साहित्य मण्डल, नाथद्वारा श्री भगवती प्रसाद देवपुरा स्मृति समारोह

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०५ जनवरी २०१८, साहित्य मण्डल, नाथद्वारा द्वारा हिन्दी पुरोधा, राष्ट्र भाषा सेनानी, साहित्य वाचस्पति श्री भगवती प्रसाद देवपुरा स्मृति समारोह के दो दिवसीय आयोजन के प्रथम दिवस के प्रथम सत्र में साहित्य मण्डल माध्यमिक विद्यालय के प्रतिभावान छात्र-छात्राओं को उनकी शैक्षिक, सांस्कृतिक व खेलकूद सम्बन्धी उपलब्धियों पर पुरस्कृत किया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ मंचस्थ अतिथियों डॉ. जमनालाल बायती, डॉ. विमला भण्डारी, डॉ. राकेश चक्र,
डॉ. ललित जी शर्मा द्वारा माँ सरस्वती, प्रभु श्री नाथजी व श्रद्धेय बाबूजी श्री भगवती प्रसाद जी देवपुरा के चित्रों पर माल्यार्पण व दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। संस्था के पदाधिकारियों ने मंचस्थ अतिथियों का शॉल, उत्तरीय व कंठहार द्वारा स्वागत-अभिनंदन किया। इस अवसर पर छात्र छात्राओं द्वारा गीत, संगीत, नृत्य व नाटिकाओं की मनमोहक प्रस्तुति दी गयी जिसे प्रेक्षागार में उपस्थित सभी महानुभावों ने करतल ध्वनि से सराहा। साहित्य मण्डल माध्यमिक विद्यालय के दसवीं कक्षा में अध्ययनरत विद्यार्थियों को इस अवसर पर भावभीनी विदाई दी गयी। विदा होते व विदा देते सभी विद्यार्थी इस समय भाव विभोर थे। मंचस्थ अतिथियों ने बच्चों की सुंदर प्रस्तुति की सराहना करते हुए उन्हें जीवन मूल्यों से अवगत कराया। शिक्षा व सहशैक्षिक गतिविधियों में छात्र कैसे स्वयं को उन्नत कर अपने भविष्य को उज्ज्वल कर सकता है आदि आदि विषयों पर अपने उद्बोधन से सभी को लाभान्वित किया। कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता श्रद्धेय बाबूजी के शिष्य पूर्व प्राचार्य व जाने-माने शिक्षाविद श्री जयदेव जी गुर्जरगौड़ ने की। सत्र के मुख्य अतिथि राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर के अध्यक्ष डॉ. इन्दुशेखर तत्पुरुष जी रहे। उत्तर प्रदेश के आईपीएस अधिकारी एवं साहित्यकार श्री अखिलेश जी निगम ‘अखिल’, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. चन्द्रपाल जी शर्मा, आचार्य प्रवर श्री रामदेव जी दीक्षित, पं. मदनमोहन अविचल जी, जज श्री विक्रम जी सोनी एवं जज श्री लक्ष्मीकान्त जी वैष्णव विशिष्ट अतिथि रहे। मंचस्थ अतिथियों द्वारा माँ वीणापाणि, विध्नहर्ता गणेशजी, प्रभु श्रीनाथजी व श्रद्धेय बाबूजी के चित्रों
पर माल्यार्पण व दीप प्रज्ज्वलन कर श्री भगवती प्रसाद देवपुरा स्मृति समारोह के दो दिवसीय कार्यक्रम का विधिवत शुभारम्भ किया गया। संस्था के पदाधिकारियों व सदस्यों द्वारा मंचस्थ अतिथियों का शॉल, उत्तरीय व कंठहार द्वारा स्वागत-अभिनंदन किया गया। विद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा श्रीगणेश स्तुति, माँ वीणापाणि वंदना नृत्य, गोपीकृष्ण नृत्य व घूमर नृत्य की सुन्दर प्रस्तुति दी गयी।
