पुस्तक समीक्षा – ‘हम ढलानों पर खड़े हैं ’- बी. एल. आच्छा

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हम ढलानों पर खड़े हैं –   डाॅ0 चन्द्रपाल मिश्र का नवीनतम् कविता.संग्रह है | मध्यकाल के भक्तिराग से  लेकर समकालीन जीवन के आंतर पक्ष को समेटे इस संग्रह की विशिष्टता यह है की वह सांस्कृतिक स्वर के साथ जीवन की लय  को साधना चाहता है | कवि ने हिंदी की छंद-लय को जितना साधा है , उतना ही आज की अतुकांत कविता में जीवन के विविध अनुसंगों को सहज अभिव्यक्ति दी है | लेकिन कवित्त – सवैया जैसे लोक-लय वाले छन्दो  में उसने हिंदी के साथ ब्रजभाषा में भी ऐसा रस घोला है , जो मध्यकालीन भक्तिकालीन भक्ति-रीति की तरंगों को हिलोरे देता है |

            चार खंडों में विभाजित इस संग्रह में प्रथम खंड कड़ी बोली में कावित्त रचना पर केन्द्रित है | मुक्त छंद के इस युग में कवित्त की ओर लौटना साहित्यिक इतिहास की परंपरा को जीवंत बनाये रखने का दायित्वपूर्ण अहसास है | अनुप्रास का सांगीतिक नाद इन कवित्तों को लय तो देता ही है पर मिथकीय चेतना के साथ समकालीन जीवन – राग से भी जोड़ देता है | इसीलिए इन कवित्तों में ह्रदय की जितनी हूक उठती है , उतना ही यथार्थ के जीवन व्यवहारों के कुटिल जाल की व्यथा भी | पर निराशा है , तो संकल्प भी | राजनीति के खोखले आश्वासन है तो लोकतंत्र की सजग आँख  भी | मनोविकारों  का आंतरिक संसार है , तो पसीना बहाने वाले श्रमिकों – मजदूरों की व्यथा भी |IMG-20180327-WA0021 (1)

पर अधिकतर कवित्तों में भक्ति का आस्था स्वर है | तुलसी की लोक मांगलिक अभिव्यक्ति उन कवित्तों में गूँजती है | सही भी है – ‘घोर पतझड़ के पराग बने तुलसी’ | तुलसी के जन मुक्ति के लक्ष्य की रागिनी उनके दर्शन और अवदान के साथ इन कवित्तों  में लय का संधान करती है | पर कवि ने समकाल की अनदेखी भी नहीं की है | साधना से हीन- दींन वासना में लींन हुए , निर्माण के क्षणों को ढीट बने खो रहे | सुख की तलाश में भटकते है दिन रात , दिशाहीन सतरंगी सपनों को ढो रहे |

दूसरा खण्ड ब्रजभाषा में भक्ति और रीति के परिदृश्यों के साथ ऋतु-राग में असरदार है | एकतरह से यह भक्ति – रीति युग का विस्तार है | इसीलिए अनुप्रास की घटा और क्रियाओं की प्रधानता के साथ पुनरुक्ति का सहकार बहुत गहरा है | ‘ दमकति दामिनी घनन बीच बेरि- बेरि | हेरि-हेरि हरियारी हिय हरसात है |’ इस सांगीतिक लय में ब्रजमंडल अपने कृष्ण- साहचर्य से दृश्यमान हो गया है | यह केवल सांस्कृतिक भूगोल का व्रतमान नहीं , बल्कि चित्र भाषा का बहुरंगी रूप है | ब्रज – संस्कृति का ब्रजभाषा में चित्रण एतिहासिक संपदा को आधुनिक हिंदी युग में जीवंत करना निश्चय ही परंपरा का साधक है | पर कुछ सवैयों में तो घनानंद का स्वच्छंद भाव ही लय के साथ सिरजा गया है – ‘ काज परे

