सरकारी संवेदनशीलता पर प्रश्न चिन्ह लगाता विरांगनाओं का धरना

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रामस्वरूप रावतसरे
विरांगनाएं अनुकम्पा नौकरी, मुआवजा, शहीदों की प्रतिमाएँ बनवाने और उनके नाम पर विधालयों ,गाँवों के नाम रखने जैसी माँगों के लिए जयपुर में धरना दे रही थी, उनसे ससम्मान मिल कर उनकी मांगों का सकारात्मक समाधान निकालने की जगह मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पुलिस के दम पर उनका दमन करना चाहते हैं। यह आरोप विरांगनाओं और उनका साथ दे रहे लोगों ने लगाया है।
भाजपा सांसद किरोड़ी लाल मीणा के ने वीरांगनाओं और उनके समर्थकों को उठाने का आरोप राजस्थान पुलिस पर लगाते हुए कहा है कि “सरकार को 3 वीरांगनाओं से इतना डर क्यों है कि पुलिस ने रातोंरात उन्हें उठा लिया। पता नहीं उन्हें कहाँ लेकर गए हैं? वीरांगनाएं मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से मिलने की गुहार ही तो लगा रही है। मिलकर उनकी बात सुनने से मुख्यमंत्री इतना क्यों घबरा रहे हैं? ऐसा करके सरकार वीरांगनाओं के हौसले को तोड़ नहीं सकती। हक मिलने तक संघर्ष जारी रहेगा।”
जानकारी के अनुसार धरना दे रही वीरांगनाओं के पति 2019 में पुलवामा में हुए आतंकी हमले में बलिदान हुए थे। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 7 मार्च को दो मंत्रियों प्रताप सिंह खाचरियावास और शकुंतला रावत को भेजकर इनकी माँगों पर सहमती होना भी बताया जा रहा है। लेकिन बाद में सरकार उससे पीछे हट गई। वहीं कॉन्ग्रेस का कहना है कि वीरांगनाओं को पैकेज दिया जा चुका है। उनकी मौजूदा माँगें अनुचित हैं और बीजेपी उनका राजनीतिक इस्तेमाल कर रही है।
राजयसभा सांसद किरोड़ीलाल मीणा ने आरोप लगाया है कि वो तीनों वीरांगनाओं के साथ राज्यपाल कलराज मिश्र को ज्ञापन देने राजभवन गए थे। ज्ञापन सौंपने के बाद वीरांगनाएं मुख्यमंत्री जी से मिलने के लिए मुख्यमंत्री आवास की ओर पहुंची तो पुलिस ने उनके साथ अभद्रता व मारपीट की। इसमें पुलवामा आतंकी हमले में शहीद हुए रोहिताश्व लांबा की पत्नी वीरांगना मंजू जाट घायल हो गईं। उन्हें एसएमएस हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है। क्या वीरांगनाओं का प्रदेश के मुखिया से मिलने के लिए उनके सरकारी आवास की ओर जाना गुनाह है, जो पुलिस ने उनके साथ अभद्रता व मारपीट की? इस घटना को लेकर राष्ट्रीय महिला आयोग की चेयरपर्सन रेखा शर्मा ने संज्ञान लिया है। उन्होंने राजस्थान के डीजीपी को व्यक्तिगत तौर पर इस मामले को देखने को कहा है। बलिदानियों की विधवाओं द्वारा पुलिस अधिकारियों पर लगाए गए बदसलूकी के आरोपों की जाँच करने के लिए भी कहा है।
राज्य मंत्री गुढ़ा के बयान के बाद सामने आया है कि राजस्थान के 81 शहीदों के परिजनों को सालों से नौकरी नहीं मिली है। देश की रक्षा के लिए प्राण देने वाले शहीदों के परिजन अब सरकारी सुविधाओं के लिए दर-दर की ठोकर खा रहे हैं। अनुकंपा नियुक्ति पाने के लिए रोजाना सरकारी ऑफिस के चक्कर काट रहे है। इनमें 1962 में भारत-पाक और 1965 में हुए भारत-चीन युद्ध के शहीदों के परिजन भी बताए जा रहे हैं। इनके आवेदन 2 साल से ज्यादा समय से पेंडिंग हैं।
