पुस्तक समीक्षा-त्रिशा

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लिखूँ समीक्षा “त्रिशा” की ,साक्षी हों महादेव,
निष्ठा से यह कर पाऊं, प्रसन्न हों कामदेव।
“त्रिशा” डॉ मनोज कामदेव द्वारा रचित एक दोहा संग्रह है जो बेटियों को समर्पित है। बेटियां एक ऐसा विषय है, एक ऐसा सौभाग्य है, एक ऐसी नेमत है जो ईश्वर केवल सौभा ग्यशलियों को ही प्रदान करता है क्योंकि जो सौ(100) भाग्य लेकर आती है वह है बेटी।एक पिता के लिए बेटी का क्या स्थान होता है इसकी व्याख्या के लिए शायद शब्दों की कमी पड़ जाए।
 यह दोहा संग्रह भी कामदेव जी ने अपनी बेटी ‘त्रिशा’ के कहने पर या यूं कहें कि उसकी जिद करने पर ही उसे समर्पित किया है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। इस प्रकार यह एक पिता द्वारा प्रेम प्रदर्शित का एक माध्यम बन पाया है। वैसे तो साहित्य सृजन अपने आप में बहुत बड़ा कार्य है क्योंकि यह साहित्य जब एक बड़ा उद्देश्य लेकर लिखा जाता है तो यह समाज के लिए, परिवार के लिए, देश के लिए और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक संदेश होता है क्योंकि शब्द ‘ब्रह्म’ होते हैं और यह कभी नष्ट नहीं होते और जब पुस्तक रूप में यह संग्रहित हो जाते हैं तो इनकी महत्ता और बढ़ जाती है। प्रस्तुत दोहा संग्रह की भूमिका सुप्रसिद्ध कवि एवं साहित्यकार डॉ रूपचंद शास्त्री ‘मयंक’ जी  द्वारा लिखी गई है जिससे इसकी उपादेयता में और वृद्धि हो जाती है। कामदेव जी ने इस पुस्तक के माध्यम से दोहा विधा के साथ वर्तमान समाज से संबंधित और वर्तमान समाज में व्याप्त लगभग सभी विषयों को स्पर्श किया है और उस पर अपने विचार प्रस्तुत किए हैं।150 शीर्षकों वाला  प्रस्तुत संग्रह बहुत ही प्रासंगिक और महत्वपूर्ण है । इसी के साथ-साथ यह सार्वकालिक भी है क्योंकि यहां जो ज्वलंत मुद्दे हैं वो हमेशा से ही हमारे समाज में व्याप्त रहे हैं। मनोज कामदेव जी ने इन दोहो  को एक शीर्षक के माध्यम से चार-चार दोहों में विभाजित कर दिया है ताकि इन्हें एक परिवार, एक समुदाय मिल सके और इन दोहों को एक समग्रता प्राप्त हो सके । वैसे तो दोहा विधा अपने आप में स्वतंत्र है। दोहा विधा एक ऐसी विधा है जो दो लाइनों में ही अपनी बात पूरी कहने की क्षमता रखती है ।इसीलिए मनोज कामदेव जी बहुत सी विधा में लिखने के बाद जब दोहा विधा में लिखने लगे तो उसके बाद से उन्हें कोई और विधा में लिखना रास ही नहीं आया ।इसीलिए उन्होंने यह दोहा संग्रह हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है। दोहा अपने आप में एक पूर्ण विधा मानी जा सकती है क्योंकि इन दो लाइनों में ही कहानी, कविता या निबंध का सार होता है। इसलिए शब्दों का चयन ,मात्राओं का ध्यान यह सब लेखक के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है और कामदेव जी इस कार्य में पूर्णतया सफल पाए गए हैं। पुस्तक के मुखपृष्ठ पर ही सुंदर ,सौम्य छवि के साथ जो दोहा दिया गया है वह भारत वर्ष में प्रत्येक कन्या का प्रतिनिधित्व करते हुए दिया गया है और भारत सरकार द्वारा चलाए गए “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” मुहिम का एक हिस्सा सा जान पड़ता है….
