पुस्तक समीक्षा : अमर्त्य

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कवयित्री – आभा दुबे ‘अनामिका’
प्रकाशक एवं मुद्रक – मनु प्रकाशन, बालाघाट, मध्य प्रदेश
पृष्ठ – 117, मूल्य – रुपये 175/- मात्र

अनुभूति की तपन में हृदय के भाव मेघ बनकर कभी क्रोधाग्निवश गरजते हैं तो कभी स्नेहाधिक्यवश व्याज के साथ शोधित भावरस को बरसाकर सराबोर कर देते हैं | अमर्त्य श्रीमती आभा दुबे अनामिका के अटूट विश्वास का ऐसा ही प्रतिफल है जिसमें मन में उपजते ज्वार – भाटा को संयमित कर भावों को सार्थक दिशा देने की कोशिश है |

अखिल भारतीय साहित्य परिषद् महाकौशल प्रान्त के अध्यक्ष श्री अशोक सिंहासने ‘असीम’ एवं सेवानिवृत्त प्राचार्य व वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. एल सी जैन की साहित्यिक लेखनी अमर्त्य को महिमा मंडित करती है | दीपिका एकता पाण्डेय द्वारा आवरण सज्जा, स्वच्छ मुद्रण/ प्रकाशन सजिल्द अमर्त्य की शान है जिसके आलोक में अत्यल्प खामियों से युक्त होते हुए भी कवयित्री का प्रथम प्रयास सराहनीय है |

120 रचनाओं के समग्र संकलन में नारी के विविध रूपों को सँजोया गया है | माँ स्तुति, राष्ट्रभक्ति, श्रीकृष्ण प्रेम, रिश्तों की मर्यादा, कर्तव्य के प्रति सजगता, हिन्दी के प्रति स्नेह, श्रृंगार के उभय पक्ष, तन से परे रूह मिलन की अभिलाषा तथा स्वस्थ हास शामिल हैं | दोहा, घनाक्षरी, कुण्डलिया, आल्हा, गीत, लोकगीत, ग़ज़ल, मुक्तक, अतुकान्त एवं तुकान्त रचनायें कवयित्री के असीम ज्ञान की परिचायक हैं | रहस्यवादी अन्योक्ति, छायावादी व्यंजना, प्रगतिवादी चिंतन एवं सूफी प्रेम का अनूठा समन्वय है अमर्त्य |

वात्सल्य छलक उठता हैं इन शब्दों में, ”माँ कहकर वो काश बुलाता, प्यास मेरी भी बुझ जाती |” वैधव्य को अभागन का संबोधन हृदय को चाक – चाक कर देता है, “पर बैन बाण, खंजर कृपाण | और लोग कहें, मैं अभागी हूँ ||” कवयित्री की कलम हिन्दी भाषा के प्रयोजन हेतु फड़क उठती है, “अगर शब्द अक्षर न होते, सूना होता जग संसार |” आरक्षण की आग में झुलसती प्रतिभाओं को देखकर कवयित्री मन विद्रोह कर उठता है, “आरक्षण के कोटे की भी, ख़ारिज लिस्ट करायेंगे |”

‘मैं इंसा बन जाऊँगा’, ‘अधर तुम्हारे’, ‘होठों से मुझे जुठा दो’, ‘माँ’, ‘उजाड़ दी शराब ने’, महिष्मती मंडला नगरी’, ‘वृद्धाश्रम’ तथा ‘मैं नारी हूँ दुखियारी हूँ’ अमर्त्य की अनमोल रचनायें हैं तथा इनमें निहित भाव प्रवणता को दिल से आँखों के रास्ते स्रावित होते देखा जा सकता है | दैन्य भाव का कहीं भी नामो निशान नहीं है जो आज की आवश्यकता भी है |

विपदा आप्लावित वैधव्य द्वारा स्व० पति को अमर्त्य का समर्पण कवयित्री के साहसिक कदम और दृढ़ इच्छाशक्ति का ज्वलंत दस्तावेज है जिसका नाम अमर्त्य होना सार्थक हुआ है | अमर्त्य वह विलक्षण सीप है जिसमें विहंगम साहित्यिक मोती अनवरत प्रदीप्त होता है | कवयित्री श्रीमती आभा दुबे ‘अनामिका’ का अमर्त्य अब सुधी पाठकों का अमर्त्य बन चुका है |

अवधेश कुमार ‘अवध’
प्रधान संपादक – साहित्य धरोहर
मेघालय

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