पुस्तक समीक्षा-चिन्ता, चिंतन और चेतना

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लेखक:- रामस्वरूप रावतसरे
प्रकाशक:- उषा पब्लिकेशन्स , अलवर
आईएसबीएन न0:- 978-81-935501-7-5
समीक्षक:- कमल कांत शर्मा

आज के दौर के साहित्यिक उष्णता रूपी मरुस्थल में खेजड़ी की छाँव में स्थित प्याऊ में रखे मृण मटके के शीतल जल का सा पान कराती कृति है आदरणीय रामस्वरूप रावतसरे द्वारा रचित ’’ चिन्ता, चिन्तन और चेतना।’’
चेतना का मतलब है, यह बोध होना कि इस सृष्टि का सत्य अपदार्थ है। अर्थात् सत्य वह नहीं है जो दृश्य या अन्य प्रकार से अनुभवगम्य है। अगर आप सृष्टि के सभी प्राणियों में भी उसी परम-सत्ता के अंश को देखते हैं, जो आपमें है, तो आप चैतन्य हैं। चेतनता कोई अलौकिक बात नहीं है, ये तो मनुष्य के अस्तित्व की मूल बात है, उसका सार है।
परमतत्व की खोज, परमात्मा के अस्तित्व, उसके स्वरूप, गुण, स्वभाव तथा जीवात्मा से परमात्मा के संबंध, इस सम्पूर्ण सृष्टि की रचना में उसकी भूमिका, जीवन-मरण चक्र और पुनर्जन्म की अवधारणा इत्यादि प्रश्नों पर चिंतन के धरातल पर ही चेतना का विकास सम्भव है , यही सब कुछ प्रमाणित किया है, रामस्वरूप रावतसरे ने अपनी कृति ’’चिंता, चिंतन और चेतना’’ में ।
श्रेष्ठता के भाव को आत्मसात करने पर बल देते हुए आप अपनी बात… में कहते है ’’जीवन एक अवसर है श्रेष्ठ बनने का, श्रेष्ठ करने का,श्रेष्ठ पाने का’’।
प्रस्तुत पुस्तक में लेखक ’’मोह सत्यनिष्ठा को खा जाता है’’ नामक लेख की आधारशिला से प्रारम्भ होकर आप विभिन्न लेखों की सोपान दर सोपान चढाई करते हुए ’’ आदत बुरी सुधार लो , हो गया भजन’’ के उच्चतम शिखर पर पहुंचते है इस प्रकार आप चिंता से प्रारम्भ होकर चिंतन के द्वारा चेतना को प्राप्त करने का सुगम पथ दिखाते है ।
’’ मधुर वाणी है एक तपस्या’’ लेख में आपने हमारे द्वारा उच्चारित शब्दों की महत्वता पर प्रकाश डालते हुए लिखा है – हमारे मुख से निकले शब्द जितना सामने वाले ( सुनने वाले ) पर असर डालते है , उतना ही हमारे मन मस्तिष्क को आघात या उल्लासित करते है।’’
’’कर्मफल इसी जिंदगी में भुगतने पड़ते है’’ लेख में सेठ, गाय और थानेदार के प्रसंग के माध्यम से बड़े रोचक तरीके से आपने बुरे कर्माे से बचने का संदेश दिया है ।
’’जिसने संसार को पीठ दिखाई उसके पैर पूजे गए है’’ लेख में बड़ी ही सहजता से आपने बताया कि ’’ चमत्कृत करने में सुख नहीं है, चमत्कृत होने में सुख है।’’
’’माता पूरे कुल को स्वर्ग में ले जा सकती है’’ लेख में आपने रानी मदालसा और काशी नरेश के दृष्टांत द्वारा रोचक तरीके वेद वाक्य – ’’ मातृ देवो भवः’’ को प्रतिपादित करते हुए लिखा है कि किस प्रकार माता अपनी संतति को सुसंस्कारित करके पूरे कुल का उद्धार कर सकती है ।
अंत में श्रेष्ठता के विचार को चेतना शिखर पर ले जाते पुस्तक के अंतिम लेख ’’आदत बुरी सुधार लो, हो गया भजन’’ में मानव जीवन को सार्थकता प्रदान करते हुए आप लिखते है कि ’’हमारा सबसे पहला धर्म बनता है कि हम सबसे पहले अपने कर्तव्य कर्म के बारे में सोचें, फिर अपने आपके बारे में सोचें, अपने परिवारजनों के बारे में सोचें। यदि हम यह करने में सफल हो जाते है तो हमारा जीवन सार्थक है।’’
इस प्रकार पुस्तक में समाहित उनतीस लेखों में सत्य की डगर ही सुख देने वाली है,वे सेवा भाव के अलावा कुछ भी नहीं जानते थे, हम सदगुरू की दिव्यता को समझे, वृद्धावस्था दुःखमय नहीं सुखमय हो, सम्पत्ति व वैभव को नहीं श्रेष्ठता को महत्व मिले, पुन्य की चादर ओढकर विदा होना बड़ा मुश्किल है, सत्कर्म ही संसार से मोह भंग कराते है,उठो और श्रेष्ठता के लिए युद्ध करो , थोड़ा दूसरों के लिए भी सोचें, हमारा कर्म ही धर्म बने, हमें यथार्थ का सामना तो करना ही होगा लेखों में भी आदरणीय रावतसरे जी ने बड़े प्रभावी एवम रोचक तरीके से मनुष्य को आध्यात्मिक ,नैतिक एवम मानवीय मूल्यों के सुपथ पर अग्रसर होने के लिए प्रेरित किया है।
पुस्तक के प्रारम्भ में श्रेष्ठ साहित्यकार श्रध्देय इन्द्र भंसाली ’’ अमर ’’ एवम आदरणीय सुमतिकुमार जैन प्रधान संपादक- जगमग दीपज्योति द्वारा लिखित भूमिकाए पुस्तक को नई ऊँचाईया प्रदान करती है ।
उषा पब्लिकेशन्स ,अलवर द्वारा प्रकाशित आदरणीय रामस्वरूप रावत्सरे द्वारा रचित यह पुस्तक ’’ चिन्ता, चिन्तन और चेतना’’ समाज को संस्कारवान और समृद्ध बनाने में महति भूमिका निभाते हुए अपनी श्रेष्ठता को प्रतिपादित करेगी गुरुदेव भगवान से यही मंगलकामना है ।
कमल कांत शर्मा
छापुड़ा कलाँ ( शाहपुरा )
जिला जयपुर – राजस्थान

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