इस अवसर पर बलदेव, मथुरा से पधारे वरिष्ठ साहित्यकार श्री राधागोविंद जी पाठक ने सुन्दर ब्रज वन्दना तथा सरस्वती वन्दना की। जयपुर के श्री विट्ठल जी पारीक द्वारा श्रीनाथजी की वन्दना प्रस्तुत की गयी। जबलपुर से आई साहित्यकार श्वेता मिश्र ने मधुर कृष्ण भजन प्रस्तुत किया। साहित्य मण्डल के उपाध्यक्ष पं. मदनमोहन जी अविचल ने अपने स्वागत भाषण में सभी अतिथियों का स्वागत अभिनंदन करते हुए कहा कि आप सबके आने से चित्र स्वरूप में विराजित  बाबूजी सूक्ष्म रूप में जहां भी विराजमान होंगे, उनकी आत्मा को बहुत आनंदानुभूति हो रही होगी। उन्होने कहा कि
साहित्य व्यक्ति में ऊर्जा, अनुशासन व सौन्दर्य उत्पन्न करता है। आप सभी कि उपस्थिति से साहित्य मण्डल परिवार गौरवान्वित है। डॉ. नीना शर्मा, नाथद्वारा ने अपने आलेख “युग प्रवर्तक श्री देवपुरा” का वाचन करते हुए बाबूजी के
व्यक्तित्व व कृतित्व पर रोशनी डालते हुए बाबूजी के साथ अपने संस्मरणों को साझा किया। वे बाबूजी को याद करते हुए अति भावुक हो गयी और उनके भावनात्मक उद्बोधन से प्रेक्षागार में उपस्थित हर आँख नम हो गयी।
इस अवसर पर मंचस्थ अतिथियों द्वारा साहित्य मण्डल संस्था की त्रेमासिक पत्रिका ““हरसिंगार”” के वर्ष १९ व २० के अंक ३-४ का विमोचन भी किया गया। मुख्य अतिथि डॉ. इंदुशेखर जी तत्पुरुष ने अपने उद्बोधन में श्रद्धेय बाबूजी कि स्मृति को नमन करते हुए कहा कि देवपुरा जी ने जो हिन्दी सेवा केंद्र के रूप में साहित्य मण्डल को स्थापित किया है
जिसका राष्ट्रीय पटल पर अलग स्थान है। उन्होने कहा कि राष्ट्र के मुद्दे को लेकर केंद्र बना देना न  सिर्फ केंद्र बनाना बल्कि उसे पुष्ट करना, बरगद के मध्य तुलसी के बिरवे को लगा कर उसे पोषित करने जैसा दुरूह कार्य है। यहाँ आकर इस परिसर में आत्मिक पवित्रता कि अनुभूति कर रहा हूँ। राजस्थान में हिन्दी के लिए बहुत कम लोगों ने काम किया है। ऐसे में राजस्थान में हिन्दी सेवा पर दृष्टि डालें तो यही केंद्र सबसे ऊपर नजर आता है। आज के उपभोक्तावादी युग में आकर्षण की बहुत वस्तुएँ मिलेगी। आज का युग संस्था का नहीं एनजीओ का है, उन सबसे अलग भारतीय जीवन  पद्धति पर आधारित हिन्दी के लिए काम करना राष्ट्र की बड़ी सेवा है। सिर्फ नारे लगाने से राष्ट्र की सेवा व रक्षा नहीं होती। हमारी संस्कृति, परंपरा व साहित्य का संरक्षण सच्ची राष्ट्र सेवा है। तकनीक ने हमारे हाथों से पुस्तकें छीन ली, ऐसे में 80,000 पुस्तकें संरक्षित करना भागीरथ कार्य है। हिन्दी को बचाना तथा देश को बचाने जैसा मुद्दा है।
