पुस्तक समीक्षा- युवाओं को पारंपरिक जीवन मूल्यों से जोड़ती: ‘वक़्त की परछाइयाँ’

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डॉ. अमरनाथ ‘अमर’  की पुस्तक ‘वक्त की परछाईयाँ’ एक निबन्ध संग्रह के रूप में प्रकाशित हुई है| यह एक ऐसा संग्रह है जो अमूमन देखने को कम ही मिलते हैं या सच मानिए तो कम ही लिखे गए हैं या लिखे जा रहे हैं| मेरा मानना है कि यह केवल एक निबन्ध संग्रह ही नहीं है बल्कि आज की युवा पीढ़ी के लिए एक सोच है, संदेश है, सीख है जो बताता है कि हमें अपने जीवन को कैसे जीना है, कैसे सार्थक बनाना है। सीख है कि कैसे हमें जीवन के मूल्यों को, संस्कारों को साथ लेकर चलना है| चिंता है, चिंतन है, विचार है कि हम आज किस ओर जा रहे हैं और हमें अपने भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए क्या करना है| इस पुस्तक में लेखक ने जीवन के अनेक रंगों को समाहित किया है। लेखक कहीं कलियों के मौन निमंत्रण के साथ, फूलों की मुस्कुराहट के साथ, मतवाले भवरों के गुंजन के साथ बसंत की बात करता है, खुशी, ताज़गी और खुशबू की बात करता है, उसे महसूस करने की बात करता है, उसके सौंदर्य बोध को समझने की बात करता है, उसे आत्मसात करने की बात करता है और इन सब को अपने जीवन में समाहित कर, उससे खुश होने की बात करता है तो कहीं राष्ट्रीयता की आराधना कर राष्ट्र को एक गुलदस्ते के रूप में बांधना चाहता है। विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक संदेशों के जरिए शांति, सद्भावना और प्रेम का संदेश देता है, इंसानियत का संदेश देता है|
 राष्ट्र के साथ-साथ अपनी धरोहरों के प्रति भी लेखक की चिंता साफ झलकती है| चाहे वह धरोहर हमारे बच्चे हों, युवा पीढ़ी हो या फिर हमारी प्रकृति और वातावरण|  एक तरफ लेखक युवा वर्ग को जीवन जीने की कला सिखाता है तो दूसरी तरफ उसे गंगा माँ की भी चिंता सताती है| वह आज की गंगा की तुलना 1984 की गंगा से करके परेशान हो उठता है| साथ-साथ वातावरण को भी प्रदूषित होते देखता है तो लोगों को जगाना चाहता है और कहता है कि इस धरती को बचा लीजिए, क्योंकि इसी से हमारा अस्तित्व है| वह राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता की दो पंक्तियां लिखते हुए कहता है कि –  “समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ है,समय लिखेगा उनका भी अपराध”  लेखक की संवेदनशीलता इस बात से पता चलती है कि एक पेन की दुकान ‘पेन इंडिया’ बंद हो जाने के कारण वह परेशान हो उठता है| पेन के मायने सिखाते हुए वह चाहता है कि मॉल तो हों पर साथ ही हमारी शिक्षा और सभ्यता के प्रतीक पेन की भी बड़ी-बड़ी दुकानें हों| वह पेन के प्रति अपने प्यार और लगाव को व्यक्त कर रहा है| वह चाहता है कि हर गली, मुहल्ले,गाँव, शहर में ‘पेन इंडिया’ जैसी अनेक दुकानें खुल जाएं और वहाँ बच्चों की लंबी कतारें लगी हों| इस पर लेखक, कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की पंक्तियों द्वारा कहता है कि – “अंधा चकाचौंध का मारा, क्या जाने इतिहास बेचारा, साक्षी है उनकी महिमा के सूर्य, चंद्र, भूगोल खगोल, कलम आज उनकी जय बोल”  पुस्तक मेले की बात करते हुए लेखक का कहना है कि यह एक महोत्सव है, आलोक पर्व है जहाँ पर तरह-तरह की पुस्तकों से,उनके शब्दों से ज्ञान की खुशबू छन-छन कर आती है साथ ही वह अपने गाँव