“राम “माटी से मन्दिर तक गौरव गाथा

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rajendra mohan
राजेन्द्र मोहन शर्मा
शिक्षाविद् और साहित्यकार
“भूखे के सामने भगवान भी रोटी के सिवा किसी और रूप में जाने की हिम्मत नहीं कर सकता है।” महात्मा गांधी
 गांधी जी के इस कथन के बाद आज  भारत बहुत लंबा सफर तय कर चुके है। सदियों से पुजे जा रहे करुणामयी मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान से आज तक हम राम को भगवान  के साथ साथ एक मानवी स्वरूप और  हमारी अपनी अभिलाषाओं के प्रतीक के रूप में  उन्हें घड़ने और खड़ा करने में हम सफल हो गए हैं।  एक तरफ आदि राम हैं  जो अनादि, अनन्त और अजन्मा है । फिर वे वाल्मिकी और तुलसी के राम हुए हैं, जिन्होंने  एक वचन पूर्ति के लिए सर्वस्व त्यागकर वनवास चुना, दूसरी ओर वे राम हैं जो  आम आदमी के राम बने हैं । ऐसे राम जो सांस,आश और विश्वास में गुंथ कर जन्म, मरण, परण के हर संस्कार ,संम्बोधन और अभिवादन में समा गए । फिर मसला राम के  एक मंदिर का हो या रामलला विराजमान का वे एक प्रार्थी के रूप से लेकर भारत के  सनातन धर्म के लिए गौरव  तक की यात्रा करते हैं और इत्मिनान से जन जन के पूज्य बनते हैं ।
                भले ही हमने अपनी  तुच्छाभिलाषाओं  के लिए भगवान राम का उपयोग किया या अनादिकाल में देवताओं ने राक्षसों व असुरों का संहार करने के कार्य में उनकी सहायता मांगी हो पर राम हमेशा तत्पर रहे और वर्तमान भी इससे अछूता नहीं है। भारत की स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में, एक गणराज्य के रूप में स्थापना के समय आधुनिक भारत के मंदिरों की कल्पना विद्यालय, अस्पताल, विश्वविद्यालय और अनुसंधान केन्द्रों के रूप में की गई तो राम राज्य का सहज ही स्मरण हो आया ।
रामराज्य की अवस्था के बारे में खंगालने पर उस रघुवंशी साम्राज्य में अनेकों परिचर्चा और स्वास्थ्य केन्द्रों, गुरूकुलों बाग बगीचों सहित जनहित के अनन्त कार्यों आदि का वर्णन मिलता है। इतिहास साक्षी है भगवान श्रीराम के भाई भरत के पुत्र तक्ष के द्वारा स्थापित राज्य तक्षशिला में एक ऐसे विश्वविद्यालय का निर्माण हुआ, जिसकी आभा आजतक हमारे मन-मस्तिष्क को प्रदीप्त करती है। रामराज्य एक आदर्श स्थिति है जिसे पाने का प्रयत्न हर शासक नेअपने राज में खूब किया था और आज भी करते हैं। जब खालसा पंथ की स्थापना की गई, तब लंगर की परंपरा इसलिए शुरू की, जिससे दर्शनाभिलाषी खोजी भगत का पेट पहले भरे, जिससे आध्यात्म की ओर उसका ध्यान लग सके यह दर्शन भी अन्नपूर्णा के अन्न क्षेत्र से प्रेरित रहा था जो आज राम रोटी बैंक तक का सफर कर चुका है । आज हम इस पुण्यभूमि भारत में, जिसपर सृष्टिनिर्माता की असीम कृपा रही है, जिसपर अनेकों अवतरणों, गुरुओं ने जन्म लिया है । हम  भारतवाशी आज विद्यालयों और चिकित्सालयं सहित  राम जी का देवालय बनाने जा रहे हैं । जो कि राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बनाने जा रहा है । मन सहसा तब  दुखी हो उठता है जब  कुछ लोग संघ और भाजपा के राम बता कर हल्कापन दर्शाने लगते हैं । ऐसे लोगों को को न केवट से प्रेम है, न माता शबरी से, न ही जटायु से, न ही उन्हे किसी अहिल्या के उद्धार की चिन्ता है। आज जब पूरा देश और विश्व एक महामारी से जूझते हुए भी  कारुण्य के प्रतीक जन जन के आराध्य श्रीराम के एक भव्य मंदिर का शिलान्यास के लिए एकजुट होकर उठ खड़ा हुआ है तो निश्चय ही इसे श्रीराम की अनन्य कृपा समझिए । आज भी निश्चय ही अनेक पाखंडी और धूर्त हैं जो भगवान को आगे कर उनकी आड में अपने समस्त काले कारनामों को अंजाम देने से नहीं हिचक रहे हैं। ऐसे कई साधु और बाबाओं की असलियत पिछले कुछ वर्षों में सामने आ चुकी है। धर्म का, आस्था का निज स्वार्थ के लिए धूर्तता की हद तक दुरूपयोग आज हर गली मोहल्ले में देखा जा रहा है। अस्पतालों में सुविधाओं की कमी से कई गरीब लगातार मरने को अभिशप्त हैं। शर्मनाक स्वास्थ्य सूचकांक, दिवालिया होते कारोबार, बंद होते  राजकीय विद्यालय और भूख और बेरोजगार से सजे मेरे देश भारत में भगवान श्रीराम के मंदिर के शिलान्यास एक विश्वास तो बनता ही है कि इस कठिन समय में भी लोग आस्था की पुख्ता जमीन से तनिक भी नहीं डिगे हैं   इस के लिए सभी को बधाई। आशा है राममंदिर का अन्नक्षेत्र  गरीब की भूख मिटाएगा और हर बच्चे का कुपोषण मिटाएगा । इसराम मन्दिर न्यास के तहत एक अस्पताल भी चलेगा जिससे  गरीब को उच्च गुणवत्तापूर्ण सहज और सुलभ इलाज मिलेगा, ऐसे विश्वविद्यालय का निर्माण होगा जो राम के इस आभास्थल की चमक के साथ उनके वंशज तक्ष की बनाई तक्षशिला को पुनरप्रतिष्ठित कर देगा। यदि ये सब हम  कर पाए, तो फिर भगवान राम  स्वयं ही सहायक बनेंगे, जिसके राज्य की कल्पना मात्र से ही जनकल्याण का भाव उभरता है। जो अपने बनाए भव्य मंदिरों की वजह से नहीं पूजा गया वरन इसलिए आराध्य बना, क्योंकि मर्यादा का पर्याय था, जनकल्याण का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण था, मानव रूप में भगवान के शासन का प्रतीक था।
कबीर के कहे एक विचार के अनुसार,
“पहला राम दशरथ का बेटा
दूजा, घट घट में बैठा
तीजे का है सकल पसारा
चौथा राम है सबसे न्यारा।”
          आइए हम सब  कबीर के उस चौथे राम का अन्वेषण करें साथ ही हमारी चेतनापुंज के रूप  में बनने जा रहे आधुनिक भारत में राम मंदिर बनने की सभी हार्दिक बधाई। भगवान श्रीहरि विष्णु के मानवावतार भगवान श्रीराम  सभी को सद्बुद्धि दें।

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