पुस्तक समीक्षा : शब्द हुआ करते हैं दर्पण

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समीक्षक : अवधेश कुमार ‘अवध’
सम्पादक : श्री अशोक सिहासने ‘असीम’
प्रकाशक : मनु प्रकाशन, बालाघाट, मध्य प्रदेश
संस्करण : प्रथम
मूल्य : रुपये 150/- मात्र

‘मेरी साँसों को नया संसार दे माँ शारदे’ के दैन्य अनुनय विनय के साथ साहित्य के उस द्रोण का दर्शन होता है जिसमें अलंकृत काव्य नौ रसों से आप्लावित होकर हृदय पर अधिकार कर लेता है । नवागत, स्थापित और प्रवर्तक द्वादश कलमकारों की तकरीबन एक सौ पच्चीस रचनाएँ एक सौ अट्ठाइस पृष्ठों में गीत, ग़ज़ल, छन्द और अतुकान्त कविता के रूप में अंकित हैं ।

पुस्तक संस्कृति के होते लोप ने रचनाकार अशोक को शोक के समन्दर मे डुबो दिया जहाँ से मंथन के उपरान्त “असीम” सम्भावनाओं से लबरेज़ सम्पादक अशोक का उद्भव हुआ । सम्पादक सारस्वत और सचेत सम्पादकों की अग्रिम पंक्ति में इसलिए भी जगह पाता है कि जिन बारह रचनाकारों को चुना गया है उन लोगों ने सम्मिलित रूप से बारह मूल विषयों का भाव कलश स्थापित किया है । इंसान, प्यार, वक्त, ज़िन्दगी, नशाखोरी, नारी, बेटी, रिश्ता, दहेज, बचपन, हिन्दी और भारत माता के विविध आयामों को हृदय और बुद्धि के संतुलित नज़रिए से देखने और दिखाने का नाम ही है “शब्द हुआ करते हैं दर्पण”।

पावन प्रेम कवयित्री पं. आभा अनामिका की लेखनी से –
” छू लो तुम जो मुझे सजन जी,
मैं चंदन बन जाऊँ ।
होठों से जो मुझे जुठा दो,
गंगाजल बन जाऊँ ।।”

कवि अशोक सिहांसने “असीम” जी की गीतिका “मैं भी बोलूँ तू भी बोल” का एक शेर रखना लाज़मी होगा –
“क्या होगा अंजाम जगत का, आओ सोचें आज ‘असीम’ ।
कन्या भ्रूण की गर्भ में हत्या, मैं भी बोलूँ तू भी बोल ।।”

एक नारी की ख़्वाहिश को जग जाहिर करते हुए कवयित्री अरविन्द “सपना” ताम्रकार जी कहती हैं –
“मेरे हिस्से का थोड़ा सा
आकाश मुझे दे दो,
इसके सिवा मैं और
कुछ नहीं माँगती ।”

कवयित्री कल्पना पाण्डेय राम रहमान को एक बताने की कोशिश करती हैं-
“सुबह -सुबह मन्दिर की घंटी
मधुरिम स्वर में गाती है ।
ईश्वर – अल्लाह एक हैं दोनों
हमको पाठ पढ़ाती है ।।”

डॉ. मुरली मनोहर श्रीवास्तव की लेखनी बहुमुखी और सारगर्भित संदेश देती है । किसान के दुखान्त पर कवि सवाल करता है-
“एक प्रश्न मानवतावादी, जन-जन सत्ताशासी से ।
सबको जीवन देने वाला, क्योंकर लटका फाँसी से ।।”

प्रेम में पाने और खोने की गणित लगाते हुए कवयित्री मुग्धा सक्सेना कहती हैं-
“प्रेम किया हम दोनों ने,
पर पाया सिर्फ तुमने,
और खोया सब अपना मैनें।”

“माँ को लूटा
बहनों को लूटा
अब किसकी है बारी?”
कवयित्री मोनिका जैन के ये सवाल पुरुष प्रधान मानसिकता की जड़ें हिला देते हैं ।

समय के परिवर्तन को आशावादी दृष्टिकोण से देखते हुए कवि पं. मुकेश चतुर्वैदी ‘समीर’ का एक शेर द्रष्टव्य है –
“दरख़्तों से पत्तों के गिरने का मतलब,
बहारों के दिन पास आने लगे हैं।”

‘जुगनू तेरा नाम’ में कवयित्री प्रतिमा बाजपेयी ने क्या खूब कहा है –
” अनुपम कृति तुम ईश की,
जुगनू तेरा नाम ।
निशा गहन घनघोर हो,
उस पल तेरी शान ।।”

पेशे से चिकित्सक डॉ. रजनीश श्रीवास्तव द्वारा विरचित काव्यों की सौगात उल्लेखनीय है और साथ ही बेहतरीन शब्द संयोजन देखें-
“सिर्फ तुकबंदी बनाना ही,तेरा मकसद न हो,
तेरे बोलों में जरा सी,जान होनी चाहिए ।
आप सबसे आज है,’इल्तिजा’ रजनीश की,
शब्द की हर शब्द से, पहचान होनी चाहिए ।।”

“तू अनमोल धरोहर ऐसी, कर्ज कैसे चुकाएँगे।
बेटी को यूँ मार दिया तो, बहू कहाँ से लाएँगे ।।”
कवयित्री सोना जैन की यह कविता सोचने पर विवश कर देती है ।

कवयित्री वंदना गुप्ता का गीत ‘चलो सृजन के दीप जलायें’ में पावन उद्देश्य का आह्वान निहित है –
संस्कृति की पावन क्यारी में,
जीवन  आशा   फुलवारी में।
त्याग समर्पण के भावों सँग,
संस्कारों के सुमन खिलायें ।।

इस काव्य पुस्तक को आज की प्रतिनिधि पुस्तक मानना उचित रहेगा । ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी माँ शारदे, वेणु से सुदर्शन चक्र के प्रवर्तक भगवान कृष्ण, साध्वी मीरा तथा मोक्षदायिनी माँ गंगा पर सृजन हमें अपनी धरोहर से जोड़ता है । माँ, व्यशन,भ्रूण हत्या, नारी की दुर्दशा और दहेज पर आधारित रचनाओं से समाज का स्वरूप परिलक्षित है । भारत माता, गाँव, देशभक्ति, हिन्दी और मज़हब को विषय बनाकर लिखी गईं रचनाओं से राष्ट्रीयता की भावना को बल मिलता है । ‘चूहा की रपट’, ‘जुगनू तेरा नाम’ और ‘बेलगाम घोड़ा’ शब्द शक्ति त्रयी के परिपोषक हैं । ‘लाई गई ग़ज़ल’, काव्यांगों की सौगात’, ‘देखो मेरी ज़िन्दगी’ और ‘हिन्दी की चिंधी’ विविध विषयक बेहतरीन सृजन है ।

ग़ज़ल, गीत, तुकान्त व अतुकान्त कविता, एवं कुछेक छंदों में विविध रसों, अलंकारों तथा सार्थक शब्द संयोजन से परिपूर्ण श्री अशोक सिहांसने “असीम” की कुशल लेखनी से सम्पादित यह पुस्तक साहित्य के क्षेत्र में प्रेमियों एवं साधकों के लिए अनमोल उपहार है ।

अवधेश कुमार ‘अवध’

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