के पुस्तकालय के बारे में बताते हुए खुश होता है, गौरवान्वित महसूस करता है और यह भी चाहता है कि ऐसे पुस्तकालय हर गाँव में होने चाहिएं। जहां हर तरह की किताबें बच्चे पढ़ सकें और सिर्फ पढ़े ही नहीं उसे अपने जीवन में भी उतार सकें| वह ज्ञान की मशाल जला कर समाज को नई दिशा देना चाहता है|  लेखक ने अपनी ज़िन्दगी के खट्टे-मीठे अनुभवों को भी इस पुस्तक में बहुत ही सुंदरता के साथ साझा किया है| कहीं प्रेम के महत्व को समझाते हुए लेखक कहता है कि वह मनुष्य, मनुष्य ही नहीं, जिसमें प्रेम और सौन्दर्य बोध ना हो। सौन्दर्य सिर्फ त्वचा या हाड मास का ही नहीं, सौंदर्य मन का, दृष्टि का, व्यवहार का, रहन-सहन का, सोच का, आत्मीयता का, प्रेम का, अपनत्व का और असीम आनंद का भी परिचायक है| यह प्रेम अंतर्मुखी होता है| मन की गहराई में ढूँढता है किसी को, पुकारता है किसी को और दौड़ पड़ता है, किसी के आमंत्रण पर|  ऐसा लगता है कि वह देश के महान व्यक्तियों को गहराई से जानना चाहता है, उतारना चाहता है अपने जीवन में और समाहित कर लेना चाहता है उनके हर संस्कारों को अपने में| बात चाहे स्वामी विवेकानंद की हो, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की, गांधी जी की, पंडित राजकुमार शुक्ल की या गणेश शंकर विद्यार्थी की, वह उन्हें ना भुलाए जाने की मनुहार करता है| इतना ही नहीं वह चाहता है कि हमारा युवा वर्ग उन्हें जाने, उन्हें आत्मसात करे और उनके बताए रास्तों पर चले।  माखनलाल चतुर्वेदी की कविता की पंक्तियाँ-  “मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर तुम देना फेंक, मातृभूमि की रक्षा करने, जिस पथ जाएं वीर अनेक” लिखते हुए लेखक ने राष्ट्र के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी का एहसास करवाने की कोशिश की है| हमें सोचने पर मजबूर किया है कि आज आज़ादी के 70 साल बाद भी हमें जहाँ होना चाहिए था, क्या हम वहाँ हैं? राष्ट्र के साथ-साथ लेखक नई परम्पराएँ देना चाहता है जो कि पश्चिमी सभ्यता से परे हों और इंसान को इंसान से जोड़े।  बात चाहे राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की, गोपाल सिंह नेपाली की, जयशंकर प्रसाद या अन्य किसी बड़े साहित्यकार की हो, वह उनकी कविताओं से उन्हें याद करता है और जैसे डूब जाता है उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को बयान करते करते। आधुनिकता के बदलते स्वरूप पर लेखक ने आधुनिकता के बारे में जो सुन्दर उदाहरण दिए हैं, वह सचमुच सोचने को मजबूर करते हैं कि हमारा समाज किस आधुनिकता की तरफ जा रहा है| वेलेंटाइन डे के बारे में लिखते हुए लेखक ने लिखा है कि वेलेंटाइन डे को वसंत उत्सव से तुलना करना उचित नहीं| सरस्वती पूजन से लेकर लोहड़ी, पोंगल, मकर सक्रांति और उसके बाद आने वाले कई सारे त्योहार प्रेम के त्योहार ही तो हैं| लेखक का कहना है वेलेंटाइन डे का तो प्रारम्भ ही संत वेलेंटाइन के बलिदान के शोक से होता है, जबकि हमारे वसंतोत्सव में नृत्य है, गीत है, संगीत है और श्रद्धा है|  लेखक का कहना है कि मैं पाश्चात्य जगत की संस्कृति का विरोधी नहीं हूँ पर जिस रूप में वेलेंटाइन डे मनाया जाता है, उसका समर्थन भी नहीं किया जा सकता| यह लेख लिखते हुए लेखक चिंतित होकर सोचता है कि हमें अपनी परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी