शाह की अलोकतांत्रिक रणनीति और जनादेश

0
35

मोदी सरकार ने अपने तीन साल पूरे कर लिये हैं। और इन तीन सालों में मोदी की लोकप्रियता पहले के मुकाबले कहीं अधिक बढ़ी है। वे आज भी देश के सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में जनता के प्रियपात्र बने हुये हैं। और इसकी पुष्टि अन्तरराष्ट्रीय संस्था ओईसीडी अर्थात ऑर्गनाइजेशन ऑफ इकोनॉमिक को-ऑपरेशन डेवलपमेंट के एक सर्वे ने की है। इस संस्था के एक रिपोर्ट के अनुसार अपने नागरिकों के सबसे विश्वासपात्र सरकारों की कतार में मोदी सरकार पूरी दुनिया में पहले पायदान पर खड़ी है। इतना ही नहीं बल्कि भारत के अग्रणी समाचार चैनल आजतक और KARVY इनसाइट लिमिटेड के सर्वे में भी देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ही देश के सबसे लोकप्रिय व सफल प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकृति मिली है। देश के अब तक के प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल की तुलना में जनता ने प्रधानमंत्री मोदी को ही सबसे सफल माना है। देशहित में लगातार लिये जा रहे उनके फैसलों से जनता में भारी उत्साह है। और सायद यही कारण है कि देश के अधिकत्तर समाचार एजेंसियों द्वारा कराये गए सर्वे के अनुसार नरेन्द्र मोदी ही दोबारा प्रधानमंत्री बनते नजर आ रहें हैं। उनकी लोकप्रियता ने आज विपक्ष को भी संशय में डाल रखा है, तभी अधिकत्तर विपक्षी पार्टियाँ पाला बदलकर एनडीए के साथ गठबंधन करने को तैयार खड़ी हैं। पर इन सबके बीच भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति ने भारतीय राजनीति को हाशिये पर ला खड़ा किया है।
प्रधानमंत्री द्वारा कांग्रेसमुक्त भारत के आह्वान के बीच जब देश के अधिकत्तर राज्यों ने कांग्रेस से किनारा कर लिया वहीं भाजपाध्यक्ष अमित शाह के डर्टी पॉलिटिक्स ने जनता को हैरत में डाल दिया है। एक ओर जहां प्रधानमंत्री जनता से कांग्रेस का बहिष्कार करने की बात कह रहें हैं तो वहीं अमित शाह कांग्रेस के अवसरवादी व मौकापरस्त नेताओं को भाजपा में लाकर भारतीय जनता पार्टी का कांग्रेसीकरण करने में जुटे हुये हैं। शाह पर लगे आरोपों के अनुसार वे अधिकत्तर नेताओं को करोड़ों रूपये का लालज देकर या फिर मंत्रीपद का लॉलीपॉप दिखाकर अपने दल में शामिल होने को मजबूर कर रहें हैं। और अगर उनपे लगे यह आरोप सच हैं तो यह दशक भारतीय राजनीति के हिसाब से अब तक का सबसे अभिशप्त दशक माना जायेगा।
शाह के प्रबंधन कौशल की बात करें तो यह मानना आवश्यक है कि अमित शाह एक अच्छे चुनाव प्रबंधक हैं। वे चुनावों में अपने उम्मीदवारों को जीतवाने के सौ तरीके जानते हैं। तभी पार्टी में उनका कद इतनी तेजी से बढ़ रहा है। पर पार्टी पर अपनी पकड़ बनाते ही उन्होंने जिस तरह से पार्टी के ज्यादातर सीनियर नेताओं को दरकिनार करना आरंभ किया है उससे एक बात तो साफ है कि वे अब असीम और निरंकुश क्षमता की महत्वाकांक्षा के साथ आगे बढ़ रहें हैं। और संभवतः यही कारण है कि वे पार्टी के सीनियर नेताओं को अलग-थलग करने में जुटे हुये हैं। वे प्रधानमंत्री के कांग्रेसमुक्त भारत के आह्वान के बाद भी पार्टी को कांग्रेसयुक्त करने की जुगत में लगे हुये हैं, जिससे पार्टी में उनके समर्थकों की संख्या अधिक हो सके।
शाह राजनैतिक मंच पर अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने के लिए कुछ भी करने को तैयार दिख रहें हैं तभी राज्यसभा चुनावों में अहमद पटेल के खिलाफ गुजरात में उन्होंने जबरदस्त फील्डिंग की थी। पर दुर्भाग्यवश उन्हें वहां मुंह की खानी पड़ी। इस चुनाव में उन्होंने राजनीति के सबसे स्तरहीन रणनीति का प्रयोग किया था जिससे देश के उपरी सदन की गरीमा को भी ठेस पहुंचा है।
