दोहे रमेश के -रमजान ईद  पर 

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चलो मनाएँ ईद हम,सबको लेकर साथ!
भुला पुरानी दुश्मनी, ले हाथों मे हाथ! !
सीमा खुशियों की सभी,गई तुरत वो फाँद!
आया जैसे ही नजर,…..उसे ईद का चाँद! !
रही हमेशा देश को, यही मित्र उम्मीद!
ईद मनाएँ साथ मे, हरिया और हमीद!!
रोजाना फिर ईद है, हर महिना रमजान !
हमने अंदर का अगर,मार दिया शैतान !!
जाते-जाते भी यही, सिखा गया रमजान !
होती है हर धर्म की, …कर्मों से पहचान !!
आंसू जिसने दीन का,..लिया हमेशा चूम !
रहमत से रमजान की,हुआ न वो महरूम !!
बरकत की सौगात है,   ..महिना ये रमजान !
दिल से अपने कीजिये, हाथ खोल कर दान !!
निर्बल का लाचार का, रखें हमेशा ध्यान !
देता है पैगाम ये , ….पाक माह रमजान !!
भूखे और गरीब को, दिया नही यदि दान !
कैसे होगा सार्थक, …….यह तेरा रमजान !!
भूखे के मुंह में कभी , दिया नहीं इक ग्रास !
फिर तो तेरा व्यर्थ है, किया हुआ उपवास !!
रोजा रखे रसूल तो,  .राम रखे उपवास !
अपना अपना ढ़ंग है,करने का अरदास !!
रमेश शर्मा

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