राम के निष्कासित तुलसी

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राम ने सीता को महान बना दिया। अमर बना दिया।
कैसे? उन्होने ही तो सीता के सतीत्त्व की परीक्षा लेने के लिए उनकी अग्नी -परीक्षा ली और इतने पर भी उन्हे संतोष नहीं हुआ। एक धोबी के कहने मात्र से उन्होने गर्भ-धारण की हुई स्थिति में भी सीता को महल से बाहर निकाल दिया, वह भी रात में। छल से। खुद ने भी यह छल किया और उनके न चाहते हुए भी अपने छोटे भाई से भी यह छल करवाया। ऐसा करते समय माता के आज्ञाकारी राम ने अपनी माताओं को इस बात को बताने की आवष्यकता भी नहीं समझी। इसी प्रकार प्रजावत्सल और अति प्रतिष्ठित राजा राम ने इस कार्य हेतु अपने मंत्रियों से बात करने तक की नहीं सोची। यदि राम को अपने पर विष्वास नहीं था, वे इतने कमजोर थे तो, सीता को रावण की कैद से छुड़ाया ही क्यों? राम ने तो शबरी के जूठे बेर भी खाये थे पत्थर की शिला बनी अहिल्या में नवीन जीवन का संचार भी किया था किंतु, सीता ने तो राम के चरित्र की परीक्षा लेना तो दूर इस बात की सोची तक भी नहीं। जिन राम ने सीता पर इतने अत्याचार किये उनके इन
तमाम शोषण की भर्तसना करने के स्थान पर तुम कह रही हो शुचि, कि राम ने सीता को अमर कर दिया। फिर तो तुम यह भी कहोगी कि कृष्ण ने राधा से विवाह करने के स्थान पर रुकमणी से विवाह करके राधा को और उसके प्रेम को अमर कर दिया। लक्ष्मण ने सूर्पनरवा के नाक – कान काट कर सूर्पवनखा को अमर कर दिया और पांडवों ने द्रौपदी को पांचाली बना कर और इसके बाद भी उसे जुए में दाँव पर लगाकर, उसे अमर कर दिया तथा कौरवों ने उनका चीर – हरण करके उनके अमरत्त्व में चार चाँद लगा दिये। उसकी आंतरिक शक्ति, कृष्ण के प्रति उनकी भक्ति का विकास किया। यही सब ना? मेरी समझ में नहीं आ रहा है शुचि, कि तुम क्या बोल रही हो? क्या-क्या बोल रही हो? क्यों बोल रही हो?
मैं तुम्हें पूरी तरह सुन रही हूँ  शुचि, पर शब्दों का सुनना या पढ़ना मात्र ही तो पर्याप्त नहीं होता है। उनको समझना भी होता है और उनके अभीप्सित को जानना तथा गुनना भी होता है अन्यथा, शब्द मृतवत् हो जाते है और शब्द कभी मृतवत् हो ही नहीं सकते क्योंकि, ये ही तो परस्पर संवेदनाओं और विचारांे के संप्रेषण का कार्य करके व्यक्ति – व्यक्ति के बीच सहसंबद्धता बनाए रखते है। तुम बताओ शुचि कि तुम इतनी पीड़ित क्यों हो? क्या कहना चाहती हो? क्या संपे्रषित करना चाहती हो? अमृता मैं समझ नहीं पा रही हूँ कि आज का समाज कहाँ आकर खड़ा हो गया है?
