सच का संघर्ष 

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पदचापों की आहट सुनकर हो जाता खामोश ,
हृदय द्रवित हो जाता ,अक्सर देख जगत का रोष ,
कदम -कदम पर भगदड़ ,कर देते हैं दानव ,
सच कब तक संघर्ष करेगा ,बोलो मानव ?
मृत शब्दों की पुस्तक पढ़कर, हो जाते विद्वान ,
ये तुलसी हैं ,ये कबीर हैं ,ये ही हैं रसखान !
भाग्य रो रहा देख, तपस्वी बनते दानव !
सच कब तक संघर्ष करेगा ,बोलो मानव ?
अब क्या है अन्याय ? न्याय करते अपराधी !
ज़हरीले मैदान हो गए,जलती वादी   ।।
सीता फिर बदनाम हो गयी ,कहते दानव !
सच कब तक संघर्ष करेगा ,बोलो मानव ?
तरह -तरह की भूख लिए, सब घूम रहे हैं।
राजनीति की मदिरा पीकर, झूम रहे हैं।
भूतों जैसा नृत्य सदा ,क्यों करते दानव !
सच कब तक संघर्ष करेगा ,बोलो मानव ?
प्रेम त्याग का भाव नहीं, अब मन में।
धैर्य -धर्म को कौन भरे जन जन में।
जनहित के संवाद -शब्द से,खेलें दानव !
सच कब तक संघर्ष करेगा ,बोलो मानव ?

(30 अप्रैल 2018 को ये रचना कवि  अभिषेक मानव द्वारा  लिखी गयी )
-अभिषेक मानव ,कवि ,पत्रकार ,व्यंगकार और गीतकार।

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