पुस्तक समीक्षा-‘बाँहों में आकाश’- में आधुनिकता बोध के दर्शन

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कथाकार डॉ राजीव पाण्डेय कृत उपन्यास
बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार डॉ राजीव कुमार पाण्डेय का सद्य प्रकाशित उपन्यास ‘बाँहों में आकाश’ एक ऐसा सामाजिक उपन्यास है जिसमेंआधुनिकता बोध के दर्शन होते हैं। उपन्यास के कथानक में यद्यपि दो नायक क्रमशः  मोहित व शेखर हैं तथापि नायिका दिव्या की जिजीविषा इसे नायिका प्रधान व आशावादी बना देती है। उपन्यास का कथानक कोई एक सत्य घटना प्रतीत न होकर  कई घटनाओं को जोड़कर बनाया गया प्रतीत होता है जिसमें कल्पना का अत्यधिक सहारा लिया गया है। कथा यूँ तो शेखर से प्रारंभ होती है किन्तु वह प्रथम नायक नहीं है। शेखर और दिव्या की प्रेम कहानी से कथा प्रारम्भ तो होती है किन्तु जब वह फ्लैश बैक का सहारा लेकर अतीत में चली जाती है तब कथा के प्रथम नायक मोहित से परिचय होता है । दोनों ही नायकों का चरित्र उद्दात है। किन्तु वे दोनों ही  अपनी अपनी समस्याओं का शिकार होते हैं।
मोहित दिव्या का प्रथम प्रेमी है जो उसका होने वाला पति भी है। परिस्थितियां मोहित को वह सब करने पर मजबूर कर करती हैं जिसके बारे में उसने कभी सोचा तक नहीं था। गुप्ता जी के जोर डालने पर उसका ट्रक ड्राइवर व कंडक्टर के साथ कोलकाता जाना उसके जीवन में वह जहर घोल गया जिससे उसे असमय में ही एड्स नामक जानलेवा बीमारी से ग्रसित होकर असमय में ही काल कवलित होना पड़ा और वह दिव्या का पति न बन सका। दिव्या के द्वारा एच आई वी पॉजिटिव मोहित का प्रीटेस्ट लेना दिव्या के लिये अभिशाप बन गया और वह भी एड्स नामक बीमारी से ग्रसित हो गयी।
उपन्यासकार डॉ राजीव कुमार पाण्डेय ने महानगरीय संस्कृति में उभर रही एक विडम्बना प्रीटेस्ट का अच्छी तरह से मजाक उड़ाते हुए इस अंधे समाज को आगाह किया है। नायिका दिव्या ने झाँसी की रानी की तरह अपनी बीमारी व सामाजिक विद्रूपताओं का डटकर मुकाबला किया है। यदि नायक मोहित में भी दिव्या की तरह जिजीविषा होती और वह दिव्या की तरह ही संघर्ष कर पाता तो शायद उपन्यास में दूसरे नायक शेखर का प्रवेश ही न होता। पूरे कथानक में  दोनों नायकों का कहीं पर भी आमना सामना नहीं हुआ है। नायक मोहित तो यथार्थवादी भूमि पर ही खड़ा है।किन्तु नायक शेखर अति आदर्शवाद को प्रस्तुत करता है। वह पल पल पर यह सब साबित भी करता है कि प्यार दो शरीरों का नहीं अपितु दो आत्माओं का मिलन होता है। वह दिव्या के परिस्थितिजन्य तथाकथित दुश्चरित्र व मोहित से उसके रिश्ते तथा दिव्या के एड्सपीडिता होने के बाद भी दिव्या को प्यार करता रहता है और किसी दूसरी लड़की की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखता। वह आजीवन कुंवारा रह सकता है किन्तु दिव्या के अलावा किसी अन्य लड़की से शादी नहीं कर सकता। और तो और वह इस अंधे समाज से बहिष्कृत दिव्या से हुए अपने प्यार को अमरत्व प्रदान करने हेतु दिव्या की लाइलाज बीमारी का अमेरिका में इलाज भी कराता है। यहां शेखर कोई साधारण मनुष्य नहीं अपितु कोई देवता ही साबित होता है।