श्री तत्पुरुष जी ने कहा कि भारत की संस्कृति सिर्फ भारत के लिए ही नहीं विश्व के लिए जरूरी है, जो दूसरी संस्कृतियों का भी सम्मान करती है। विश्व की अन्य संस्कृतियों में कहा जाता है जो मुझसे भिन्न है, असहमत है उसे इस सृष्टि में रहने का अधिकार नहीं। पर भारत वह देश है जो कहता है कि जो तुम सोचते हो वह भी सच है और जो हम सोचते हैं वह भी सच है, पर न तुम और न हम बल्कि दोनों मिलकर पूर्ण व समग्र सत्य है। जीवन का सत्य विरोधों के सामंजस्य में है। संघर्ष जीवन में बहुत महत्वपूर्ण हैं। व्यक्ति से संस्था व संस्था से व्यवस्था का निर्माण होता है। देवपुरा जी के विचार ने संस्था का रूप धारण किया है, अब हमारा धर्म है ““हिन्दी सेवा व साहित्य सेवा से राष्ट्र सेवा”।”

कपासन, चित्तोडगढ़ के साहित्यकार श्री बंशीलाल जी लड्ढा ने काव्यार्चन के तहत बाबूजी ्री भगवती प्रसाद जी देवपुरा के जीवन पर कविता के माध्यम से प्रकाश डाला। सम्मान के क्रम में श्री भगवती प्रसाद गौतम, कोटा को श्री रणछोड़लाल ठक्कर स्मृति सम्मान-२०१८, श्री नरेंद्र श्रीवास्तव ‘नवनीत’, उज्जैन को श्रीमती लक्ष्मीदेवी ठक्कर स्मृति सम्मान-२०१८, श्री गुलाब मीरचंदानी, भीलवाड़ा को श्रीमती केसरदेवी जानी स्मृति सम्मान-२०१८, श्री सुखवीर सिंह चौहान, नाथद्वारा को श्रीमती शशिकला मेहता स्मृति सम्मान-२०१८ तथा डॉ. गरिमा श्रीवास्तव, जयपुर को श्रीमती गंगादेवी अवस्थी स्मृति सम्मान-२०१७ से सम्मानित किया गया। सम्मान में सम्मानित महानुभावों को शॉल, उत्तरीय, कंठहार, श्रीफल, श्रीनाथजी का प्रसाद, मेवाड़ी पगड़ी, श्रीनाथजी की छवि व अभिनंदन पत्र के साथ राशि दो हज़ार एक सौ रुपये प्रदान कर अभिनंदित किया गया। जयपुर के साहित्यकार डॉ. उमेश प्रसाद जी दाश ने साहित्यार्चन के अंतर्गत “”अनेक पहलू–एक
व्यक्तित्व श्री देवपुरा”” विषय पर अपना आलेख वाचन करते हुए श्रद्धेय श्री बाबूजी के व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं को रेखांकित किया। ““हिन्दी यथार्थ के समानान्तर श्री देवपुरा”” विषय पर इन्दौर के साहित्यकार श्री ओम जी उपाध्याय ने आलेख वाचन किया। साहित्यकारों के सम्मान की कड़ी में टीकमगढ़ के डॉ. लालजीसहाय जी श्रीवास्तव ‘लाल’, टीकमगढ़ के श्री दीनदयाल जी तिवारी ‘बेताल’, नागदा के श्री यशवंत जी दीक्षित, जालंधर के श्री बिशन सागर, मथुरा के श्री देवीप्रसाद गौड़, जांजगीर चांपा के श्री विजय राठौड़, सिरसा के डॉ. मेजर शक्तिराज जी, भीलवाड़ा के श्री प्रह्लाद जी पारीक को शॉल, उत्तरीय, कंठहार, श्रीफल, श्रीनाथजी का प्रसाद, मेवाड़ी पगड़ी, श्रीनाथजी की छवि एवं सम्मान पत्र प्रदान कर “काव्य कलाधर”” की मानद उपाधि से विभूषित किया गया। इसी प्रकार तारापुर के डॉ. मनोहरदास अग्रावत व देवगढ़ के श्री राजेंद्र कुमारसेठिया को उनके साहित्यिक एवं सामाजिक योगदान के लिए शॉल, उत्तरीय, कंठहार, श्रीफल,
