पानी पर शोणित बरसाकर, राजस्थान कहाया हूँ

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राजस्थानी पानी का पत, रखना अपनी पूजा है ।

सरफरोश को छोड़ न कोई, धंधा अपना दूजा है ।

गंगा – जमुना की गोदी मेंरहने वाले क्या जाने –

मरुथल में पानी बिन पानी, राजस्थान अजूबा है।

अपने सीने पर भारत का, नक्शा स्वयं बनाया हूँ ।
पानी पर शोणित बरसाकरराजस्थान कहाया हूँ ||

 

मेरे आँगन में प्रताप नेअकबर को ललकारा था ।

राणा साँगा  के  घावों  परयुद्धक्षेत्र  भी वारा था |
काम-तृषा में आतुर दुश्मनजब पानी की ओर बढ़ा –
तब पद्मिनियों ने जौहर करअपना नाम सँवारा था |

तृष्णा की मैं कठिन वेदनाप्राय: सहता आया हूँ |

पानी पर शोणित बरसाकरराजस्थान कहाया हूँ ||

 

प्यास  नहीं होने देंगे कमधनुष बाण तलवारों की |
धर्मभूमि की रक्षा खातिरचेतक पवन सवारों की |
वन पर्वत रणभूमि महल मेंचम्पा ही चम्पा दिखती –
जलकर जिसने क्षुधा अग्नि मेंचुनी मृत्यु सरदारों की |

मृगमरीचिका के चक्कर मेंबस तुषार ही पाया हूँ |

पानी पर शोणित बरसाकरराजस्थान कहाया हूँ ||

 

पन्ना के चंदन को पाकरप्यास बुझी बनबीरों की |
पर  पन्ना  ने  प्यास  बुझाईमाँ कहलाकर वीरों की |
झालामन्ना भी प्यासा थाराणा के रक्षार्थ मगर –
बन प्रताप अमरत्व पा गयानमन अवध‘ रणधीरों की |

गोरा बादल तक्षक वीरन को आवाज लगाया हूँ ।

पानी पर शोणित बरसाकरराजस्थान कहाया हूँ ||

 अवधेश कुमार अवध

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