कछु और दिखे , जब काज सरै नव रूप दिखावो | छन में कछु कौ कछु होवे सुनो , फिरि काहे कौ रूप में मान बढ़ावौ  |’ इन छंदों में प्रकृति राग बहुत गुंजायमान है | ऋतुओ के वर्णन में भी कवि ने उसी रीतिकालीन परिदृश्य को संवारा है , पर कही कहीं वर्षा काल में लोक पीड़ा  का अहसास भी छूता है – पेट भरिवे कूं कछु नाहि मिलि पायो है | टूटी सी झुपरियाँ हू टपकत रात दिन |  बैठि. बैठि भीझि-भीझि श्याम कूं मनायो है द्य’ ब्रज की मिठास से युक्त यह अभिव्यक्ति लोक- राग से पुष्ट है |

            तीसरा खंड हिंदी में मात्रिक छंदों में समाज और जीवन की विसंगतियों , मजबूरियों और अन्याय जनित परिस्थितियों का चित्रण हुआ है | प्रजातंत्र में अभिशापित चेहरे , विश्वासों की छलना , दर्दों के स्मृतिजन्य अहसास , जीवन पथ के कुहासे – अँधेरे दमित आकांक्षाएं  इन छंदों में अभिव्यक्ति बने है | कहीं – कहीं सादृश्य असरदार है- ‘खुले गगन में बंद सुए से उड़ने की रफ़्तार न पूछो |’ यह जीवन के दर्द की लक्षित व्यंजना है |  गज़ल  भी कवि की अभिव्यक्ति विधा है और क्षणिकाएं भी | गज़ल में जीवन की विडंबना , विरोधाभास , आंतरिक उद्वेलन और भटकावों को व्यंजना दी गयी है –‘जागकर देखा यह हमने रीतियाँ कुछ और है | हम ढलानों पर खड़े हैं , सीढियां कुछ और हैं ||’

इस छदम  को कवि ने कतिपय गज़ल में संजोया है | क्षणिकाओं में विरोधी परिदृश्यों और विलोभी संरचनाओं से विसंगत अहसास उतर कर आये हैं –‘डर है खिली मुस्कान भी आँखे भिगो न दे |’ यथार्थ पर तंज कसते हुए कवि कहता है – ‘इंसानियत को ढूढ़ते उस आदमी में क्यों , जिसने इसे बस  पुस्तकों में भी पढ़ा यारों |’

अतुकांत कवितओं का खंड आंतरिक अहसासों के मनोविज्ञान से जितना गहरा है , उतना ही आज की सभ्यता के आचरण के आँगन की कालिमा से स्याह | साँसों पर सवार विवशताएँ , पशुता की संस्कृति निराशा में दम तोड़ती आस्थाएं , श्रेष्ठता के अहंकार , अवचेतन की असहाय विवशता , कुटिलताओं के पैबंद , अवसरवादिता के गठबंधन आदर्शो में लिपटी वीभत्सता जैसे अनेक परिदृश्य इन कवितओं में समय का अंकन करते है | पर कवि का जीवन – राग भी वर्तमान केन्द्रित है और उजालों से लक्षित | कवि जितना अवचेतन को उकेरता है , उतना ही वाह्य दृश्यों को विजुअल बनाता है पर पिछले खण्डों में जो सांस्कृतिक लक्ष्य है , वह इन कविताओं में खंडित सी है , अपने युग के यथार्थ के अनुरूप | फिर भी समरसता और वर्तमान की शक्तिमयता को कवि ने सिसकन और तड़पन पर पुरजोर बनाया है | निश्चय ही इन कवितओं में समय झांकता है , यथार्थ कचोटता है , पर जीवन – राग दृष्टि भी देता है |

हम ढलानों पर खड़े है की रचनायें लम्बे कालमान को सहेजती हैं क्योकि इनमे भक्ति – रीति काल का सांस्कृतिक स्वर भी है और आधुनिक काल की यथार्थ चेतना भी | साथ ही बृजभाषा की मिठास को जितना छंद – लय में ढाला गया है , उतना ही हिंदी में कवित्त – सवैयों को संप्रेषणीय बनाया गया है | इन सारी विविधताओं में कवि की अभिव्यक्ति दमकती है |

पुस्तक मिलने का पता :-

चंद्रपाल मिश्र (गगन)

211 /1 , आवास विकास कॉलोनी , कासगंज

मोबाइल  7017730618, 9411236165

                                          बी. एल. आच्छा

                              36 , क्लीमेंट्स रोड , सखना स्टोर्स के पीछे

                              पुरुशवाकम, चेन्नई (तमिलनाडु ) पिन 600007

मो 09425083335

 

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