पुस्तक समीक्षा-राष्ट्रवाद और हिन्दी साहित्य

0
126
20190203_110750
 【 स्वरुप एंवं अवधारण】संपादक-डॉ.राजकुमार पाण्डेय,
साहित्य संचय प्रकाशन,दिल्ली -110090,
प्रथम संस्करण-2018,मूल्य-995 रुपया।
फोन नं-9871418244/9136175560.
===================================
राष्ट्रवाद पर वर्तमान समय में गर्म बहस जारी है। कौन राष्ट्रवादी  है एवं राष्ट्रद्रोही है?इस चर्चा अख़बार से लेकर मीडिया तक छाया हुआ है।राष्ट्रवाद में राष्ट्र का स्थान सर्वेच्च होता है।राष्ट्रवाद व्यक्ति के सापेक्ष राष्ट्र को अधिक महत्व देता है।हिन्दी साहित्य का आदिकाल का काव्य में भी राष्ट्रवाद का चित्रण है।पर उस समय का राष्ट्रवाद और सन् 1857 के बाद का राष्ट्रवाद में युगानुकूल अंतर है।

भारत में आधुनिक  राष्ट्रवाद जो 1885 ई.में काँग्रेस की स्थापना से प्रचारीत -प्रसारीत हुआ।वह मूलतः राजनीति से जुड़ता हुआ दिखा।आधुनिकता के साथ जिस राष्ट्रवाद का उदय हुख वह आर्थिक बदलाव के साथ साथ राजनीतिक परिवर्तनों को भी लाया।जिसमें राष्ट्रवाद के स्थान पर जातिगत,सामुदायिक उन्नति और विकास के लिए राष्ट्रहित का ख्याल न करके केवल अपने अधिकारों को प्राप्त करने पर केंद्रित दिखा।जिसके चलते वैचारिक हिंसा,विद्रोह और वामपंथ का उदय हुआ जो राष्ट्रवाद के विपरीत नज़र आये।

राष्ट्रवाद,राष्ट्र की अस्मिता और स्वतंत्रता का समर्थक,मानवीय रक्षा,विकास और अस्तितव की विचारधारा पर आधारित है।

“भारत में राष्ट्रवाद(राष्ट्रभावना)का विकास औपनविशिक शासन के दौरान हुआ।राष्ट्रवाद के विकास के साथ राष्ट्रीय चेतना के विकास का गहरा संबंध है।राष्ट्रीय चेतना के विकास में 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की भूमिका अहम् है।1857 का स्वाधीनता संग्राम भारत में हिन्दू मुस्लिम एकता का मिशाल कायम करता नज़र आता है।बाद में ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने फूट डालो शासन करो की नीति अपनाकर इसे बार-बार खंडित किया।और आजादी के बाद पुनः फूट डालो  की नीति कायम रही।1990 के उदारीकरण,भूमंडलीकरण,बाजारवाद,वैश्वीकरण,विश्यायन ने इसे ग्लोबल रूप देकर एक अलगाववाद के रूप में लाया है।आज का राष्ट्रवाद मात्र सत्ता को हासिल करके समाज को धर्म,जात-पात,संप्रदाय,समुदाय,प्रांतीयता में बाँटकर एक कोरी या खोखली देशप्रेम को साबित करने का मात्र शब्द बन कर रह गया है।”(305)

तथाकथित कुछ भारतीय बुद्धिजीवि’राष्ट्रवाद’ को एक संकीर्ण सोच बतलाते हुए इसे अधिनायकवादी मनोवृत्ति घोषित करते नज़र आते हैं या आ रहे हैं।लेकिन भारतीय राष्ट्रवाद तथा अन्य राष्ट्रवाद में काफी अंतर है।भारत की महान सभ्यता एवं संस्कृति ने राष्ट्रवाद को अलग रूप में प्रस्तुत किया।राम लंका विजय करके भी सोने की लंका के प्रति आकर्षित नहीं होते।जबकि अन्य देश दूसरे देशों को लुटने और हड़पने के लिए रोज नया चाल आज भी चलता दिख रहा है।

“साम्राज्यवाद की नीति में कहीं जाति,धर्म और संप्रदाय की प्रभुता,कट्टरता प्रमुख रुप स्पष्ट रुप में नजर आती है।वर्तमान में तेल के आधार पर साम्राज्यवाद को विकसित किया जा रहा है,—अमेरिका तेल -प्राप्ति के लिए हरसंभव अपनी समस्त शक्ति का दुरुपयोग करते हुए लोकतांत्रिक वैश्विक व्यवस्था को तहस-नहस कर रहा है।इधर चीन भारत पर पहले ही साम्राज्यवादी नीति के तहत आक्रमण करके भारत भूमि का अधिग्रहण कर चुका है और वर्तमान में भी वह भारत की सीमाओं पर बार-बार प्रवेश कर अपनी सीमाओं के विस्तार को महत्व दे रहा है।–भारत-पाकिस्तान हो या उत्तर कोरिया-दक्षिण कोरिया।(29-30)”

