हम ढलानों पर खड़े हैं विविध रचना-शिल्प में संवेदनापूर्ण कविताएँ

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समीक्षक- डाॅ. लव कुमार

कवि समाज का सर्वाधिक भावुक, संवेदनशील, अनुभूतिप्रवण और जागरुक व्यक्ति होता है। अपने मनोजगत में अंतर्निहित युगीन संवेदनाओं और हार्दिक अनुभवों को पी-पचाकर, पूरी परिपक्वता के साथ जब वह प्रतिक्रिया व्यक्त करता है तो कविता की सरस धारा फूटती है-षर्त यह है कि उसके पास अनुभूति और अनुभवों की गहरायी हो, उत्कट संवेदनषीलता हो और तद्नुरूप अभिव्यक्ति के लिए भाषा का सषक्त तेज हथियार भी हो। डाॅ. चंद्रपाल मिश्र ‘गगन’ की सद्यः प्रकाषित काव्यकृति ‘हम ढलानों पर खड़े हैं’ में इन विषेषताओं का मूर्त रूप देखा जा सकता है क्योंकि यहाँ वस्तु की संवेदना में गहरायी और उसकी अभिव्यक्ति में धारदार किंतु सरस षैली है जिसे खड़ीबोली और ब्रजभाषा का संस्पर्ष मिला है और मुक्तछंद की रवानी भी। कवित्त और सवैयों के प्रति आम पाठकों की उदासीनता देखकर, उसकी लोकप्रियता को मजबूती से थामकर उसे जन-जन तक पहुँचाने का यह कार्य ष्लाघनीय है। अतुकांत कविताएँ तो भावाभिव्यंजक और अर्थगर्भित हैं ही। काव्यकृति का नामकरण भी ग़ज़ल के एक षेर से लिया गया है-”जागकर देखा यह हमने रीतियाँ कुछ और हैं।/हम ढलानों पर खड़े हैं सीढ़ियाँ कुछ और हैं।“ जीवन की अस्त-व्यस्तता, पीढ़ियों के बीच की बढ़ती दूरियाँ, जटिल जीवन की असहज अनुभूतियों के कारण पारदर्षी आचरणों में आयी कृत्रिमता और इन सबके बीच खो रही मानवीयता को देखने वाले इस कवि की अनुभूतियाँ यह सोचने के लिए विवष करती है कि ढलानों पर खड़े हम निरंतर फिसलते तो नहीं जा रहे हैं? मानवीय मूल्यों की पतनोन्मुखी स्थितियाँ ही क्या हमारी नियति नहीं हैं? षब्द-बिंब का यह अर्थ गौरव उत्कृष्ट है।
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समीक्ष्य कविता-संग्रह चार खंडों में विभाजित है। खंड एक में खड़ीबोली मंे लिखित कवित्त हैं; दूसरे खंड में ब्रजभाषा में रचित कवित्त-सवैये हैं; तीसरे खंड में गीत, ग़ज़ल और मुक्तक संकलित हैं जबकि चैथे खंड में अतुकांत गीत-कविताएँ रखी गयी हैं। इन खंडों में संकलित काव्य-रचनाओं में विचारों की परिपक्वता, लेखन षैली की कुषलता, भावाभिव्यक्ति की उत्कंठा और संवेदनाओं की जागरुकता देखकर सहज महसूस होता है कि गगन जी का कवि-व्यक्तित्व अपने भीतर उमड़ते-घुमड़ते भावों और विचारों को षब्दाकार देने में प्रवीण है। खड़ीबोली में लिखित कवित्तों में समकालीनता की छाया और जीवन का दबाव स्पष्ट देखा जा सकता है क्योंकि इनमें निहित संकेत और अर्थ षब्दों की सीमा को पारकर हमारे अंतर्मन को स्पर्ष करते हैं। कवि ने काव्य-चेतना के विविध पहलुओं को अपनाते हुए वैयक्तिक, सामाजिक, यथार्थ, नगरीय एवं रस-भावादि की चेतना में प्रतिक्रियाएँ प्रकट की हैं। सामाजिक चेतना का एक उदाहरण देखें-”षोषण की मार भ्रष्टाचार का प्रहार,/ढेर खर्चों का भार आज मजदूर सह रहा!/गंदी बस्तियों में नहीं पाया कभी सुख चैन,/सदियों का इतिहास चीख-चीख कह रहा।“ (पृ. 24) इसी तरह यथार्थ को द्योतित करने वाली पंक्तियाँ भी हैं-”अपने यथार्थ से तो आँखें बंद किए हुए,/दूसरों के दोष देखने में लगा आदमी।/ खंड-खंड जीवन के साथ-साथ जीता हुआ,/मानिसक द्वंद्व झेलने में लगा आदमी।“ (पृ. 