उपन्यास का शीर्षक बाँहों में आकाश सटीक ही है। नायक शेखर का नाम यदि आकाश होता तो उपन्यास में और भी आधिक सजीवता आ जाती तथा पाठक भी चमत्कृत हो जाता। बाँहों में आकाश भर लेना आशावाद का प्रतीक है। उपन्यास में घुटन अंतर्द्वंद, पीड़ा, संत्रास, प्रेम-प्यार ,छल प्रपंच,व्यभिचार ,ब्लैकमेलिंग आदि सब कुछ है। संयोग तत्व का का भी जमकर सहारा लिया गया है। संयोग के कारण ही दिव्या कोलकाता पहुँचती है जहाँ मोहित पहले से ही विद्यमान है। यह भी संयोग ही है कि मोहित व दिव्या एक ही अस्पताल में इलाज करा रहे हैं। दिव्या का डायरेक्टर यदि दिव्या को कोलकाता के बजाय मुम्बई भेज देता तो मोहित तो मर। सकता था किंतु दिव्या एड्सपीडिता नहीं बनती। यह भी संयोग ही है कि मोहित के द्वारा ढावे पर उस देह के धंधे वाली लड़की से एक बार सम्भोग करते ही वह एच आई वी पॉजिटिव हो जाता है जबकि तमाम ट्रक ड्राइवर व कंडक्टर आये दिन उनसे सम्बन्ध बनाते रहते हैं।
वास्तविकता में एड्स जैसी लाइलाज बीमारी का इलाज संभव हुआ हो या नहीं किन्तु लेखक ने अपनी कल्पना शक्ति से उसका इलाज अमेरिका में खोज लिया है। जो डॉक्टर अमेरिका में एड्स जैसी लाइलाज बीमारी का इलाज करके एड्सपीडिता नायिका को पूर्ण स्वस्थ कर देता है उसे उपन्यासकार के द्वारा साक्षात भगवान के रूप में प्रस्तुत कर देना चाहिये था किंतु उपन्यास कार ने उसके साथ घोर अन्याय करके उसे व्यभिचारी, ब्लैकमेलर,चोर व धोखेबाज बना दिया है।
प्रस्तुत उपन्यास का कथानक गतिशील है जिससे पाठक में जिज्ञासा बनी रहती है।सम्पूर्ण कथा को यदि अध्यायों में भी बाँटा जाता तो ज्यादा अच्छा रहता। पात्रों की भी संख्या ठीक है । प्रत्येक पात्र अपने-अपने  चरित्र का निर्माण स्वयं करता है। पात्रों के चरित्र चित्रण में  उपन्यासकार को पूर्ण सफलता मिली है। उपन्यास की भाषा आम बोल चाल की खड़ी बोली है। कथोपकथनों में पात्रानुकूल भाषा का प्रयोग किया गया है। सम्पूर्ण उपन्यास में वर्णनात्मक,नाटकीय शैलियों का प्रयोग किया गया है। नाटकीय शैली का एक उदाहरण प्रस्तुत है-
“माँ वह लड़की मुझसे प्यार करती है लेकिन उसके साथ एक गम्भीर समस्या है।“
“ऐसी कौन सी गम्भीर समस्या है मैं भी तो सुनूँ।“
“वह लड़की बहुत बड़ी बीमारी से ग्रसित है।“
“ऐसी कौन सी बीमारी ,फिर जब उसे बीमारी ही है तो उसके पीछे ही क्यों पड़ा है,तेरे सामने तो तेरी सारी जिंदगी पड़ी है। सैकड़ों अच्छी लड़कियां इस देश में है फिर उस दिव्या में तूने ऐसा क्या देख लिया है जो उसके पीछे पागल बना घूम रहा है।“
शेखर एकदम अचंभित दिव्या का नाम सुनकर।
“माँ तुम जानती हो उस दिव्या।“
“बिल्कुल जानती हूँ उस दिव्या को और उसके पिता नवीन चंद्र को भी ,उनसे मिल भी चुकी हूँ।” ( पृष्ठ 78)
वर्णनात्मक शैली का एक  उदाहरण दृष्टव्य है-
“दिव्या की बाहरी खुशी को तो सबने देख लिया था लेकिन उसके अंदर क्या चल रहा था यह किसी ने नहीं पढ़ पाया था, दिलौ जान से चाहने वाला शेखर भी अनभिज्ञ था उसके दिल की बात से। दिव्या के मन में कुछ और ही चल रहा था। किसी ने अवसर ही नहीं दिया उसे बात करने का।उसके ह्रदय की धड़कन बढ़ती ही जा रही थी,लेकिन अपनी बात किसी से कह भी नहीं पा रही थी। अंदर प्रवेश किया तो देखा अन्दर की सजावट,फूलों के बड़े- बड़े गुलदस्ते रखे थे।“ (पृष्ठ 107)