  “घर में कन्यारत्न हो, खुशियां आठो याम।
 बिन कन्या सबको लगे, सूनी सुबहो शाम”।
 यानी सबसे पहले तो यहाँ कन्या को “रत्न” की संज्ञा दी गई है और उसके बाद उसके घर में पैदा होते ही किस प्रकार हर तरफ खुशी छा जाती है यह बताया गया है और उसके ना रहने पर सूनी सुबह और सूनी शामें हो जाती हैं। यहाँ एक बेटी की महत्ता का वर्णन किया गया है कि एक बेटी घर में कितनी महत्वपूर्ण है चाहे वह एक बेटी की तरह रह रही हो या चाहे वह एक बहू की तरह क्योंकि यदि घर में बेटी और बहू दोनों ही ना हो तो वह घर, घर नहीं लगता ।बहुत सूनापन लगता है
 डॉ मनोज कामदेव जी ने अपने दोहों के माध्यम से अपने चरित्र, अपनी भावनाओं, अपनी सौम्यता, अपने प्रेम, अपनी सामाजिकता, नैतिकता ,धर्म परायणता इत्यादि इन सब का निर्वहन करते हुए एक जिम्मेदार व्यक्तित्व और भारतवर्ष के जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य निभाते हुए एक साहित्यकार की भूमिका का भी बहुत ईमानदारी के साथ एवं निष्ठा के साथ निर्वहन किया है। मैं उनके इस प्रयास और उनके कार्य की हृदय से प्रशंसा करती हूं एवं उन्होंने मुझे अपनी पुस्तक प्रदान करके मुझे समीक्षा के लिए मेरा रिक्त समय मांग कर मुझे कृतार्थ किया है। यह मेरे लिए परम सौभाग्य की बात है एवं यह उनकी विनम्रता ही है। मैं इस पुस्तक पर समीक्षा प्रदान करके अपने आपको गौरवान्वित समझ रही हूं एवं मैं मनोज कामदेव जी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं प्रदान करती हूं कि वे इसी प्रकार सामाजिक विषयों पर अपने लेखनी चलाते रहें एवं समाज के सामने अपनी प्रतिभा अनुरूप साहित्य सेवा करते रहें।
 एक बार पुनः उन्हें बधाई प्रदान करते हुए उनके उज्जवल भविष्य की कामना करती हूं।
प्रस्तुत समीक्षा को सरल और अधिक सुपाठ्य बनाने हेतु मैं भी इसके 150 शीर्षकों को 10- 10 के एक समुच्चय में  विभाजित करके इनकी समीक्षा प्रस्तुत करने का प्रयास करती हूं । समीक्षा समालोचना पर आधारित होती है।  किसी भी रचनाकार के मन, भावनाओं, लक्ष्य और उसकी तह तक  पूर्णतया पहुंच पाना असंभव कार्य  है ।फिर भी प्रयास करना हमारा कर्तव्य है क्योंकि
  “पूर्णता केवल ईश्वर में विद्यमान है”।
इसी कड़ी में पहले समुच्चय के अंतर्गत निम्न शीर्षकों के अंतर्गत कामदेव जी ने अद्भुत दोहों का संग्रह किया है  यह शीर्षक क्रमशः हैं कन्यारत्न ,आधुनिक युवा, आज के गांव, मैली गंगा ,वृक्ष, ज्ञान बांटते रहो, किसान, माँ, स्कूलों की मनमानी और दहेज। प्रस्तुत शीर्षकों से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस तरह के महत्वपूर्ण विषय कामदेव जी द्वारा उठाए गए हैं। कन्या रत्न, माँ, ज्ञान बांटते रहो आदि ऐसे विषय हैं जिनके बारे में हम जितना भी सोच पाएं ,जितना भी लिख पाएं शायद  यह विषय कभी पूर्ण नहीं हो सकते क्योंकि ना तो कन्या रत्न की सीमा है, ना माँ की भावनाओं की, उसके प्रेम की, उसके त्याग की, और ना ही ज्ञान की ।ये सब प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में  बहुत महत्वपूर्ण है और माँ के बिना तो जीवन संभव ही नहीं है। इसी संबंध में मैं अपनी स्वरचित कविता की दो पंक्तियां भी अवश्य कहना चाहूंगी कि……
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“माँ है तो कृष्ण है, राम है, बलराम भी है क्योंकि,
 माँ के बिना असम्भव इन्सान तो क्या ,भगवान भी है” ।
माँ पर कामदेव जी के विचार देखिए…..