त्रासदी ही त्रासदी। चारों तरफ त्रासदी ही नजर आ रही है। इसमें से चलो कुछ तो अर्थोपार्जन की विषम स्थितियों के कारण है जिन्होंने संयुक्त परिवार ही समाप्त नहीं किये वरन् सकल परिवारों के सुख – चैन और शंाति को भी तहस-नहस कर दिया है। बच्चों से लेकर बडे़ तक सब में कुंठा, तनाव और उत्पीड़न की स्थितियाँ बढ़ती ही चली जा रही है दिन दुगुनी और रात चैगुनी गति से। उलझी हुई, अभिव्यक्तियाँ दिन-प्रतिदिन ही और  भी उलझती ही चली जा रही हैं जिनसे स्वस्थ मानसिकता का विकास होने के बदले विश्रृंखलता, उच्छंृखलता, उत्पीड़न और क्रमशः इन स्थितियेां की बढ़ोतरी होती ही चली जा रही है जो रुकने का नाम ही नहीं ले रही। स्त्री – पुरुष, लड़का-लड़की, की ही हमेशा छटनी होती रहती है। इनका ही बटवारा होता रहता है। मनुष्य तो कोई बच ही नहीं पा रहा है। इसे और इसकी गति को यदि रोका नहीं गया तो यह स्थिति और इससे होने वाला विनाश किस पराकाष्ठा तक पहँुच सकता है, पहुँच जाएगा इसका तो अंदाजा तक
कोई नहीं लगा सकता है। छोटे – छोटे अबोध, मासूम बच्चे, जिनके रोटी के दांत आना तो दूर, दूध तक के पूरे दांत नहीं आए, वे तक इस वर्ग – भेद, लिंग – भेद की छटनी कर रहे हैं। करने में लगे हुए हैं। तो तू इससे इतनी परेशान क्यों हो रही है? और फिर तरे से इस तरह से परेशान होने से हो ही क्या जाएगा? तू कर ही क्या लेगी? कर ही क्या सकती है तू शुचि? क्या? क्या कहा अमृता, मैं क्या कर सकती हूँ? क्या कर सकती हूँ मैं? क्या कर लूंगी? यदि हर कोई ऐसा सोचने लगे तो दुनिया में कोई काम हो ही नहीं सकता। हो ही नहीं पाएगा। घनघोर काली रात की अंधेरी, सूनी सड़क पर किसी दीवार के सहारे रखे हुए किसी दीपक के प्रकाश का कम महत्त्व नहीं होता है। अमृता, यही क्या कम है कि मैं कह रही हूँ और तू सुन रही है। और सिर्फ सुन ही नहीं रही है वरन् समझने की भी कोशिश कर रही है। अमृता साउथ अफ्रीका में अत्याचार तो न जाने कितने ही भारतियों के साथ हुआ था पर टेªन से अपने को बाहर फेंके जाने पर अत्याचार के खिलाफ आवाज तो एक पतले – दुबले लड़के मोहनदास ने ही उठाई थी और फिर क्या हुआ उसका परिणाम? इसे मैं और तू क्या सारी दुनिया ही जानती है। गरम दल, नरम दल, मुस्लिम लीग और भी न जाने कौन – कौन, कितने ही रूपों में, कितने – कितने ही लोग अपने जान – माल की परवाह किये बिना ही कूद पडे़ थे आजादी की लड़ाई में और उसका परिणाम जो हुआ वह भी सबके ही सामने है। किसी भी अत्याचार के विरुद्ध जब – जब भी आवाज उठाई
जाएगी उसके सकारात्मक परिणाम को जिएंगी आने वाली पीढ़ियाँ। हाँ, इतना अवष्य है कि अलख जगाने वाले को कब – कब और क्या – क्या सहना पड़े इसका अंदाज लगा पाना भी, किसी के भी बस की बात नहीं होती है।
तुम्हारी ये सब बातें, तुम्हारा प्रलाप लग रहा है शुचि, और कोई भी इस अवस्था तक तब पहुँचता है जब उसको मर्मांतक पीड़ा होती है जो उससे सही नहीं जा रही होती है। उसे कोई रास्ता नहीं सूझता है पर उसकी यही पीड़ा यही छटपटाहट तो उसका दिशा – निर्देश करती है। उसका रास्ता बनाती है। बोलो, शुचि! क्या चाहती हो? बोलो। स्पष्ट करो अपने मन्तव्य को अपने अभीप्सित को। बोलूंगी मैं, जरूर बोलंूगी, अमृता तुमसे जरूर बोलूंगी। तुमसे नहीं कहूंगी तो और किससे कहूगी कौन सुनेगा।? यहाँ मरे ी बात को सुन भी लिया तो कौन समझेगा। अमृता महिलाओं पर अत्याचार हो रहे थे तो, महिलाओं ने उनसे छुटकारे के लिए आवाज उठाई। उठानी भी चाहिए थी। बहुत कुछ बदल गया उससे।  इसकी अति होने पर पुरुषों ने आवाज उठाई बहुत कुछ ठहर गया। ठिठक गया, बहुत कुछ।