श्रीनाथजी का प्रसाद, मेवाड़ी पगड़ी, श्रीनाथजी की छवि व अभिनंदन पत्र प्रदान कर अभिनंदित कियागया।
विशिष्ट अतिथि उत्तरप्रदेश के आईपीएस अधिकारी व साहित्यकार श्री अखिलेश जी निगम ‘अखिल’ ने कहा कि श्रद्धेय बाबूजी का आशीर्वाद उनके पुत्र श्री श्याम जी देवपुरा के रूप में प्रस्फुटित व पल्लवित हो रहा है। साहित्य मण्डल जैसी संस्था भारत भर में नहीं है जो ऐसे वृहद गरिमामय कार्यक्रम वर्ष में चार बार आयोजित करती है। देश भर में कई सम्मान समारोह देखे पर साहित्य मण्डल में आयोजित इस सम्मान समारोह जैसा कोई दूसरा नहीं देखा। साहित्यकारों व हिन्दी के उन्नयन के लिए श्री देवपुरा जी ने जो कार्य किया है वह स्तुत्य और प्रणम्य है। काव्यार्चन के अंतर्गत दिल्ली की डॉ. सुषमा जी भण्डारी ने सुन्दर दोहों के माध्यम से श्रद्धेय बाबूजी को काव्यांजलि अर्पित की। जयपुर के श्री विट्ठल जी पारीक व कांकरोली के श्री प्रमोद जी सनाढ्य द्वारा छंदों के माध्यम से बाबूजी के जीवन व उनके कार्यों को प्रस्तुत किया गया।

विशिष्ट अतिथि के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. चन्द्रपाल शर्मा व आचार्य श्री रामदेव दीक्षित जी ने भी संस्था के कार्यों व श्रद्धेय बाबूजी के कृतित्व व व्यक्तित्व पर अपनी बात कही तथा संस्था को अनवरत कार्यरत रहने के लिए शुभकामनायें दी। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री जयदेव जी गुर्जरगौड़ ने अपने गुरु श्रद्धेय बाबूजी श्री भगवती प्रसाद जी देवपुरा को कोटि-कोटि नमन करते हुए कहा कि जो शब्दातीत, गुणातीत व कालातीत है उनके  लिए क्या कहा जाए। वे महापुरुष थे तथा हम सभी में हिन्दी का भाव जगाने आए थे और हमें जागृत कर चले गए, जिसका प्रमाण यह समारोह है। श्री देवपुरा जी जागृत पुरुष थे। इस देश में श्री कृष्ण को भी हमें जागृत करने के लिए ढाई घण्टे तक बोलना पड़ा था। हमारा वाङ्गमय हमें हमेशा जगाता रहा है। इस देश कि धरती जागृत है इसीलिए यहाँ प्रभु भी जन्म लेते है। श्री गुर्जरगौड़ ने कहा कि मेरे देश में अमीर खुसरो हुए, वे हिन्दी के प्रारम्भिक जनक थे। उनके गुरु  थे निज़ामुद्दीन ओलिया। खुसरो की अपने गुरु में अतिशय आस्था थी और अपने गुरु के एक इशारे पर न्यौछावर थे। मैं श्री भगवतीप्रसाद जी देवपुरा को अपना निज़ामुद्दीन ओलिया कहता हूँ और मैं उनका अकिंचन खुसरो, उनके मरने के पश्चात उनकी मजार पर आया हूँ।
कार्यक्रम का सफल संचालन श्री विट्ठल जी पारीक व श्री श्याम प्रकाश जी देवपुरा ने संयुक्त रूप से किया।