 “पूरा जीवन होम कर, पाला निज परिवार ।
उस माँ को मिलती नहीं ,घर में रोटी चार” ।
यहां पर उन्होंने वर्तमान स्थिति पर एक दृश्य प्रस्तुत किया है कि जिस प्रकार  एक माँ अपने पूरे जीवन की आहुति दे देती है अपने परिवार और अपने बच्चों को संभालने के लिए ।परंतु जब वह वृद्ध होती है तो उसको रखना उसके बेटों के लिए एक मुसीबत बन जाती है । किस प्रकार लोग अपने माता-पिता को वृद्ध आश्रम में छोड़ आते हैं। वह माँ जो आपने मुंह से निवाले निकालकर अपने बच्चों को देती है ,समय बीतने पर उसी के घर में उसी के लिए दो वक्त की रोटी निकालना मुश्किल हो जाता है। यह बहुत बड़ी विडंबना है और हमारे समाज की भयावह,चिंतनीय वर्तमान स्थिति है।
 क्योंकि प्रस्तुत दोहा संग्रह कन्यारत्न पर आधारित है इसीलिए इसका एक उदाहरण देखें…..
 “लक्ष्मी का नूर है वो सरस्वती का अंश।
मत रख उससे बैर तू ,लग जाएगा दंश”।
  किस प्रकार कामदेव जी ने एक पुत्री की व्याख्या की है और यदि हम कन्यारत्न को हृदय से अपनाते नहीं है, उसके जन्म का उत्सव नही मनाते, संपूर्ण प्यार से,खुली बाहों से उसका स्वागत नहीं करते अपितु इसके विपरीत कन्या भ्रूण हत्या की तरफ कदम बढ़ाते हैं तो वह एक चेतावनी है। इस प्रकार कामदेव जी ने एक पुत्री की महत्ता का वर्णन किया है एवं समाज में व्याप्त  लिंगानुपात की असमानता पर भी उन्होंने ध्यानाकर्षण किया है।
 ज्ञान पर उनके विचार देखिए……
 “ज्ञान समंदर विचित्र है, जो डूबे सो पाए ।
जो भी देखे दूर से, खाली हाथों जाए” ।
किसान और वृक्ष पर भी उन्होंने जो अपने विचार प्रस्तुत किए हैं वह बहुत ही सुंदर है क्योंकि किसान अन्नदाता है और हमारे पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने भी नारा दिया था “जय जवान, जय किसान”।
 किसान की महत्ता और उनकी वर्तमान स्थिति पर उनके विचार देखें …..
“दबकर भारी कर्ज से, जीना हुआ हराम।
 तिल-तिल कर पिसता रहा,मिला नहीं आराम”।
कामदेव जी ने अपने इस दोहा संग्रह में वर्तमान परिस्थितियों का एक बहुत सुंदर आकलन प्रस्तुत किया है ।यह बहुत बड़े सामाजिक मुद्दे भी हैं कि किस प्रकार आजकल प्राइवेट स्कूल मनमानी कर रहे हैं, उस पर उनके विचार देखिए…..