एक ओर चहां मोदी देश को समृद्ध और शक्तिशाली बनाने में जुटे हुये हैं वहीं दूसरी ओर शाह पार्टी के नाम पर खुद को प्रभावशाली बनाने की चेष्टा में दिख रहें हैं। और अगर ऐसा नहीं है तो सिर्फ चुनाव जीतने के लिए पार्टी के पूर्व आदर्शों और विचारधारा को किनारे लगाने की अपनी रणनीति से भाजपा अध्यक्ष को बाज आने की जरूरत है। भाजपा समर्थकों का पार्टी पर अडिग विश्वास दल की नीतियों और विचारधारा के कारण ही बना हुआ है। ऐसे में अगर शाह अपनी महत्वकांक्षा के लिए पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर अन्य पार्टियों के अवसरवादी नेताओं को भाजपा में लाने की जो भूल कर रहें हैं उसकी कीमत पार्टी को ही चुकानी पड़ेगी।
शाह रणनीति के नाम पर भाजपा के पितामह अटल बिहारी वाजपेयी के उन उसूलों का भी गला घोंट रहें हैं जिनके बल पर पार्टी आज यहां तक पहुंची है। शाह शायद वह यह भूल रहें हैं कि बाजपेयी ने विचारधारा और उसूलों की खातिर ही अपनी सरकार तक गिरा ली थी पर उन्होंने कभी अपनी विचारधारा से समझौता नहीं किया था। अगर अटल-आडवानी चाहते तो वे भी भाड़े के नेताओं के सहारे अपनी कुर्सी अटल रख सकते थे, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। और इन्हीं वजहों से अटलजी भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में सबसे आदर्शवान व्यक्ति के रूप स्थित हैं। उन्होंने सिर्फ अपने आदर्श की खातिर सन1999 में अपने सरकार की बलि चढ़ा दी थी। तब उनकी सरकार ने लोकसभा में सिर्फ एक वोट से विश्र्वास मत खो दिया था। उस वक्त भाजपा और कांग्रेस के बीच आर्थिक और विदेश नीति के मुद्दों पर असहमति थी। जिसके फलस्वरूप भाजपा नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार मतदान में सिर्फ एक वोट से बहुमत साबित करने से चूक गई थी क्योंकि राजग गठबंधन में जयललिता के नेतृत्व वाली अन्नाद्रमुक ने अपने हाथ पीछे खींच लिये थे और मायावती ने भी उनका साथ छोड़ा था। उस वक्त सिर्फ एक वोट के संकट से जूझ रहा राजग नेतृत्व थोड़े से प्रयासों से जोड़-तोड़ की सरकार बना सकता था। पर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने नैतिकता का हवाला देते हुए इस संभावना से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि नैतिकता के आधार पर हमारे पास बहुमत नहीं है, और अब जनता के बीच जाकर एक बार फिर उनका विश्वास जीत कर आयेंगे। और जनता ने भी उनके आदर्शों को सिराखों पर बिठा लिया।
पर शाह इसके उलट भारतीय जनता पार्टी को बाहरी नेताओं का आशियाना बनाने की पुरजोर कोशिश कर रहें हैं। शाह के करतूतों का समर्थन करने वालों को यह याद रखने की जरूरत है कि 2014 के आमचुनावों में नरेन्द्र मोदी को मिली अभूतपूर्व जीत अटल युग के ही एक समर्पित सेनानायक राजनाथ सिंह के कार्यकाल में मिली थी। और उस दौर में पार्टी ने अवसरवादी नेताओं को अधिक महत्व न देते हुये अपने पुराने व समर्पित कार्यकर्ताओं पर ही भरोसा जताया था जिसके फलस्वरूप भारतीय जनता पार्टी इतिहास रचने में सफल हुई।
भाजपा के प्रति लोगों का विश्वास अटल युग के आदर्शों का प्रतिरूप है। पर शाह ने अरूणाचल प्रदेश और गोवा में जिस तरह की सरकार बनाई है वह अनैतिक और अटलजी के आदर्शों के विपरीत है। जो भाजपा के समर्थकों के लिए भी विचारणीय है। शाह द्वारा सिर्फ सरकार बनाने के उद्देश्य से खेला जा रहा पॉलिटिकल गेम भारतीय लोकतंत्र के लिए भी काफी नुकसानदेह है। और अदूर भविष्य में इसके गंभीर परिणाम भी देखने को मिलेंगे। अतः अपने फायदे के लिए अंधभक्त बनें लोगों को भी अब यह समझना होगा कि लोकतंत्र में हरेक को अपने पसंद के हिसाब से अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार है। और ऐसे में अगर कोई अपने पावर और पैसे के बल पर जनादेश का अपमान करता है तो यह लोकतंत्र की हत्या की श्रेणी में आयेगा, जिसे किसी भी कारणवश कभी माफ नहीं किया जा सकता।

मुकेश सिंह

LEAVE A REPLY