कार्यक्रम के प्रथम दिवस के तृतीय सत्र का आरंभ जयपुर के श्री विट्ठल जी पारीक की अध्यक्षता व कोटा के श्री रामेश्वर जी शर्मा ‘रामू भैया’ के मुख्य आतिथ्य में हुआ। इस सत्र के विशिष्ट अतिथि रहे श्री गाफिल स्वामी जी, कोटा की श्रीमती प्रमिला आर्य, भीलवाड़ा की श्रीमती रेखा लोढ़ा ‘स्मित’, उदयपुर की श्रीमती आशा पाण्डे ओझा, दिल्ली की श्रीमती सुनीता शानु, व उदयपुर की श्रीमती मधु अग्रवाल। संस्था के पदाधिकारियों व साहित्यकारों द्वारा मंचस्थ अतिथियों का उत्तरीय ओढ़ाकर स्वागत-अभिनंदन किया गया।
साहित्यकारों के सम्मान की कड़ी में जबलपुर की श्रीमती सुनीता जी मिश्रा ‘सुनीत’, नई दिल्ली की डॉ. नेहा इलाहाबादी, दिल्ली की डॉ. सुषमा जी भण्डारी, जयपुर की डॉ. सावित्री रायजादा, इन्दौर की डॉ. चंद्रा जी सायता तथा इन्दौर की डॉ. सुधा जी चौहान को शॉल, उत्तरीय, कंठहार, श्रीफल, श्रीनाथजी  का प्रसाद, मेवाड़ी पगड़ी, श्रीनाथजी की छवि तथा सम्मान पत्र प्रदान कर “”काव्य कुसुम”” की मानद उपाधि से विभूषित किया गया।
इसी कड़ी में बरेली के डॉ. महेश कुमार जी मधुकर, नई दिल्ली के श्री सत्यप्रकाश जी भारद्वाज, सहारनपुर के श्री इसहाक अली ‘सुन्दर’, इन्दौर की श्रीमती इन्दु जी पाराशर, दिल्ली की सुनीता जी शानु तथा कोटा की प्रमिला आर्य जी को शॉल, उत्तरीय, कंठहार, श्रीफल, श्रीनाथजी का प्रसाद, मेवाड़ी पगड़ी, श्रीनाथजी की छवि एवं सम्मान पत्र प्रदान कर “”काव्य कौस्तुभ”” की मानद उपाधि से विभूषित किया गया।

कार्यक्रम का सफल संचालन श्री विट्ठल जी पारीक व श्री श्याम प्रकाश जी देवपुरा ने संयुक्त रूप से किया।
प्रथम दिवस के इसी सत्र में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन भी हुआ। देर रात तक चले कवि  सम्मेलन का आरम्भ श्वेता मिश्र, जबलपुर की सरस्वती वन्दना से हुआ। कवि सम्मेलन में डॉ. अंजीव जी अंजुम, श्री विट्ठल जी पारीक,श्री राधेगोविंद जी पाठक, श्री गाफिल स्वामी जी, श्रीमती रेखा जी लोढ़ा ‘स्मित’ श्रीमती आशा पाण्डे जी ओझा, डॉ. चंद्रा जी सायता, श्रीमती सुनीता जी शानु, श्रीमती प्रमिला जी आर्य, श्रीमती मधु जी अग्रवाल, डॉ. सुधा जी चौहान, श्री इसहाक अली जी सुन्दर, श्री ओम जी उज्ज्वल, श्रीमती सुवर्णा जाधव, डॉ. सावित्री रायजादा, डॉ. नेहा जी इलाहाबादी, श्री बिशन जी सागर, डॉ. उर्मिला जी शर्मा, श्री बंशी लाल जी लड्ढा, डॉ. यासमीन जी खान, श्री अखिलेश जी निगम ‘अखिल’, श्री दिनेश चतुर्वेदी, विजय जी राठौड़, श्रीमती शशि जी ओझा, डॉ. लालजीसहाय श्रीवास्तव ‘लाल’, डॉ. मेजर शक्तिराज, डॉ. चन्द्रपाल जी शर्मा, श्री रामेश्वरजी शर्मा ‘रामूभैया’, डॉ. राकेश जी चक्र सहित लगभग ७० साहित्यकारों ने काव्यपाठ किया। कवि सम्मेलन का सफल संचालन भीलवाड़ा के कवि श्री प्रह्लाद जी पारीक ने किया।