 “भारी बस्ता पीठ पर, चले स्कूल की ओर।
 पीठ दोहरी हो रही, ढोते बोझ किशोर।”
 और इसी के साथ…
“हर नुक्कड़ पर खुल गई, विद्या की दुकान। सुनकर मोटी फीस को, मात पिता हलकान”।
 आजकल हर दूसरी गली के मोड़ पर तरह-तरह के प्राइवेट स्कूल खुले हुए हैं जो अपने मन मुताबिक फीस तथा उसी के साथ अपने स्कूल की किताबें, बैग, यूनिफॉर्म, स्टेशनरी और भी न जाने क्या-क्या क्या लेने पर मजबूर करते हैं  यह एक बहुत बड़ा सामाजिक मुद्दा था जिस पर हमारी सरकार ने बहुत बड़ा कदम उठाया और प्रत्येक स्कूल में एनसीईआरटी की किताबों की पढ़ाई को आरंभ करवाया जिससे ना केवल माता – पिता पर अवांछित बोझ कम हुआ और उसी के साथ-साथ बच्चों के भारी बस्तों पर भी इसका प्रभाव दिखाई दिया। परंतु फिर भी यह समस्या छोटे शहरों में अधिक दिखाई दे रही है ।
कामदेव जी बहुत ही सजग लेखक हैं। उनके साहित्य सृजन का लक्ष्य केवल “स्वान्त सुखाय” नहीं है। वह जनहित तथा सामाजिक, नैतिक भावनाओं को प्रस्तुत करते हैं और साथ ही इन विषयों पर अपने पाठक को सोचने पर मजबूर भी करते हैं जो एक सच्चे साहित्यकार की पहचान है।
अगले समुच्चय में क्रमशः जय जवान, साहित्यकार, नफरत, मजदूर, महंगाई ,मुनाफाखोर , भिखारी, आशावाद, धन दौलत और बेरोजगार नामक शीर्षक सम्मिलित है किए गए हैं। जैसा कि हम पहले भी कह चुके हैं कि जितने भी शीर्षक हैं वे सभी एक आम इंसान की जिंदगी से कहीं ना कहीं संबंधित हैं। कुछ भाव हैं ,कुछ समस्याएं हैं, कुछ पीड़ा है, कुछ सृजन है कि जिस प्रकार साहित्यकार शीर्षक के अंतर्गत लिखा गया है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति में कहीं ना कहीं एक साहित्यकार होता है जो इस भावनाओं को अच्छे शब्द प्रदान कर देता है वह प्रसिद्ध हो जाता है वर्ना अपने मनोभावों को तो  हर कोई अभिव्यक्त कर ही लेता है।
 जैसे कामदेव जी कहते हैं…
 “सबकी जो पीड़ा लिखें ,रहता सदा फकीर।
 सबको सब कुछ सौंपता, बेचे नहीं ज़मीर”।
  कितने सुंदर विचार प्रस्तुत किए हैं ।वर्तमान में ऐसे ही साहित्यकारों की आवश्यकता जान पड़ती है।इसके बाद मजदूर और महंगाई की बात की गई है ।आज जहां हर तरफ बेरोजगारी है तो एक मजदूर की कैसी हालत हो जाती है वह कामदेव जी ने कितने सुंदर शब्दों में बताया है ….
“मई दिवस पर ही सही, सोच रही सरकार।
 कम से कम अब तो श्रमिक, दिखे नहीं लाचार”।
यानी कि उनकी सोच अंतरराष्ट्रीय स्तर तक मजदूरों के बारे में ,वर्तमान समस्याओं के बारे  है और अपने पाठकों को भी  वे इस  पर सोचने पर मजबूर कर रहे हैं। इसके बाद महंगाई के बारे में उनके विचार हैं कि किस प्रकार महंगाई आज आम लोगों की जिंदगी को कठिन से कठिन बनाती जा रही है। आज महंगाई सुरसा के मुंह की तरह केवल बढ़ती ही जा रही है। रोजमर्रा की जिंदगी जीने के लिए भी इंसान को बहुत मेहनत करनी पड़ती है। उनके शब्दों में…..
” महंगाई की आग से, बन रहा है देश।
 कैसे अपना घर चले ,कैसे मिटे क्लेश”।
 जिस प्रकार कामदेव जी ने इन दोहो का संग्रह किया है वे सब एक चेन की तरह सम्बद्ध नजर आते हैं। महंगाई के बाद मुनाफाखोरी के बारे में उन्होंने अपने विचार प्रस्तुत किए हैं कि किस प्रकार हमारे देश में हर चीज को मुनाफाखोर अपने पास स्टॉक में जमा कर लेते हैं और उसी के कारण महंगाई बढ़ती है जिससे आम लोगों को प्राथमिक जिसे भी प्राप्त करना बहुत मुश्किल हो जाता है। हर त्योहारों पर , किसी प्राकृतिक विपदा पर, किसी देशव्यापी संकट पर ये मुनाफाखोर केवल अपना ही फायदा देखते हैं। आम जनता की पीड़ा, उनके दर्द उनके दुःख से इन्हें कोई लेना-देना नहीं है। इन्हें सिर्फ अपने फायदे से मतलब है जैसे ….