महिला – दिवस हुआ। माँ – दिवस हुआ। पिता – दिवस हुआ। इन्हे सबने अपनी – अपनी नजर से देखा। अपनी – अपनी तरह से इनकी व्याख्याएँ की स्त्रियाँ प्रथमतः अपने को गौरवान्वित महसूस करने लगीं। तीन सौ पैंसठ दिनों में से एक दिन पाकर। पुरुषों में अभिमान जागा-हमने अपने लिए कुछ नहीं रखा, सब स्त्रियों को दे दिया। स्त्रियों की सोच ने करवट ली। हमें एक दिन दे दिया बाकी अपने लिये रख लिये। अच्छा बेवकूफ बनाया हमें। पुरुषों ने आत्मरक्षा में कहना शुरु कर दिया कि:- हमने कुछ नहीं किया। यह सब कार्ड बेचने वाली कंपनियों के शातिर दिमाग की उपज है। स्त्रियों ने अपने महत्त्व को प्रतिपादित करने की दृष्टि से कहना शुरु कर दिया कि – स्त्री माँ है। बहन है। बेटी है। वह सबका दायित्त्व निभाती है। इस तथ्य को जानने, मानने का उसे होश ही नहीं रहा कि ये तो पूरक रिष्ते हैं। पुरुष भी पति है। पिता है।
भाई है। बेटा है। वह भी अपना दायित्त्व निभाता है। दरसल बात कुछ और थी, कह कुछ और गए। और, वर्तमान में स्थिति कुछ ऐसी हो गयी? कि-’जाना था कौन दिशा कौन नगर भूल गए’ (उद्घृत) द्वन्द छिड़ गया स्त्री-पुरुष के, लड़का-लड़की के बीच। और फिर शुरु हो गया भावनाओं का संवेदनाओं का कत्ल-ए-आम सरे-आम भी और, घरो में भी।
परिणाम, गुमराही तो होना ही था। रेप, मर्डर आदि। और भी न जाने क्या-क्या। और ये केवल शुरू ही नहीं हुए वरन् तीव्र रफ्तार से भी होने लगे। यह पुरुष के दायरे की बात थी। यह सब सड़कों और बाजारों में ही नहीं होता रहा वरन् यह सर्वव्यापि हो गया।
स्कूल, घर, आॅफिस आदि सब जगह। सर्वव्यापि। शोर मच गया जोर-जोर से। जरूरी भी था। किंतु, स्त्रियों द्वारा समाज में निरंतर व्याप्त की जा रही विषमताओं की तरफ ध्यान जाकर भी नहीं जाता। इनके संदर्भ में ध्यान जाना अथवा कुछ भी दिखाई देना मुष्किल भी बहुत है क्योंकि उनके साथ रहा और रहता है श्रृंगार। बचपन से ही समाज प्रदत्त बेचारगी
का तमगा और तदनन्तर सुहागन का श्रृंगार। भरी हुई, मांग। पैरो में बिछुए। गले में मंगल – सूत्र। हथेलियों पर रची मेंहदी। कलाइयों में खनकती चूड़ियाँ और माथे पर चमकती बिंिदया तथा रगं – बिरंगें ओंठ और नाखनू । सभी कुछ मादक, बेचारा और रगं – बिरगा। सभी कुछ बेचारगी की चादर से ढका हुआ। बेचारी औरत, अबला नारी। कमजोर लड़की। और इसी सबने कितनियों को ही दिशाहीन और असंतुलित बना दिया। जानकर भी अनजान हुए लोग आपबीती के अतिरिक्त। सब कुछ कर सकती है वह, पुरुष का मनः शारीरिक शोषण, मर्डर लड़कियों और बच्चों की अपने बच्चों तक की खरीद-फरोख़्त, पति के मरने पर अपने मासूम बच्चों को अनाथ छोड़कर दूसरी शादी भी, पति के रहते हुए अपने प्रेमी के साथ भागने का काम तथा उसके साथ मिलकर अपने पति का मर्डर तक भी वह कर सकती है। नहीं कर सकती है वह तो हाँ एक काम नहीं कर सकती, वह किसी भी पुरुष को बंधवा बनाकर अपनी हवस भी पूरी कर सकती है पर वह जो नहीं कर सकती है वह एक ही काम है और वह है रेप। वह किसी का रेप नहीं कर सकती हैं इसलिये उसके हजार खून माफ हैं। उसका हर गुनाह माफ है। उसके किसी भी गुनाह के लिए सबकी दृष्टि पुरुष पर ही जाती है क्यांेकि वह तो नाजुक-नरम और बेचारी है।
उतार कर फेंक दीजिये उसकी बेचारगी की चादर को और फिर खुली आँख से देखिये कि क्या हो रहा है, क्या – क्या हो रहा है? इस समूचे समाज में। सच देखिये। सारी दुनिया का सच। आधा नहीं। आधा अधूरा नहीं। अधूरा देखने से कुछ भी पूर्ण नहीं हो पाता। कुछ भी पूर्ण नहीं हो पाएगा। इसलिये अपनी पूर्णता में उभय पक्षीय निरीक्षण तो करके देखिये कितने बेहतरीन और सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे और फिर आते ही चले जाएंगे। इतिहास गवाह है इस बात का कि जब – जब ऐसा हुआ है वक्त ने नई अंगडाई ली है। नव प्रकाश फैला है। इसलिये खुली आॅखों से देखिये कि क्या हो रहा है?