को सौंपने में कहीं चूक तो नहीं हो गई| पारंपरिक मूल्यों के प्रति युवा पीढ़ी का दृष्टिकोण लिखते हुए लेखक चिंतित है| वह स्वयं से सवाल करता है कि युवाओं का पारंपरिक मूल्यों के प्रति दृष्टिकोण संतुलित नहीं है तो फिर क्या इन युवकों को यूं ही भटकने के लिए छोड़ दिया जाए| स्व से सर्व तक और फिर स्व की ओर भागते हुए देखा जाए| क्या ‘वसुधैव कुटम्बकम’, ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ की परिभाषा को एेसे ही कुंठित होते देखा जाए| नहीं कभी नहीं! लेखक को अभी भी कहीं ना कहीं इस घोर अंधकार के बीच एक उजाले की किरण नज़र आती है| वह कहता है कि हमारे युवाओं में अदम्य उत्साह, भरपूर क्षमता, दूरदृष्टि, पराक्रम और कर्मठता है बस, ज़रूरत है इन सब को पारंपरिक जीवन मूल्यों से जोड़ने की| वह इस कार्यभार को सौंपता है हमारे राजनीतिज्ञों पर, शिक्षकों पर और अभिभावकों के साथ-साथ टीवी चैनलों पर और कहता है कि अभी भी शेष नहीं अशेष बहुत है|  यहीं बच्चों के लिए लेखक का विचार है कि उन्हें कोई न कोई कला ज़रुर सीखनी चाहिए, क्योंकि यह अकेलेपन की साथी है, दुख में खुशी का पैगाम है और तंग क्षणों में रोज़गार का साधन भी। बच्चों को मिट्टी की मूर्तियाँ बनाते देख, संगीत की धुन निकालते देख लेखक कहता है कि चलिए न इन बच्चों से हम भी कुछ सीख लें| मिट्टी को उठाकर मानवता की मूर्ति निर्मित करें, संगीत की मधुर तान से कानों में संबंधों की मिठास घोलें और साहित्य के पन्नों में जीवन की उज्जवल धवल तस्वीर निहारें|  लेख ‘एक लोटा जल और थोड़ा गुड़’ के माध्यम से लेखक आज की युवा पीढ़ी को जाने अनजाने हमारे जीवन के मूल्य सिखा जाता है तो साथ ही नदियों को बचाने, जल को बचाने की महत्ता भी बताता है| यहाँ लेखक कहता है कि यदि गर्मी में आपके घर कोई मेहमान आ जाए तो सिर्फ सादा पानी नहीं, हो सके तो थोड़ा सा गुड़ भी साथ में ज़रूर रखें इससे उसकी मिठास को आप जीवन भर सुखद स्मृति के रूप में संजों कर रख सकेंगे। ‘छठ’ पर्व के बारे में बताते हुए लेखक का कहना है कि ‘छठ’ पर्यावरण की रक्षा, वनस्पतियों का सम्मान और नदी तालाबों की स्वच्छता सफाई का पर्व है|  “अचरा से गलिया बुहाराब, छठी मैया अइहन आज,
उगा हो सुरज देव अरध की बेर, केलवा के पात पर उगेले सुरज देव”।।  लेखन में लेखक की परिवार के प्रति, समाज के प्रति, देश के प्रति, वातावरण के प्रति, प्रकृति के प्रति आस्था, ज़िम्मेदारी और आने वाली पीढ़ी को भी शिक्षित करने तथा पारंपरिक मूल्यों से जोड़ने की भावना परिलक्षित होती है|
इस पुस्तक से पता चलता है कि लेखक का भारतीय संस्कृति और परम्परा में अटूट विश्वास है लेकिन पाखंड और अविश्वास का वह घोर विरोधी है| विषय को समझाने के लिए किसी काव्य या किसी उपन्यास की पंक्तियों को लेख में डाला गया है।वह पंक्तियाँ लेख में रोचकता बढ़ाने के साथ-साथ पाठक को उस विषय वस्तु पर सोचने को मजबूर कर देती हैं| पाठक पुस्तक को तल्लीनता के साथ पढ़ना चाहेगा, उसे गुनना चाहेगा और अपने जीवन में समाहित करना चाहेगा यही विशिष्टता है इस पुस्तक की।
पुस्तक -वक्त की परछाइयाँ
लेखक -डॉ अमरनाथ “अमर”
प्रकाशक- के बी सी प्रकाशन
                 दिल्ली
पृष्ठ संख्या –374
समीक्षा –   .सुषमा सिंह
सुषमा सिंह
लेखक एवं साहित्यकार

 

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