“लालच की सीमा बढ़ी, इंसानों में आज।
 अपना घर भरते सदा, देखे नहीं समाज”।
 मनोज जी ने अपनी टीस को इन दोहों के माध्यम से हम सभी के समक्ष प्रस्तुत किया है। इससे यह ज्ञात होता है कि वे समाज को कितनी गहराई तक देखते हैं, समझते हैं एवं महसूस करते हैं।
 इसके बाद भिखारी के बारे में भी उनके विचार देखते ही बनते हैं…
 “फुटपाथ पर सो रहे ,सहमे हुए किशोर।
पता नहीं कब चल बसे ,सांसो की  ये डोर”।
 उन्होंने आम जनता जो कि हमारे छोटे शहरों से आकर बड़े शहरों में बस गई है जिन्हें घर नहीं मिलता तो वे लोग फुटपाथ पर सोते हैं और इन फुटपाथ पर किस-किस तरह के अपराध होते हैं तथा फुटपाथ पर जिंदगी किस प्रकार की होती है यह भिखारी के माध्यम से उन्होंने बहुत सुंदर तरीके से दर्शाया है।
 इसी के साथ धन दौलत नामक शीर्षक में उन्होंने अपने मन के भावों को बहुत सुंदर तरीके से हम सबके सामने प्रस्तुत किया है।
” मन में जब तक लोभ है, बुझे ना धन की प्यास।
 दौलत पाकर भी रहे, मन से सदा उदास”।
 यह अप्रत्यक्ष रूप से मुनाफाखोरी के लिए एक सीख भी है और इस तरह वे समाज को भिखारियों से मुनाफाखोरों से मुक्त करना चाहते हैं ताकि धन का एक संतुलित बटवारा बना रहे और महंगाई की मार से मध्यमवर्ग भी पीड़ित ना हो।
अगले समुच्चय में क्रमशः बाल मजदूर, पर्यावरण, कैसी आजादी, रिश्ते, भूखा ,शिक्षक, पानी ,आज के नेता ,गर्मी और आज का समय नामक शीर्षकों से दोहों का संकलन किया है। यह भी सभी विषय अपने आप में बहुत ही प्रासंगिक हैं ।बाल मजदूरी एक राष्ट्रीय समस्या है जिस पर बहुत से कानून भी बनाए गए हैं। प्राथमिक शिक्षा का अधिकार इसीलिए प्रदान किया गया है ताकि बाल मजदूरी को कम किया जा सके। मिड डे मील भी इसी वर्ग में आता है। यह समस्या मनोज जी को बहुत दु:खी करती है तभी उन्होंने यह लिखा है कि….
 “प्यारा बचपन खो गया, सहकर अत्याचार।
 ऐसी जिल्लत झेलकर, टूटे ख्वाब हजार”।
 वे बाल मज़दूरी को रोकना चाहते हैं। इसके बाद पर्यावरण की बात आती है। यह भी एक ज्वलंत मुद्दा है  आज जिस प्रकार पर्यावरण और प्रदूषण एक वैश्विक समस्या बन चुकी है उस पर मनोज जी ने बहुत सुंदर विचार प्रस्तुत किए हैं…
 “होता पर्वत शिखर पर, बिन मौसम हिमपात। सावन बरसे माघ में ,भादो बिन बरसात”।
यह क्लाइमेट चेंज हम सभी के लिए एक बहुत बड़ी समस्या है और पर्यावरण संरक्षण हम सबकी जिम्मेदारी है। इस बात को मनोज जी अपने दोहों के माध्यम से बता रहे हैं। इसके बाद रिश्तो की बात की गई है। रिश्ते जो समाज का आधार हैं उसमें आजकल किस प्रकार बिखराव हो गया है ।संयुक्त परिवारों का चलन समाप्त होता जा रहा है ।एकल परिवार बढ़ते जा रहे हैं ।एकल परिवार में भी सिंगल पैरंट की भूमिका आज ज्यादातर देखने को मिल रही है। यह स्थिति बहुत ही शोचनीय है। इस पर मनोज जी कहते हैं …
“रिश्तो से परिवार में ,होता जो टकराव।
 लेकर उस टकराव को, फिर होता बिखराव”।