23) स्वाभिमान, मानवता, षोषण, अहं, मजदूर, सुखद सपने आदि इन कवित्तों के विषय हैं जो समसामयिक चिंता के ज्वलंत मुद्दे हैं किंतु भाषा, देष और युग की सीमा लाँघ चुके तुलसी के प्रति कवि का मन आसक्त होना भी स्वाभाविक है। इसी तरह वैभव-विलास के मध्य गरीबी का भयावह रूप इस युग के काव्य की पहचान है और गगन जी ने खड़ीबोली कवित्त में इसे षब्दषः प्रकट किया है-”मजदूरों की गरीबी से है कैसा तालमेल,/जीवन के घात- प्रतिघात सह जाते हैं/उनकी विवषताओं का न कोई आकलन/मन को मसोस चुपचाप रह जाते हैं।“ (पृ. 27) उन्होंने यह अच्छी तरह समझा है कि आधुनिकता के नाम पर कुछ भी लिख देना मानवता के लिए घातक है। इसलिए कम ही षब्दों में अधिक बात कहने के लिए उन्होंने मुक्तकों का सहारा लिया। अपनी ग़ज़लों और मुक्तकों में वे वर्तमान परिवेष, मानव संबंधों, मानवता और अन्यान्य मुद्दों पर दृष्टिपात करते हैं।
तीसरे और चैथे खंड में पाठक सहज ही आज के षब्द-सैलाब में सार्थक काव्य की सही दिषा और दृष्टि की पहचान कर सकता है। भले ही इन कविताओं में कहीं तारतम्यता और छंदस् का अभाव है; कहीं अंतर्विरोध और संवेदनाओं का अतिषय दबाव है; जो नये युग की देन है तथापि उसमें काव्यत्व की प्रभावोत्पादक षक्ति विद्यमान है। छोटी-से-छोटी काव्यात्मक टिप्पणी भी अपनी मर्मस्पर्षिता के कारण अंतःकरण में पैठनेवाली हैं। कवि-वाणी का वर्चस्व ‘वर्तमान में कविता’ की पंक्तियों में देखिए-”बंद आँखें/खुलती तो हैं/किंतु/ ठोकर के बाद।“ (पृ. 83) जिसकी पूरकता, परस्परता और समर्थन उन्हीं की दूसरी कविता ‘राम जाने’ में महसूस की जा सकती है-”भयंकर संभावनाआंे की/पदचाप सुनकर/खुल गयीं अब/बंद आँखें।“ (पृ. 85) कवि की मुख्य चिंता समाज, अवसरवादिता, नैतिकता, प्रयोजनवादी संबंधों की है। कवि की मान्यता है कि व्यक्ति और समाज से जुड़ी कोई ऐसी समस्या नहीं हो सकती, जिसका समाधान संभव नहीं है। केवल ईमानदार प्रयास और निरंतरता की अपेक्षा है।
डाॅ. गगन की कविताएँ अंतर्मन की अनुगूंज हैं जो उन्हें समग्र सृष्टि से जोड़ती हैं। इसलिए उनकी कविताएँ आषा-आकांक्षा, उमंग-उत्साह, चिंतन-दर्षन, भेद-समन्वय, दुर्बलता-संपन्नता, सीमा-उपलब्धि और परिवेष से जूझकर, कहीं-कहीं उनमें रमकर बाहर निकलने को बाध्य करती हैं। जीवन की कठिनाइयों एवं विषमताओं, विद्रूपताओं और विडंबनाओं के साथ होली का उमंग, वसंत की बहार, कोयल की कूक, झूमती प्रकृति और जीवन के आनंद का संगीत एक साथ यहाँ उपलब्ध है।
संग्रह की कविताएँ संप्रेषणीय हैं जो विविध षैलियों में लिखी जाकर प्रभावी बन पड़ी हैं। उनकी भाषा अनुभूतिनिष्ठ चिंतन की भाषा है और षैली सहज, जिसमें कवित्व, सवैयों, ग़ज़लों, मुक्तकों और अतुकांत कविताओं की भाव-संपदा एवं अर्थ-गौरव को वहन करने की षक्ति तथा सामथ्र्य है। कवित्व और सवैये की श लीगत सूक्ष्मताओं और शिल्पगत कसाव को बनाए रखने की विषिष्टता ने उन्हें सिद्धहस्त कवि साबित कर दिया है। चित्त के विस्तार के साथ काव्य का एक उद्देष्य आनंद प्रदान करना भी है और निस्संदेह गगन जी का काव्य- संग्रह चित्त की परिषुद्धि कर उन्मुक्त भाव-संपदा और स्वस्थ विचार जागृत करने वाली है।

समीक्षित कृति
हम ढलानों पर खड़े हैं, (काव्य-संग्रह), डाॅ. चंद्रपाल मिश्र ‘गगन’, अयन प्रकाषन, 1/20, महरौली, नयी दिल्ली-110030, प्र. सं. 2017, मूल्य 200/, पृ. 100
ग्राम-दुर्गापुर, पोस्ट-गढ़बनैली, जिला-पूर्णिया, बिहार, पिन-854325/मोबा 9430276299

डाॅ. लव कुमार
एम. ए., पीएच. डी., बी. एड.
पता – ग्राम-दुर्गापुर, पो.-गढ़बनैली, जिला-पूर्णिया, (बिहार), पिन-854325
मोबाइल – 09430276299/7274003313
ईमेल – lovekumargbn@gmail.com

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