क्या – क्या हो रहा है? किस – किस रूप में हो रहा है? खुली आँखों से, खुले दिल और  दिमाग से देि खये, सोचिये और समझिये। ऐसा स्वयं स्त्रियाँ भी करें और पुरुष भी तो शायद रेप की घटनाएं भी काफी कुछ हद तक कम हो जाएं। पुरुषों का दारु पीना भी शायद स्वतः ही कुछ हद तक संतुलित हो जाए। दारु की दुकान वाले मरे से इस सुझाव और उसके सभ्ंवी परिणाम से मुझसे सभ्ंवतः कुछ नाराज हो जाएं। हो सकते हैं जरूर। उनकी दुकानदारी की कम होती संभावित स्थितियों की बात जो कर रही हूँ। मुझसे नाराज तो और भी न जाने कौन-कौन भी हो सकते हैं पर इतना जरूर कहना चाहूँगी कि अब तक एक पक्षीय सर्वेक्षण प्रयोग और दबाव रहा है जिससे बहुत कुछ बड़ी ही तीव्र गति से असंतुलित हो गया है। अब अपनी पूर्णता में सर्वेक्षण करके उसे गति देकर समाज में अतितीव्र गति से फैलते चले जा रहे विभिन्न प्रकार के तथा विभिन्न रूपों में व्याप्त होते चले जा रहे विषों की गति को रोका जाए। (ध्यातव्य यहाँ दारु न पीने से आशय मदहोश होकर बहकने की और असंतुलन बनाने की स्थिति से है।) इतिहास और वर्तमान दोनों ही कालों में देख सकते हैं कि स्त्री कभी अबला न तो थी। न है और, न हो ही सकती है। अमृता, श्रृद्धा ने इड़ा की कैद में जकडे़ हुए मनु को अपने नन्हे से पुत्र के होते हुए भी अकेले ही मुक्त करवा लिया इड़ा की कैद से। गार्गी, मैत्री, झांसी की रानी के मनः शारीरिक तथा बौद्धिक सामर्थय से भी लोग अनभिज्ञ नहीं हैं और प्रकृति प्रदत्त सामर्थय भी उसमें कुछ कम नहीं है बशर्ते स्वयं स्त्री तथा पुरुष दोनों ही उसका सही प्रयोग करें अमृता। अमृता, नारी अबला कहाँ है? उसे कैसे अबला कह सकते है? जरा इन पंक्तियों को तो पढ़ो। समझो और, गुनो
विवश अनावृत्त हो जाता जो,
पर नारी के सम्मुख।
करता उसको भी हो-
विवश, अनावृत्त।
बोलो कौन है? बलवान यहाँ।
अबला नारी, या?
बलवान पुरुष। (स्वरचित)
इसलिये अमृता। किसी को भी कमजोर कहना किसी को तिल-तिल मारने और खुद को कमजोर समझना, आत्मघात के ही अंतर्गत आएंगे।
तुम कहना क्या चाह रही हो शुचि? मैं समझ नही पा रही हूँ। शायद तुम कुछ बहक रही हो शुचि।
हाँ, मैं शायद नहीं वरन् निष्चित रूप से ही बहक रही हूँ, अमृता। वर्तमान में परिवारों की भीतर – बाहर की जटिल और विषम स्थिति मुझसे कतई बर्दाष्त नहीं हो पा रही है। अमृता, किसी को भी लड़वाना-भिड़वाना या नकारना बहुत आसान होता है। बड़ा मुष्किल होता है विषमताओं को दूर करते हुए बहुत कुछ, कितना ही कुछ साधना। मैं साधना चाहती हूँ टूटते – बिखरते परिवारों की एकता को। उनके प्यार को। परस्पर विष्वास को। उनके माधुर्य को। उनकी खुशी को अमृता! अमृता, मैं साधना चाहती हूँ – बच्चों की हँसी – खुशी को। किलकारी को। मैं साधना चाहती हूँ – इंसान के भीतर की संतुष्टि, आनन्द और ओज को। मैं चाहती हूँ हर व्यक्ति साधे – सृष्टि के सत्य, शिव और सुन्दर को और, इसके लिए आवष्यक है लिंग का बटवारा करने के स्थन पर, इसकी लड़ाई करने के स्थान पर साधें, इंसान को। इंसान की इंसानियत को।
अमृता? यदि राम को अत्याचारी और सीता को बेचारी कहना सही है तो कैसे कह  सकते हैं कि, रत्नावली ने रामबोला को तुलसीदास बनाया, महान बनाया, अमर बनाया।और विद्योत्मा ने एक मूर्ख गंवार को विद्वान कालीदास बनाया, फिर तो, राम ने भी सीता को अमरत्त्व प्रदान किया और कृष्ण ने राधा को उससे विवाह न करके। पर नहीं, अमृता! स्त्री अथवा पुरुष किसी की भी त्रासदी को इस प्रकार ढका नहीं जा सकता है। इससे नासूर रिसते हैं और नासूर – दर – नासूर बढ़ते ही चले जाते हैं ला-इलाज हो जाने की स्थिति तक और, आज हो यही रहा है घर-घर में। पूरे समाज में।
और ये ही सब वजह हंै स्त्री – पुरुष, पति-पत्नी, लड़का-लड़की, प्रेमी-प्रेमिका आदि हर प्रकार की जोड़ी के परस्पर बढ़ते उत्पीड़न की फिर चाहे वह रेप के रूप में ही क्यों न हो अमृता! अमृता, ना तो स्त्री, स्त्री की दुष्मन ही होती है और न वह बेचारी ही होती है और, न अबला ही। वह देवी भी तो नहीं है-
’मत मुझे तुम देवता अपना बनाओ।
मंदिरो की मूर्ति तो मैं हँू नहीं। (स्वर.)