जानकारी के अनुसार 158 स्कूल और 25 चिकित्सा संस्थान आज भी शहीद के नाम से नहीं हो पाए। वहीं, पिछले 3 साल में शहीद हुए 11 जवानों के परिजन एक मुश्त 45 लाख की नकद सहायता और पोस्ट ऑफिस मंथली इनकम से वंचित बताए जा रहे है। इतना ही नहीं शहीदों के परिजन नल-बिजली कनेक्शन और रोडवेज में पास के लिए भी भटक रहे हैं।
इस मामले में सामने आया कि सरकारी योजनाओं की मॉनिटरिंग के लिए सिंगल क्लिक विंडो सिस्टम है। लेकिन, शहीदों के परिजनों को सरकारी योजनाएं पाने के लिए कोई ऑनलाइन आवेदन का सिस्टम और सिंगल क्लिक विंडो का ऑप्शन नहीं है। हाल ही में सदन में पूछे गए एक सवाल के जवाब में सरकार ने बताया कि शहीदों के परिजनों को सरकारी सुविधाएं उपलब्ध करवाने के लिए कोई ऑनलाइन सिस्टम नहीं है और न ही सरकार के पास ऐसा कोई प्लान या व्यवस्था है।
सैनिक कल्याण राज्य मंत्री राजेंद्र सिंह गुढ़ा ने भी विधानसभा में माना कि कई कलेक्टर और राजस्व विभाग के अफसर शहीदों के परिजनों का बिल्कुल सहयोग नहीं करते है। उन्होंने जयपुर में चल रहे पुलवामा शहीदों के धरने में पहुंचकर कहा था कि ’’ विरांगनाओं को धरना देना पड़े , ये सरकार के लिए शर्म की बात है।’’ उन्होंने शहीदों के परिजनों को हो रही दिक्कतों के मसले को कैबिनेट मीटिंग में रखने की बात भी कही थी।
जानकारी के अनुसार लोकेन्द्र सिंह शेखावत के अनुसार उनके पिता 1971 के भारत पाक युद्ध में शहीद हुए थे। अनुकंपा नौकरी के लिए कनिष्ठ सहायक के लिए आवेदन कर रखा है। फिलहाल नवम्बर 2021 से फाइल झुंझुनूं कलेक्टर के पास अटकी हुई बताई जा रही है। मुबीना बानो के पिता 31 अगस्त 2000 को बैटल एक्सीडेंट में शहीद हो गए थे। अनुकंपा नियुक्ति पर कनिष्ठ लेखाकार की नौकरी के लिए आवेदन किया हुआ है। फाइल अजमेर कलेक्टर के पास पेंडिंग में है। वहीं, इसी गांव के साल 1967 में ऑपरेशन मिजोरम हिल में शहीद हुए कैप्टन अल्लानूर के पोते अकरम काठात के अनुसार 4 साल से गांव के पंचायत भवन का नामकरण उनके दादा शहीद कैप्टन अल्लानूर के नाम होना पेंडिंग चल रहा है। ऐसे ओर भी प्रकरण है जो सरकारी स्तर पर लम्बित चल रहे है।
शहीद परिवारों की जो भी मांगे है, उनका समाधान भी सरकारी स्तर पर किया जाना है। फिर इस प्रकरण को इतना उलझाया क्यों जा रहा है। यदि सरकार की तरफ से शहीद परिवारों को नियमानुसार जो भी सुविधाएं दी जानी थी और उन्हें दे दिया गया है तो पहले दिन ही उन्हें समझाया जा सकता था। परन्तु सरकार की ओर से ऐसा नहीं किया गया। सरकार ने दो मंत्रियों को बातचीत के लिए भेजा भी लेकिन उसका कोई समाधान सामने नहीं आया। सरकारी स्तर पर शहीद परिवार को क्या और कितना दिया जाना शेष है इस पर तथ्य परक कार्यवाही होनी चाहिए थी। शायद ऐसा नहीं होने पर ही विरांगनाओं को धरने जैसा कदम उठाना पड़ा। हमारी प्रजातांत्रिक व्यवस्था ही इस प्रकार की है। जब सामने भीड़ होती है तक हमारे नेताओं की संवेदनाएं दहाड़े मारने लग जाती है। लेकिन जब शहीद परिवार के सम्मान में जो भी नियमानुसार किया जाना चाहिए उसमें हमारा तन्त्र दीवार बन कर खड़ा हो जाता है। जैसा कि अब सामने आ रहा है। सरकार को पहल करते हुए इसका जो भी सकारात्मक समाधान निकल सकता हो ,करना चाहिए।

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