उपन्यासकार के कथन कहीं – कहीं सूक्ति बन गए हैं। कतिपय उदाहरण दृष्टव्य हैं-
“कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है।“( पृष्ठ110)
“भाग्य हमेशा चार कदम आगे चलता है,भविष्य के रंगीन सपनों को सजाना एवं ताना बाना बुनना हमारा काम है लेकिन उसे पूरा करना ऊपर वाले के हाथ में है।” (पृष्ठ 54)
“जिंदगी एक पानी का बुलबुला है जो बनता एवं बिगड़ जाता है, मनुष्य रंगमंच का अभिनेता है जो अभिनय के लिये आता है और अभिनय समाप्त करने के बाद वापस चला जाता है।” (पृष्ठ 40)
वातावरण व देशकाल के आधार यदि प्रस्तुत उपन्यास का मूल्यांकन किया जाए तो पता चलता है कि कृति की कथा का काल वर्तमान काल तो है ही साथ ही  भविष्यत काल भी इसमें परिलक्षित होता है। ऐसा लगता है कि कुछ घटनाएं तो इसी काल में घटित हो रहीं हैं किंतु कुछ फेंटेंसी के शिल्प द्वारा घटित कर दिया गया है। जैसे एड्स की लाइलाज बीमारी का इलाज सम्भव नहीं है किंतु उपन्यास में यह सम्भव है।यह घटना वर्तमान काल की न होकर भविष्यत काल की है।
उपन्यास में कोई एक विशेष खलनायक नहीं है जो पूरी कथा में रहा हो। अवान्तर कथाओं की तरह समय-समय पर आते रहें हैं और विलुप्त होते रहें हैं। कथा में असली खलनायक कोई है तो वह है समाज।समाज आज इतना दिग्भ्रमित है कि वह भले व्यक्ति के तो पीछे पड़ जाता है और बुरे व्यक्ति का साथ देता है।समाज ने मोहित को कहीं का नहीं छोड़ा। दिव्या के आड़े भी समाज खूब आया।शेखर को भी समाज का कोई बहुत बड़ा समर्थन नहीं मिला है । आज के कथा कहानियों में यह दकियानूसी समाज खलनायक बनकर खूब आ रहा है जो भले एवं आम आदमी को खूब तंग कर रहा है।
उपन्यासकार यदि चाहता तो उपन्यास के कथानक में मनमोहन देसाई की फिल्मों की तरह एक चमत्कार उत्पन्न कर सकता था।कथा के दोनों नायक सगे भाइयों के रूप में प्रस्तुत किये जा सकते थे जिनका रहस्य कथा के अंत में खुलता। कहने का मतलब यह है कि दोनों नायक बचपन में एक दूसरे से बिछुड़ हुए सगे भाई हो सकते थे।यदि ऐसा होता तो पाठक चमत्कृत हुए बिना नहीं रहता।
निष्कर्षतः यही कहा जा सकता है कि डॉ राजीव पाण्डेय का यह उपन्यास ’बाँहों में आकाश’ ऐसा समसामयिक उपन्यास है जो आज तो प्रासंगिक है ही भविष्य में भी प्रासंगिक रहेगा। उपन्यास एक बड़ी रचना होती है जिसका ताना बाना बुनना कोई सरल काम नहीं है। गढ़े अनगढ़े विषयों को छूकर उपन्यासकार ने अपने इस उपन्यास की रचना की है। लेखक कमलेश्वर की धरती मैनपुरी जनपद में जन्मा है इसलिए उनकी अप्रत्यक्ष प्रेरणा उसे जाने अनजाने में अवश्य मिली होगी। हिन्दी साहित्याकाश में ‘बाँहों में आकाश ‘ को कोई न कोई स्थान अवश्य मिलना चाहिए ऐसा मेरा विश्वास है। मेरी उपन्यासकार को हार्दिक शुभकामनाएं।
समीक्ष्य कृति- बाँहों में आकाश (उपन्यास)
लेखक- डॉ राजीव कुमार पाण्डेय
प्रकाशक – हर्फ़ मीडिया, बी- 84ग्राउंड फ्लोर, सेवक पार्क साइड,पटेल गार्डन एक्सटेंशन
द्वारका मोड़,नईदिल्ली- 110059
मूल्य-200/-रुपये
पृष्ठ- 120
समीक्षक- डॉ हरिश्चंद्र शाक्य, डी लिट
कवि,लेखक,उपन्यासकार, समीक्षक
शाक्य प्रकाशन,घण्टाघर चौक,क्लबघर
मैनपुरी(उत्तर प्रदेश) 205002
मोबाईल न0- 09411440154

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