इसी प्रकार अमृता! पुरुष भी न तो केवल शोषक ही है और न अत्याचारी ही और मात्र लम्पट भी तो नहीं है। न तो इसे नकारो ही और न इसके अंहकार को ही जगाओ वरन् ऐसी जागरूक स्थितियाँ उत्पन्न की जाएं जिससे वह स्वयं भी अपने अहंकार में मदहोष, न हो सके। इसके साथ ही साथ ऐसी भी स्थितियाँ उत्पन्न की जांए जिससे स्त्री भी बेचारगी की चादर न ओढ़ सके और न अहंकारी ही बन सके तथा अशक्तता तथा आत्महीनता एवं लाचारी से उत्पन्न कुंठाओ की शिकार होकर न तो धरती में ही समाती रहे और न ही वर्तमान के संदर्भ में, काफी कुछ संदर्भो में आक्रामक ही हो सके।
अपनी – अपनी पत्नी और परिवार के अथाह प्रेम समर्पण और त्याग से आपूरित, अपनी – अपनी पत्नी और उसके परिवार से बेइंताह नकारे गये, टूट गये, भीतर तक तिलमिला गये लाचार पुरुषांे की अथाह तथा असहय् पीड़ा को कौन समझेगा? कब? और कब तक? तथा कैसे? अमृता।
तू ठीक कह रही है शुचि। तेरी बात बहुत गहरी और विचारणीय ही नहीं है वरन् कुछ ही नहीं अपितु बहुत कुछ करने के लिए भी प्रेरित कर रही है। कर सकती है मुझे ही नहीं वरन् औरों को भी।
तू ही बता अमृता! क्या अपनी प्राण – प्रिया पत्नी से प्रताड़ित किये गये भीतर ही  भीतर कुलबुलाते झटपटाते तुलसी, दीन – दुनिया से बे – खबर हो, बे – इंताह एकाकी तुलसी, आत्म केन्द्रित हो ऐसे ही रामचरित मानस लिखते रहेंगे? यह तो शुकर मनाओ कि उन्होने जन-हित का यह महान कार्य किया वरना वे मर्डर भी कर सकते थे और आत्महत्या भी। और आज इस तरह के न जाने कितने ही तुलसी हैं जो यह सब कर भी रहे हंै। या यों कहें कि, जैसा दोनांे आँखें मूंद कर बेचारी करार कर दी गई स्त्रियों के संदर्भ में कहा जाता है कि इन पुरुषों को इस हद तक इनकी पत्नियों और उनके परिवार के सदस्यों द्वारा अपमानित और कुंठित कर दिया जाता है कि वे स्वयं भी बर्बाद होने और समाज में भी प्रदूषण फैलाने के सिवाए कुछ और सोच पाने की स्थिति में ही नहीं रह पाते हर कोई रामबोला नहीं होता है तो हर कोई तुलसीदास भी कैसे हो सकता है ? बन सकता है अमृता!