०६ जनवरी २०१८, साहित्य मण्डल, नाथद्वारा द्वारा हिन्दी पुरोधा, राष्ट्र भाषा सेनानी, साहित्य वाचस्पति श्री भगवती प्रसाद देवपुरा स्मृति समारोह के दो दिवसीय आयोजन के दूसरे दिन के प्रथम सत्र का शुभारम्भ पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी श्री शिवनारायण जी शर्मा के मुख्य आतिथ्य तथा डॉ. विजय कुलश्रेष्ठ जी की अध्यक्षता में हुआ। इस सत्र के विशिष्ट अतिथि रहे श्री अशोक जी पंडया, श्री राधेगोविंद जी पाठक, डॉ. ललित जी शर्मा, श्री भगवती प्रसाद जी गौतम, श्री काशीलाल जी शर्मा, तथा श्री रघुनाथ सहाय जी मिश्र ‘सहज’। मंचस्थ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर माँ शारदा, श्रीनाथजी व श्रद्धेय बाबूजी के चित्र पर  माल्यार्पण किया गया। साहित्य मण्डल पदाधिकारियों एवं उपस्थित साहित्यकारों द्वारा मंचस्थ अतिथियों का उत्तरीय द्वारा स्वागत किया गया। साहित्य मण्डल विद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा नृत्य, गीत व नाटिका की सुन्दर प्रस्तुति दी गयी। इन्दौर की साहित्यकार डॉ. चन्द्रा जी सायता ने सरस्वती वन्दना की तथा ब्रज वन्दना श्री विट्ठल जी पारीक ने की।  साहित्यकारों के सम्मान की श्रंखला में ‘हमारे राम’ मेरठ के संपादक डॉ. यशकुमार ढाका, ‘प्रेरणा’ शाहजहांपुर के संपादक श्री विजय जी तन्हा, ‘लोक अभिलाषा’ बेडवा के संपादक श्री जगदीशप्रसाद जी गौड़, ‘गोस्वामी आभा’ कोटा के संपादक श्री प्रहलाद जी गोस्वामी ‘मानसहंस’ तथा ‘लोकस फॉर सक्सेस’ आगरा की संपादक सुश्री रजनी सिंह को शॉल, उत्तरीय, कंठहार, श्रीफल, श्रीनाथजी का प्रसाद, मेवाड़ी पगड़ी, श्रीनाथजी की छवि प्रदान कर “”संपादक श्री”” की मानद उपाधि से अलंकृत किया गया।
इसी कड़ी में सहारनपुर के श्री योगेन्द्रपाल जी दत्त, इन्दौर के श्री हरर्मोहनदास जी नेमा ‘हरि’, इन्दौर के श्री ओम जी उपाध्याय, इन्दौर के श्री नयनकुमार जी राठी, भांडूप मुम्बई के श्री राजकुमार आर. यादव, नयी दिल्ली की श्रीमती शशि जी पाण्डेय, अजमेर की डॉ. उर्मिला जी शर्मा तथा इन्दौर की डॉ. अंजुल जी कंसल ‘कनुप्रिया’ को शॉल, उत्तरीय, कंठहार, श्रीफल, श्रीनाथजी का प्रसाद, मेवाड़ी पगड़ी, श्रीनाथजी की छवि सम्मान पत्र प्रदान कर “”साहित्य सौरभ”” की मानद उपाधि से विभूषित किया गया। कोटा के वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामेश्वर शर्मा ‘रामू भैया’ द्वारा रचित “लोकयशी महनीय महापुरुष श्री भगवतीप्रसाद देवपुरा कीर्ति कुसुमावली” का मंचस्थ अतिथियों द्वारा लोकार्पण किया गया। कीर्ति