 बहुत बड़े सामाजिक समस्या के बारे में मनोज जी ने आमजन को चेताया है ।इसी के साथ शिक्षक ,पानी, आज के नेता, गर्मी  और आज का समय से संबंधित दोहे भी बहुत प्रासंगिक बन पड़े हैं।
तीसरे समुच्चय में क्रमशः जातिवाद ,बुजुर्गों का दर्द, मरीज, चमचागिरी ,शहर की हकीकत, हिंदी भाषा, हवस, शीत लहर ,भ्रष्टाचार और जीवन नामक शीर्षकों को सम्मिलित किया गया है ।यह सभी विषय भी हम सभी के जीवन में कहीं ना कहीं बहुत महत्वपूर्ण है और जीवन को बदलने की ताकत रखते हैं ।जातिवाद एक बहुत बड़ी समस्या है जो आरक्षण के साथ समाप्त होती नजर आती है। इसके बाद बुजुर्गों के दर्द की बात की जाती है कि किस प्रकार ये बुजुर्ग अपने जीवन को अपने परिवार के लिए समर्पित कर देते हैं ।परंतु जब यह बूढ़े हो जाते हैं तो एक बोझ बन जाते हैं। माता-पिता अपने बच्चों को चाहे वह संख्या में कितने भी हैं बहुत प्रेम से और बड़े सम्मान से ,समभाव से रखते हैं। परंतु बच्चे कितने भी हो परंतु उनसे दो माता-पिता नहीं संभाले जाते, यह जीवन की कटु सच्चाई है ।इसी को मनोज जी अपने शब्दों में बता रहे हैं कि….
 “कितने पतझड़ झेल कर, पाला था परिवार। आज सभी के सामने, करते अत्याचार” ।
ओल्ड एज होम की बढ़ती हुई संख्याओं ने इस हालात पर एक प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। इसके बाद मरीज, चमचागिरी ,शहर की हकीकत आदि में भी प्रासंगिक दोहों का संकलन किया गया है। इसके बाद हिंदी भाषा पर मनोज जी के विचार बहुत ही उत्तम कोटी के हैं ।हिंदी भाषा हम सभी की अपनी भाषा है। परंतु यह राष्ट्रभाषा नहीं बन पा रही है, अभी तक राजभाषा ही है यह एक बहुत बड़ी विडंबना है। परंतु यह सत्य है कि हिंदी जैसी सरल भाषा और वैज्ञानिक भाषा कोई नहीं है। यह इसकी व्याकरण से बिल्कुल स्पष्ट किया जा सकता है। मनोज जी भी कहते हैं ….
“हिंदी भाषा सरल है, कर लो इससे प्यार।
 शब्दों का इसमें भरा, है विशाल भंडार”।
 इसके बाद हवस के जरिए उन्होंने बलात्कार जैसी समस्या पर अप्रत्यक्ष रूप से रोशनी डालने का प्रयास किया है ।निर्भया कांड इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। मनोज जी के शब्दों में…
 
 “तड़प हवस की देखकर करते उल्टे काम।
 फिर खुद को ही कोसते, पिटे जो सरेआम”।
 आज के परिवेश में युवाओं के लिए यह एक अप्रत्यक्ष संदेश है। पोर्नसाइट्स एवं इसी तरह के अन्य सुलभ साधन ,इंटरनेट आदि की समस्याओं पर भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रकाश डाला गया है क्योंकि यदि यह उपलब्ध ना हो तो शायद इस प्रकार के परिवेश को थोड़ा सा नियंत्रित किया जा सकता है।
 इसी प्रकार शीतलहर, भ्रष्टाचार और जीवन से संबंधित दोहों का संकलन भी बहुत ही जीवंत बन पड़ा है क्योंकि जीवन से ज्यादा ‘जीवंत’ क्या हो सकता है?

डॉ विदुषी शर्मा

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