अमृता! और बताती हूँ तुम्हें क्योंकि पुरुष का स्त्रियों/पत्नियों द्वारा शोषण की घटनाएं न तो इतिहास में ही कम रही हैं और न वर्तमान में ही कम हैं बस हाँ बात यह है कि किसका ध्यान किस की तरफ जाता है और, मनादी किसकी होती है, ढोल किसका पिटता है और, क्यों।
जिस तरह स्त्री रूप सीता की स्थिति मानी जाती है उसी तरह इतिहास के पन्नों में ही पुरुष शोषण, उत्पीड़न और नकारे गये पुरुषों की भी संख्या कम नहीं है अफसोस तो इस बात का होता है कि उन्होने इस शोषण के प्रति आवाज क्यों नहीें उठाई? समाज में संतुलन क्यों नहीे बैठाने का प्रयास किया? शायद वे अपनी मर्मांतक पीड़ा और अकेलेपन से छेड़-छाड़ करना नहीं चाहते थे या ऐसा करने का साहस नहीं कर सके। किसी कवि, शायद नीरज जी ने कहा है ना-’मत छेड़, मत छेड़ बुलबुल सोय गुलाब को मत छेड़’ और इसी में आगे-’दर्द जब तक भीतर है, वश में है, बाहर, बे-काबू है’।
महाकवि बाल्मीकि की पीड़ा क्या कम थी ? क्या वे अपनी पत्नी ही नहीं वरन् अपनी संतान से अपने पूरे परिवार तक से भी किस कदर नकारे नहीं गये थे, इसका वर्णन बहुतायत बुद्विजीवी जागरूक तथा जागरूक स्त्री-पुरुषों, साॅहित्य-प्रेमियों और साहित्यकारों से छुपा नहीं है इस संदर्भ में अथवा इन संदर्भो में। आध्यात्म और चमत्कार तथा होनी को
भी स्वीकार कर लेते हंै तो ये स्थितियाँ केवल पुरुषों के संदर्भ में ही क्यों स्वीकार्य हैं स्त्रियों के संदर्भ में क्यांें नहीं? चलो इसे मान भी लिया जाऐ तो बाल्मीकि एक सांसरिक व्यक्ति भी तो थे उनका भी परिवार था जिसका भरण-पोषण वे अपनी योग्यता तथा क्षमता के साथ पूरी ईमानदारी से कर रहे थे। परिवार को तो उनका साथ देना जरूरी हो जाता
है। यदि उनके इस प्रकार के कृत्यों द्वारा भरण-पोषण करवाना सही नही लगता था तो उनकी चेतना को जगाते। उनका सहयोग करते कुछ अच्छा, कुछ बेहतर करने में, पर नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और एक ही झटके में उनके सारे प्यार, समर्पण और समूचे वजूद को ही नकार दिया गया। उन्हे बे-इंताह एकाकी ओर छटपटाते हुए छोड़ दिया गया अपने
स्वार्थांे की सिद्धी किये जाते रहने के बावजूद। कहाॅ गये वो इसकी टोह तक लेने की उनके अपनों ने, प्रियों ने, प्रिय पत्नि तक ने कोई आवष्यकता नहीं समझी। वे लापता आत्महत्या भी कर सकते थे। और न जाने कितने ही ऐसा करते रहे होंगे। कर रहे होंगे पर सब गुमनामी की कब्र में दफन हैं। और आज भी दफन होते चले जा रहे हैं। दिन पर दिन तीव्र और बढ़ती हुई रफ्तार से। ये तो तुलसी और बाल्मिकी तथा कालीदास थे  जिनका पता चल गया। पर, पता चलकर भी हुआ क्या इस संदर्भ में। क्या परिचर्चा हुई? या आज भी हो रही है? इतनी भीषणताओं और विषयमताओं के बाबजूद और इन पत्नि और संतान तथा परिवार-पीड़ितों की पीड़ा को जानने, पहचानने, मानने और, समझने के बदले आघ्यात्म का जामा पहना कर इनके नाम की मात्र माला जपने और जपवाने लगे सबही और स्वयं बाल्मीकि, तुलसी तथा कालीदास भी तो इस संदर्भ में मौन रहे। यह उनके प्रेम की पराकष्ठा की मजबूरी थी या क्या था ? इन्होने चरित्र और व्यक्तित्त्व दिये भी तो राम और धरती में समाने वाली सीता तथा अपने पति दुष्यन्त से उपेक्षित शकुन्तला के वो भी इनके दर्द में पूरी तरह खुद भी सरोबार होते हुए और अपने पाठकों तथा समीक्षकों से भी यही करवाते हुए। कालीदास का मेघदूत इस बात का मार्मिक सूचक आख्यान है कि वे अपनी पत्नि से, इस सबके बावजूद कितना प्यार करते थे तथा भीतर ही भीतर
