पुस्तक समीक्षा : बापू को किसने मारा ?

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समीक्षक : अवधेश कुमार ‘अवध’

हिन्दी साहित्य की समृद्ध वाटिका में वैसे तो कुसुमों की कमी नहीं है किन्तु कभी – कभी कुछ ऐसे फूल खिल जाते हैं जो अपनी सूरत और सीरत के संयुक्त प्रभाव से उपवन में अलग ही छाप छोड़ देते हैं । ऐसे ही अमिट छाप छोड़ने वाली एक पुस्तक ‘बापू को किसने मारा ?’ ईशा ज्ञानदीप प्रकाशन नई दिली से 2016 में छपकर आई थी । यह काव्य पुस्तक सहायक प्रोफेसर डॉ. पवन कुमार पाण्डे द्वारा विरचित है ।

यूँ तो रचनाकार के पास रचनाओं का विशाल संग्रह होता है किन्तु एक पुस्तक को अमली जामा पहनाते समय पुस्तक के शीर्षक के अनुरूप रचनाओं का चयन किया जाना चाहिए ताकि सार्थकता और उद्देश्य फलीभूत हों । कवि सम्मेलनों की शान रहे पिता आ. सीताराम पाण्डे के साहित्यिक अनुभव और संस्कार का पूरा उपयोग कवि ने रचनाओं के चयन में किया है । 80 पृष्ठीय इस पुस्तक में 36 कविताओं को रखा गया है । स्थान के रूप में ”निज़ामाबाद दर्पण”और ”जै तेलंगाना” नामक दो कविताएँ हैं । व्यक्ति विशेष के रूप में “हे राम!”, “महाप्राण निराला”, “बापू” “सुश्री मायावती” और “निर्भया” को स्थान प्राप्त है । जन सामान्य की समस्यान्तर्गत “भूख” शामिल है । माँ की महानता व विविध सोचों को लेकर “माँ कभी थकती नहीं”, “माँ नज़र आती है”, तथा “होंठ माँ के हिलें” इसमें हैं । इनके अतिरिक्त राष्ट्रीय भावना से प्रेरित होकर “भारतीय संविधान”, “हिन्दी भाषा”, “शहीद के विचार”, “राष्ट्रभाषा हिन्दी” तथा “प्यारा हिन्दुस्तान” से पुस्तक सुशोभित है । गहन चिंतन व विमर्शाधारित “बापू को किसने मारा?”, “तीसरा गाल कहाँ से लाऊँ ?” “काश! बापू के चार बंदर होते” तथा “ममता” विशेष हैं। अँगडाई लेती हुई नारी के मद्दे नज़र “सलामत रह पाऊँगी ?”, “फूल नहीं चिंगारी”, “जो कल तक लता थी”, ” मैं क्या नहीं कर सकती!” तथा “पतंग और नारी” हैं । तुलनात्मक रूप से विचारणीय पहलुओं को भी कवि ने पुस्तक में जगह दी है यथा, “पतंग और नारी”, “पहलू नहीं सिक्का” तथा “कुत्ता और इनसान” ।

जिस तरह किसी लिफाफे को देखकर गुणीजन मजबून का अंदाजा कर लेते हैं उसी तरह पुस्तक के चयनित बिन्दुओं के आलोक में पुस्तक की सारगर्भिता सामने आ जाती है । “बचपन” का उल्लास देखें –
“यदि मिलेंगे मौके इन नन्हीं प्रतिभाओं को तो भविष्य में,
कोई  लता  तो  कोई  अब्दुल  कलाम   होगा ।”

मज़हबी झगड़े में उलझे लोगों का फ़ायदा उठाते हुए आतंकवादी कहता है कि-
“क्योंकि मन्दिर-मसजिद की लड़ाई में उलझे हैं ये,
और हमारे निशाने पर तो पूरा हिन्दुस्तान है ।”

“चुनाव” कविता में जनता प्रतिनिधि सीता की मजबूरी में रावण और राम दोनों दोषी हैं –
“पर नहीं मिला सुख कभी, माँ सीता -सी भोली जनता को, क्योंकि
कभी रावण ने किया हरण,कभी खुद राम ने वन भिजाया ।”

“बापू को किसने मारा?” में कवि का आक्रोश फूट पड़ता है –
“हजारों निर्दोष सिक्खों को गया था मौत के घाट उतारा ,
इसीलिए मैं कहता हूँ बापू को उनके अनुयायियों ने मारा।”

जिसको माँ ने ठुकराया हो, उसे भला कौन अपना सकता है! “ममता” कविता में कवि बोल उठा-
“अंत में मैनें जाना, जिसे माँ ठुकराती है,
उसके भाग में केवल ठोकरें ही आती हैं ।”

समाज गुण – दोषों का समन्वित समग्र होता है और साहित्य उसी का अक्श । “बापू को किसने मारा?” नि:संदेह हमारे समाज का अक्श है । कमजोर पक्ष की बात करें तो ‘भारतीय संविधान’ और ‘शहीद के विचार’ में क्रमश: ‘1947’ और ’47’ को अंकों में लिखा गया है जो शब्दों में होना ठीक होता। एकाधिक जगहों पर बौद्धिक तर्क की अधिकता काव्य की सहजता पर भारी पड़कर दिल के बदले दिमाग के द्वार पर लाकर खड़ा कर देती है । अलंकारों के चमत्कार से कवि का लगाव नहीं है । शब्द सरल एवं भाव प्राय:  सुगम्य है। इन नामुराद दोषों के बावज़ूद भी रचनाकार के गहन मनन – चिंतन, सूक्ष्म अन्वेषण, सतर्क तर्क – वितर्क एवं उद्देश्य उन्मुखता का परिचायक है यह पुस्तक । आइए बापू के बंदर बनने से बचें और इसे प्यार, दुलार और वृहद् संसार दें ।

रचनाकार: डॉ. पवन कुमार पाण्डे
संस्करण : प्रथम, 1016
मूल्य : रुपये 135 मात्र
प्रकाशन : ईशा प्रकाशन, नई दिल्ली

समीक्षक : अवधेश कुमार ‘अवध’

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