कुसुमावली का पाठ श्री रामू भैया के साथ साथ प्रेक्षागार में बैठे सभी महानुभावों द्वारा किया गया। लोकार्पण के क्रम में दिल्ली से प्रकाशित राष्ट्रीय हिन्दी मासिक पत्रिका “ट्रू मीडिया” के जनवरी-२०१८  के अंक, जो कि युगपुरुष श्री भगवतीप्रसाद जी देवपुरा पर केन्द्रित है, का लोकार्पण भी मंचस्थ अतिथियों एवं पत्रिका के संपादक श्री ओमप्रकाश जी प्रजापति द्वारा किया गया। श्री ओम प्रकाश जी प्रजापति ने बाबूजी पर केन्द्रित इस अंक में सम्मिलित सामग्री को उद्धृत करते हुए उनके कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला।

साहित्यकारों के सम्मान के क्रम में जयपुर के डॉ. उमेश प्रसाद जी दाश, बालाघाट के श्री दिनेश जी कनौजे देहाती, दिल्ली के श्री गोपाल सिंह सिसोदिया ‘निसार’, शुजालपुर के श्री बंशीधर जी बंधु, इन्दौर की श्रीमती प्रतिभा रामकृष्ण जी श्रीवास्तव, मुम्बई की श्रीमती सुवर्णा अ. जाधव, इंदौर की डॉ. मीनाक्षी जी स्वामी, जबलपुर की श्रीमती छाया जी त्रिवेदी, जबलपुर की श्रीमती शशि कला जी सेन को शॉल, उत्तरीय, कंठहार, श्रीफल, श्रीनाथजी का प्रसाद, मेवाड़ी पगड़ी, श्रीनाथजी की छवि एवं सम्मान पत्र प्रदान कर ”साहित्य कुसुमाकर” की मानद उपाधि से नवाजा गया। काव्यार्चन के अन्तर्गत श्री रामेश्वर जी शर्मा ‘रामू भैया’, श्री राधागोविन्द जी पाठक व श्री भगवती प्रसाद जी गौतम द्वारा काव्य की विभिन्न विधाओं में श्रद्धेय बाबूजी को काव्यांजलि दी गई। साहित्यार्चन के अन्तर्गत “शब्दों के कोलाज में श्री देवपुरा” शीर्षक से डॉ. इन्द्र प्रकाश जी श्रीमाली, उदयपुर ने तथा “बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी श्री देवपुरा” विषय पर डॉ. ललित जी शर्मा, झालावाड़ व अंजीव जी अंजुम, दौसा ने “प्रगतिवादी दृष्टिकोण के समर्थक श्री देवपुरा” शीर्षक से आलेख वाचन
किया। सभी मंचस्थ अतिथियों ने साहित्य मण्डल संस्था, समारोह तथा श्रद्धेय बाबूजी और उनके हिन्दी अनुराग पर अपने विचार व्यक्त किये। समारोह के समापन सत्र में श्री सी पी अग्रवाल जी, उदयपुर, मुख्य अतिथि, पंडित मदन मोहन जी
शास्त्री ‘अविचल’ अध्यक्ष तथा आचार्य श्री रामदेव जी दीक्षिति, पूर्व निष्पादन अधिकारी श्री लक्ष्मीनारायण जी मंत्री व श्री दिनेश जी कोठारी, सेवानिवृत्त प्राचार्य डॉ. मंजु जी चतुर्वेदी, उदयपुर, दिल्ली दूरदर्शन की कार्यक्रम अधिकारी डॉ. रेखा जी व्यास विशिष्ट अतिथि रहे। मंचस्थ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन कर सत्रारम्भ किया गया। संस्था के सदस्यों व पदाधिकारियों ने मंचस्थ अतिथियों का शॉल, उत्तरीय व कण्ठहार द्वारा स्वागत किया। साहित्य मण्डल विद्यालय
के विद्यार्थियों द्वारा मनमोहक सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ दी गई।
साहित्यकारों के सम्मान के क्रम में नकद राशि रुपये पाँच हजार एक सौ से पुरस्कृत होने वाले
