पुस्तक समीक्षा- रुनू बरुवा का ‘श्रद्धार्घ’

0
27

पुस्तक समीक्षा

रुनू बरुवा का ‘श्रद्धार्घ’

समीक्षक : अवधेश कुमार ‘अवध’

संस्करण : द्वितीय      मूल्य : रु० 150/-

पूर्वोत्तर के असम प्रान्त में हिन्दी भाषा व साहित्य की चर्चा डॉ. रुनू बरुवा द्वारा विरचित ‘श्रद्धार्घ’ के बिना पूरी नहीं हो सकती । बासठ वर्षीय कवयित्री द्वारा सन् 1962 से सन् 2005 तक के दीर्घकालीन सफ़रनामे की विविध अनुभूति – पुष्पों का गुलदस्ता ही तो है श्रद्धार्घ ।
आदरणीय अटल बिहारी बाजपेयी, स्व० भूपेन हजारिका, स्व० इन्दिरा गोस्वामी, स्व० नुरुल हक, जितुजी एवं श्री राजेन्द्र परदेशी द्वारा प्रशंस्य श्रद्धार्घ में 108 रचनाओं का समावेश है । कविता, गीत, ग़ज़ल व नग्मों के समाहार द्वारा कवयित्री ने स्वप्नों को अमलीजामा पहनाने का भरसक प्रयास किया है । ‘सरहद पार’ में ‘सैयाद से नफ़रत कर क्या होगा, जब हो जाए पिंजरे से प्यार’ के माध्यम से गुलामी की मानसिकता को धिक्कारते हुए स्वप्रयत्न पर जोर दिया है । बच्चों के प्रति माँ की भावना प्रकट हुई –
‘कहते बच्चे हैं कि माँ हमारी अच्छी है,
हमारे जैसी नादान मगर मन की सच्ची है ।
फिर भी मन चाहता है मेरा, देना उनको,
जो पाया नहीं मैने, दूँ मैं वो प्यार उनको ।।’

‘बीत गया’ कविता में लेखनी लोक जीवन में बोल उठी –
‘गोबर उठाती बुआ, दादी पकाती रोटी।
माँ बुहारा करती, मेरी बनाती चोटी ।।’

‘मानव मन’ की उड़ान देख सकते हैं –
‘मानव मन प्रहेलिका बन
कूद जाता है
इस अंधे कुएँ में ।’

‘पता है’ कविता में ऐसा लगता है जैसे कुछ भी पता न हो –
‘दर्द मुझे है, तुम्हें भी है
किसे कितना नहीं पता !
अच्छे तुम , अच्छी मैं भी
कौन कितना, किसे पता !’
‘खामोशी’, ‘दर्द का रंग’, ‘प्रकृति का आँचल’, ‘स्वप्नलोक’ व ‘काति बिहु’ कविताएँ दिल को छू जाती हैं ।

अंग्रेजी साहित्य की छात्रा होने तथा अमेरिका, यूरोप और आस्ट्रेलिया के बहुतेरे देशों के भ्रमण के बावजूद भी हिन्दी की साधना प्रमुख लक्ष्य रहा है । विक्रमशिला विश्वविद्यालय ने उत्कृष्ट सेवाओं को देखते हुए सन् 2011 में विद्यावाचस्पति की उपाधि से सम्मानित किया । हिन्दी, असमीया और अंग्रेजी में समाधिकार रखते हुए ये इंडियन रेडक्रास सोसायटी, पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी, पूर्वाशा साहित्य अकादमी और अखिल भारतीय साहित्य परिषद् असम आदि कई संस्थाओं को अपनी सेवा दे रही हैं । नूतन साहित्य कुंज ने साहित्य व संगीत में विलक्षण योगदान हेतु ‘रागिनी’ उपनाम से सम्मानित किया ।

वर्तनी सम्बंधी कुछ अशुधियों एवं काव्य विधान में अल्पांश दोष के बावजूद भी भाव के धरातल पर श्रद्धार्घ की छाप अमिट है । काव्य एवं गद्य की कई विधाओं पर आपकी पकड़ देखी जा सकती है । अनुवाद में भी आपकी लेखनी का जादू सर चढ़कर बोलता है ।

समग्रता, विविधता, लोक जीवन और सामासिक संयोजन श्रद्धार्घ में एक साथ परिलक्षित है जो पिता जी को अनमोल तर्पण के साथ कवयित्री की व्यापक एवं तीक्ष्ण सोच का परिचायक है । भाव को बोधगम्य बनाने हेतु भाषाई पूर्वाग्रह से बाहर निकलकर किसी भी भाषा के व्यावहारिक व प्रचलित शब्द – प्रसून को चुनने से परहेज़ नही है । ब्रह्मपुत्र घाटी से बराक घाटी को जोड़ने वाली हिन्दी – सेतु निर्मात्री के तेज से असम सहित पूर्वोत्तर का साहित्य जगत आलोकित है ।

अवधेश कुमार ‘अवध’

LEAVE A REPLY