाहित कर ‘आतुर शब्द’ रूपी काव्य हव्य तैयार किया है ।

एक सौ बाइस पृष्ठीय ‘आतुर शब्द’ का प्रथम संस्करण मई 2017 में गोरखा ज्योति प्रकाशन मणिपुर से पूजा सुनुवार कृत आकर्षक आवरण से सुसज्जित होकर आया । शुभकामना संदेश में सुविख्यात साहित्यकार श्री राजेन्द्र परदेशी जी कहते हैं, “पूर्वोत्तर के  सर्जकों को एक नया आकाश मिलेगा।”
ख्यातिलब्ध प्रकाशक श्रीमती डॉ. गोमा अधिकारी के शब्दों में,”पूर्वोत्तर भारत के कलमकारों की अभियक्ति को पुस्तकाकार रूप देकर प्रकाशन गौरवान्वित महसूस कर रहा है ।”
“भाषाओं में क्षेत्रीयता की झलक जरूर दिखाई देगी, मगर भावों की गहराई में कोई किसी से कम नहीं है ।” सम्पादिका रीता सिंह ‘सर्जना’ के इस दावे के साथ सहयोगी सम्पादिका डॉ. अनीता पांडा का भविष्य कथन द्रष्टव्य है,”पूर्वोत्तर के आतुर शब्द देश के अन्य राज्यों तक गुंजायमान होंगे ।”

दो बूँद आँसू से प्रेम को परिभाषित कर शीत में बिहू और फिर धूप की सलामी लेते शहीद अज्ञात लाशों और इन्द्रधनुषीय ख़्वाबों के मध्य प्रकृति से समझौता करके ईश्वर स्वरूप माँ की प्रतीक्षा व पत्नी की आसक्ति मे उदास हो जाते हैं । फिर सशक्त मन से उषा के साथ सूर्यास्त व रात का आह्वान कर मानवता के वशीभूत किन्नर को स्वाभिमान पूर्ण उड़ान देने हेतु नि:शब्द प्रेमगीत से धूल का आवरण हटाते हैं। माँ, बेटी और नारी के दर्द में अनोखे प्यार की सुन्दर तस्वीर खींचती जिन्दगी नन्हीं गौरैया सी लड़खड़ाते कदमों से कवि की कल्पना में अरुणाचल पर मन की बात करती है।

जैसा कि पूर्वोत्तर को भारत की सांस्कृतिक प्रयोगशाला कहा जाता है, “शब्द आतुर” प्रयोग शाला का केन्द्रीय प्रतिनिधि कक्ष है । सर्जना, डॉ. अनीता पांडा, डॉ. रागिनी, ममता गिनोड़िया, सुस्मिता दास, बिमला शर्मा, ज्योति, स्मिता, मालोबिका, सूर्या, बॉबी, वाणी बरठाकुर विभा, विशाल के सी, एमी एवं मृदुल कुमार सहरिया की रचना धर्मिता के दीप का प्रखर आलोक सिर्फ पूर्वोत्तर ही नहीं अपितु विस्तृत भारत को आलोकित कर रहा है ।

कवि कृष्णनील कार्की की ‘कवि’ कविता का एक अंश –
“मैनें उसको
कलम से गोली चलाते देखा….
हिंसा को मिटाते….
भाईचारा बढ़ाते….
सद्भाव फैलाते…..
दानव को मानव बनाते देखा ।”

कवयित्री रीता सिंह ‘सर्जना’  अदम्य जोश जगाते हुए-
“क्या हुआ गर कोई
तुम्हारी कदर न करे
तुम स्वयं के भीतर
इतना सशक्त भावों से भर देना
कि तुम्हारा वज़ूद किसी और से नहीं
बल्कि खुद की वज़ह से जीवित हो……।”

समाज में सुरसा के मुँह की तरह फैलते अवसर वाद, उपभोक्तावाद और नकारात्मक प्रवृत्ति पर कुठाराघात करते हुए कवयित्री ‘विभा’-
“देख रही हूँ…..तू कितना बदल गया है !
एक -दूसरे से वो नेह के बंधन न रहे,
भूलने लगे….भ्रातृत्व प्रेम और अपनापन
दूर कर दिया मानव – बोध के रिश्ते ।”

अहिन्दी भाषी होने के कारण पूर्वोत्तर को संविधान के ‘ग’ समूह में रखा गया था जबकि सम्पर्क भाषा के दायरे से निकलती हुई हिन्दी यहां की सबसे बड़ी भाषा बनने की ओर अग्रसर है । आतुर शब्द उसी अभियान में एक मील का पत्थर है । यद्यपि नि:संदेह आँचलिक असर है, अलंकार व शिल्प पक्ष कमजोर है, वर्तनी में अल्पांश दोष है, सरस्वती वंदना से प्रारम्भ नहीं है, तथापि भावपक्ष इतना सशक्त है कि पाठक को विभोर करने में सक्षम है । जिस प्रकार बुनियाद की ईंट में बाहरी सुन्दरता नहीं बल्कि मजबूती मायने रखती है उसी तरह से “आतुर शब्द” नाम को सार्थक करते हुए पूर्वोत्तर में हिन्दी भाषा व साहित्य के लिए सशक्त आधार है ।

समीक्षक : अवधेश कुमार ‘अवध’
मेघालय

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