महानुभाव प्रो. सत्यनारायण जी समदानी, चित्तोड़गढ़ को ब्रजकांता साहित्य सम्मान-२०१८, श्री राधागोविन्द जी पाठक, बलदेव को डॉ. विष्णु चंद्र पाठक सम्मान-२०१८, डॉ. ललित जी शर्मा, झालावाड़ व डॉ. श्रीभगवान जी शर्मा, आगरा को नर्मदा शर्मा स्मृति सम्मान-२०१८, श्री अनिल जी वर्मा ‘मीत’, दिल्ली को श्री रामस्वरूप सिंघल स्मृति सम्मान-२०१८, प्रो. जमना लाल जी बायती को श्री रविन्द्र गुर्जर (अप्पू) स्मृति सम्मान-२०१८ व डॉ. यासमीन जी खान को श्री कुशल चंद जी जैन स्मृति सम्मान-२०१८ से शॉल, उत्तरीय, कंठहार, श्रीफल, श्रीनाथजी का प्रसाद, मेवाड़ी पगड़ी, श्रीनाथजी
की छवि और सम्मान पत्र देकर अभिनन्दित किया गया।
साहित्यकारों के सम्मान की इसी कड़ी में नकद राशि रुपये तीन हजार एक सौ से शॉल, उत्तरीय, कंठहार, श्रीफल, श्रीनाथजी का प्रसाद, मेवाड़ी पगड़ी, श्रीनाथजी की छवि व अभिनन्दन पत्र प्रदान कर  श्री अखिलेश जी निगम ‘अखिल’, लखनऊ को श्री कन्हैया लाल जी राठी सम्मान-२०१८, डॉ. राकेश जी चक्र, मुरादाबाद को श्रीमती कंचन बाई राठी स्मृति सम्मान-२०१८, डॉ. बसव राजू एम., बेंगुलुरु को श्री ललित शंकर जी दीक्षिति स्मृति सम्मान-२०१८ से सम्मानित किया गया। मंचस्थ अतिथियों ने श्रद्धेय बाबूजी व संस्था के साथ स्वयं के सम्बन्धों, संस्मरणों व साहित्य मण्डल की गतिविधियों को केन्द्र में रखते हुए अपने उद्बोधन दिए तथा पधारे हुए साहित्यकारों को बधाई व मंगलकामनाएँ दी। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में पण्डित मदन मोहन जी शास्त्री ‘अविचल’ ने “कौनसे व्यक्ति मृत्युपरान्त भी याद रखे व पूजे जाते हैं तथा ऐसे महापुरुषों के कर्म कैसे होते हैं” की शास्त्रीय उदाहरणों सहित व्याख्या की। उन्होंने कहा हमें ऐसे महापुरुषों के कर्मों का अनुसरण करते हुए ऐसे कार्य करने चाहिए जिससे हम जीवन काल में भले पच्चीस पैसा रहें पर मृत्युपरांत सवा रुपया हो जाएं। उन्होंने बाबूजी के व्यक्तित्व-कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए श्री श्याम प्रकाश जी देवपुरा को बधाई व शुभकामनाएँ दी कि वे उनके पिता द्वारा लगाए गए वृक्ष को संरक्षित कर रहे हैं उसे आगे बढ़ा रहे है।
कार्यक्रम का सफल संचालन श्री श्याम प्रकाश देवपुरा तथा वरिष्ठ साहित्यकार श्री विट्ठल जी पारीक, जयपुर ने किया।
हिन्दी पुरोधा, राष्ट्र भाषा सेनानी, साहित्य वाचस्पति श्री भगवती प्रसाद देवपुरा स्मृति समारोह-२०१ के दो दिवसीय आयोजन के समापन पर साहित्य मण्डल, नाथद्वारा के प्रधानमन्त्री श्री श्याम प्रकाशदेवपुरा ने देश भर से आए सभी कवि-साहित्यकारों एवं सहभागियों का हृदय की अनन्त गहराइयों से आभार ज्ञापित किया।

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