निर्मल वर्मा ‘भाषा और राष्ट्रीय अस्मिता’निबंध में भाषा के माध्यम से संस्कृति के संरक्षण पर बल देते हुए लिखे हैं–“किसी देश की संस्कृति ऐतिहासिक झंझावतों द्वारा क्षत-विक्षत भले ही हो जाए,उसका सत्य और सातत्य उसी भाषा में बचा रहता है।भारतीय संस्कृति इसका अप्रतिम उदाहरण है।उन्नीसवीं शती में यहाँ एक ओर यूरोपीय भाषाविदों और दार्शनिकों ने जिनमें हेगल और मैक्समूलर प्रमुख थे-भारतीय सभ्यता के स्वर्णयुग को सिर्फ सुदूर अतीत में दबे खंडहर की संज्ञा देकर उसके वर्तमान को खारिज कर दिया था,वहाँ उन्हें विशेषकर मैक्समूलर जैसे इंडोलाजिस्ट्स को बराबर यह बोध भी था कि जब तक भारत में संस्कृत और उससे उद्भूत भाषाएँ परस्पर संवाद और आत्म चिंतन के लिए जीवित रहती है,तब तक उसकी एक सांस्कृतिक अस्मिता बची रहेगी।”(167-168)

राष्ट्रवाद हिन्दी साहित्य में आरंभिक काल से ही विद्यमान है।आदिकाल अथवा वीरगाथाकाल।भक्तिकाल में राष्ट्रवाद सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रुप ,कबीर,सूर,जायसी,तुलसी आदि में प्रकट होता है तो रीतिकाल में भूषण के माध्यम से।भारतेंदु युग ,द्विवेदी युग,से छायावाद के दौर में राष्ट्रवाद की भावना और अधिक प्रबल हुई।

“राजनैतिक क्षेत्र में फैला भ्रष्टाचार,अराजकता,राजनेताओं का नैतिक पतन,पाश्चात्य संस्कृति से पदाघात,भारतीय सांस्कृतिक धरोहर,सामाजिक जीवन में टूटते-बिखरते संबंध,आर्थिक क्षेत्र में असामनता तथा सरकारी नीतियों की असफलता के कारण फैला अलगाववाद,आतंकवाद,नक्सलवाद आदि आज देश की प्रमुख राष्ट्रीय समस्याएँ बन चुकी है।”(77)

प्रस्तुत पुस्तक में कुल 49 आलेख हैं। जो विद्वानों,प्राध्यपको एवं अध्याताओं ने अपनी रुचि एवं मान्यताओं के अनुरुप अपने निष्कर्ष दिए हैं।जिसमें राष्ट्रवाद,साम्राज्यवाद, भूषण के काव्य में राष्ट्रवाद,राष्ट्रीय एवं संस्कृति जागरण,हिंदी पत्रकारिता में राष्ट्रवाद,हिन्दी उपन्यास और राष्ट्रवाद,प्रगतिवाद काव्य में राष्ट्रवाद,भारतेंदु हरिशचंद्र और राष्ट्रवाद,,गुप्त,प्रसाद,निराला,दिनकर,माखनलाल चतुर्वेदी,सुभद्रा कुमारी चौहान,सोहनलाल द्विवेदी,नरेश मेहता,प्रतापनारायण मिश्र,माखनलाल चतुर्वेदी,श्यामलाल उपाध्याय,निर्मल वर्मा,गुरु गोंविद सिंह,हिंदी जीवनी साहित्य,स्वातंत्रयोत्तर युग ,भवानीप्रसाद मिश्र,प्रतापनारायण मिश्र आदि  तो कथा साहित्य में प्रेमचंद,यशपाल,अमरकांत ,रवीन्द्रनाथ  आदि साहित्यकारों की कृतियों पर विचार-विमर्श है।

साहित्य संचय प्रकाशन तथा संपादक बधाई के पात्र है। कारण इस समय यह विचारधारा देश के लिए कितना महत्वपूर्ण है,इसका प्रमाण हम अपने सामने देख रहे हैं।

【डॉ.रणजीत कुमार सिन्हा

खड़गपुर कॉलेज,खड़गपुर पश्चिम मेदिनीपुर,】

LEAVE A REPLY