बेइतांह एकाकी कोने से यह चाहते थे कि वह भी बेइतांह प्यार करें ठीक उन्ही की तरह। शकुन्तला बेचारी रही और उसके पिता परशुराम? वह देवताओं का परशुराम की साधना के प्रति भय माना गया था यह परशुराम की तपस्या की परीक्षा थी यही मानना था सभी का। इसके लिए इन्द्र, मेनका, स्वर्ग, स्वर्ग का साम्राज्य, इन्द्र का भय, साम्रज्य के जाने का और भी न जाने क्या-क्या सोच विकसित किया गया। आखिर अपराधी कौन रहे ? इन्द्र दुष्ंयत और परशुराम तथा ऋषि दुर्वासा। बेचारे/बेचारी कौन रहे ? मेनका और शकुन्तला। बड़ी अच्छी परिपाटी चलती चली आ रही है स्त्री, पुरुष के संदर्भ में सामाजिक न्याय व उत्पीड़न की और जो इन्ही दृष्टि बिन्दुओं के आधार पर बढ़ती ही चली जा रही है और भी जटिल रूप में एक पक्षीय बिना इसके विषम परिणामों के सोचे। और पुरुष/लड़का और उसके परिवार के प्रति अन्याय तथा शोषण बढ़ता ही चला जा रहा है दिन दुगुना, रात चैगुना इस सबको भी नजर अंदाज करते हुए क्योंकि इस प्रकार की चेतना कभी रही ही नही तो अब इसका विकास कौन करे ? कौन बांधे बिल्ली के गले में घंटी। फिर घंटी बाध्ंने वाले चहू े को किस बिल्ली का शिकार होना पड़े कब? और कैसे यह भी तो नहीं कहा जा सकता है इसलिए चलता आ रहा है इसीलिए एक पक्षीय प्रवाह और बढ़ता भी तो चला जा रहा है उत्तरोत्तर और, और, और, अमृता! अमृता सुन रही थी मंत्र-मुग्ध सी शुचि की बातें। वह केवल सुन ही नही रही थी वरन् समझने की भी कोशिश कर रही  थी और उसमें काफी कुछ कामियाब भी हो रही थी वह सोच रही थी कि वाकई यह सब क्या होता रहा है और आज भी होता ही चला जा रहा है और भी तीव्र गति से यदि इसको संभाला और साधा नहीें गया तो और भी अधिक बढ़ जाएगी, सब कुछ तहस-नहस होने की गति। कितना जरूरी है इसे संभालना, इसे साधना समझ में आता चला जा रहा था उसे सब कुछ। उसके जेहन में माता-पिता दोनों के होने के बावजूद छटपटा रहे एकाकी बाल गोपालों की लाचार छवियाँ आ रही थीं। जा रही थीं। सिहर उठी वह, एकाकी मानवता के रिस-रिस के हलाल होते हुए हत्याकाण्ड की  संभावित बढ़ती हुई लहुलुहान छवि को देख कर जार-जार रोते बिलखते मासूम, बेकसूर छोटे-छोटे बच्चों की वर्तमान की भी, भूत की भी और, संभावित भी, छवि को देख कर। जब यह इतना सच इस कदर दर्दनाक और भयानक है तो इसके बढ़ रहे बढ़ते चले जा रहे हालात का अंजाम क्या होगा? कौन होगा इस सबका जिम्मेदार और, आज भी कौन है? कौन लेगा इसकी जिम्मेदारी? अमृता कभी शुची को देखती और कभी इधर-उधर। उसके भीतर के तमाम सोच,चेतना और जागृति से उथल-पुथल हुई पीड़ा ने उसकी आखों को गहराई में डुबा दिया था। उन्ही खोई-खोई आखों से अपने भीतर की पाई हुई चेतना सहेजते हुए वह बोली मैं बंाधूगी बिल्ली के गले में घंटी। हाँ शुचि, हम दोनों मिलकर इस नवीन अभियान को दिशा देंगें। मुझे बहुत खुशी भी हुई और शांति भी मिली अमृता तुम्हारी यह बात सुनकर और इससे भी ज्यादा संतुष्टि मिली तुम्हारे दृढ़ संकल्पित अंदाज को देख कर इसी बात पर तुम्हे कुछ कविताओं के कुछ अंश सुनाती हूं तो लो सुनो
यहां कितना-कितना घोटाला है गोर रंग भी काला है।
व्याख्याएं फिर से करनी होगी परिभाषाएं बदलनी होंगी कहता जीवन का उजियाला है।
जती तितली फूल-फूल पर रसलेती है मंडरा कर।
फिर क्यों केवल भंवरे बदनाम किया जाता है ?
क्यों पशुता उकसाई जाती है, क्यों स्वाभाविकता ठुकराई जाती है?
अब न कभी हो ऐसा सावधान किया जाता है।
क्यों नाहक यह काम किया जाता है।
संतुलित हो व्यवस्था जिससे भंवरे को भंवरा रहने दो।
मत पुरुष को उकसाओ ऐसे, मत उसको भंवरा कहने दो।
मामूली है कीट बहुत मत उसकी उपमा को गांठो।
मधुमक्खी भी शहद ढंूढती, मत प्यार मनुष्य का बांटो।
और नहीं तो किरची-किरची हो जाएगा,
सुदंर घर, देवालय।
व्याख्या फिर से करनी होगी,
हो सुवासित जिससे आलय।
मानव तो केवल मानव है, नहीं लिंग का वर्गीकृत भाव।
सुख-दुख का समीकरण है सब में,
और यही जीने का चाव। आओ, शक्ति की करें उपासना, सब शिवमय बन जायें।
बाटें सुख-दुख सभी परस्पर, सब शिवमय कहलाएं।
जो प्रकृति ने की संरचना उसको क्यों कर बांट रहे हो।
सुख-दुख के समभाव न समझ नर-नारी को छांट रहे हो।
मानव होकर स्वयं को ही क्यों आंधी-आंधा काट रहे हो?
बनाया, परस्पर पूर्णता जिन्हे प्रुभु ने,
उनका यह बटवारा कैसा?
सुख-दुख की भागीदरी के बिन,
एक अंागन एक द्वारा कैसा? (स्वरः)
बहुत संुदर। बहुत संदुर, शुचि! बहुत संदुर और सटीक चित्रण किया है तुमने वह भी पूर्ण माधुर्य के साथ, इससे मेरी स्पष्टता और भी बढ़ गई है। स्पष्ट हो गयी है। तमाम रीति कालीन और भी कितनी ही एक पक्षीय अभिव्यक्तियों से परे तुमने उमयपक्षीय संवेदनाओ और उन के सृजन तथा विनाश का बहुत अच्छा चित्रण तथा वर्णन किया है शुचि!
अमृता! स्त्री-पुरुष दोनों ही भगवान की बेशकीमती रचनाएं हैं। वैसे तो भगवान की हर रचना बेशकिमती है पर क्योंकि यहाँ बात इंसान की स्त्री और पुरुष की चल रही है तो इस संदर्भ में मेरा तो यही मानना भी है और कहना भी है कि जिस प्रकार स्त्री कहती है कि हमें देवी या दासी नहीं बनना है हम तो इंसान हंै हमें तो इंसान ही रहने दो उसी प्रकार यही बात पुरुष के संदर्भ में भी लागू होती है पुरुष तो कुछ नहीं कहता किंतु समाज में समानता, खुशहाली और बच्चों की किलकारी और इंसान मुस्कान से सम्बध सपने सजोए हुए इस सबका प्रतिनिधित्त्व करती हुई यह कलम पुरुषों की भी पीड़ा को मद्देनजर रखती हुई कहती है -नहीं बनना इन्हे भगवान या महान और ज्ञानवान इन्हे इंसान बना रहने दो बाकी तो ये स्वयं बन जाएंगे। चलो पूर्वोक्त व्यक्तित्त्व पुरुष (तुलसी) तो ज्ञानवान और महान बन भी गए बाकी उनका क्या होगा जिन्हे अच्छे से अच्छा करने और होने के बावजूद स़्त्री पत्नि अथवा प्रमिका के गलत-सलत दावों ने जेलांे में ठूंस दिया है और समाज ने भी जिन्हे आदमी मानने से मना कर दिया है इंसान मानना तो बहुत दरू की बात है जिन्हे हैवान मान लिया गया है। जिन्हे बेवजह जबरन अपराधी करार कर दिया गया है। क्या होगा उनका? इसलिये अमृता! मेरी सहेली, मेरी प्यारी सहेली हमें अब अपने इस ज्वंलत अभियान पर निकलना ही होगा शीघ्र! शीघ्रातिशीघ्र। मुझे खुशी है तुम्हारे में हुई जागृत चते ना के लिए। कोई दीप तो प्रज्वलित हुआ। प्रज्वलित होते हैं इसी तरह दीप से दीप और जगमगा उठती है दीवाली। होते हंै परिवर्तन और बदल जाता है सारा ही अंधकार सुरम्य प्रकाश में। हाँ शुचि! मैं जानती हूँ आज इस नई जागृति से मैं कितनी शांत और प्रसन्न हूँ। आओ इसी बात पर मिलते है गले। एक और एक ग्यारह। एक और एक और एक-एक सौ ग्यारह…..।
डाॅ. शशि मंगल

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