शादी का रिश्ता – अंकुश्री

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शादी से मतलब है पत्नी और उससे जुड़ा भावनात्मक तथा दैहिक संबंध.मगर औरत से सिर्फ दैहिक संबंध ही जुड़ पाता है. किसी औरत से भावनात्मक संबंध भी हो सकता है, मगर उस संबंध में पत्नी वाला स्थायित्व नहीं हो सकता. इसलिये शादी और औरत दोनों दो बातें हैं.हो सकता है कि शादी के बाद पत्नी से संबंध विच्छेद हो जाये. तलाक के नमूने भरे पड़े हैं, जिसमें रोज-रोज बढ़ोत्तरी ही होती जा रही है. मगर तलाक या पत्नी से संबंध विच्छेद को शादी का ढ़ंग या रिष्ते का अंग नहीं कह सकते. तलाक या संबंध विच्छेद निहायत ही व्यक्तिगत कारण से होता है. इसमें शादी जैसी संस्थागत व्यवस्था का कोई दोष नहीं है. दुनिया के किसी भी समाज में पति-पत्नी के संबंधों की गहराई पर ही शादी को आंका जाता है. शादी में एकपत्नी या बहुपत्नी अथवा एकपति या बहुपति की सामाजिक अथवा परम्परागत व्यवस्था हो सकती है. शादी में आपसी झगड़े भी हो सकते हैं. छोटी-मोटी बातों पर मुंहफुल्लवल और फिर मनाने की प्रक्रिया भी चल सकती है. मगर यह शादी के बाद पत्नी के साथ ही संभव है. औरत के साथ संबंध में रूठने या मनाने की गुंजाईष नहीं होती. बिना शादी के औरत पुरुष को भावनात्मक रूप से जोड़ने का प्रयास करती है. मगर ऐसा करने के पीछे वास्तविकता कम, व्यावसायिकता अधिक होती है. यही तो बुनियादी फर्क है शादी की पत्नी और बिना शादी की औरत में. किसी होटल में ग्राहक से घर का माहौल बनाने की कोषिष की जा सकती है. मगर होटल कभी भी घर नहीं हो सकता.
जब प्रेम होगा तो झगड़ा होगा ही, क्योंकि झगड़े का सीधा संबंध भावना से है. औरत के साथ चूंकि भावनात्मक संबंध का अभाव होता है, इसलिये वहां सही भावनाएं विकसित नहीं हो पातीं. यदि भावनाएं उत्पन्न भी हो जाती हैं तो उनका विकास नहीं हो पाता. जब भावनाएं ही नहीं हों तो झगड़ा कैसा और किससे ?
मुझे यह नहीं कहना है कि बिना झगड़ा के पति-पत्नी का संबंध ही नहीं हो सकता. लेकिन किसी औरत के साथ सिर्फ दैहिक संबंध के लिये जुड़े पुरुष का झगड़ा नहीं होता, भले उस औरत के कारण किसी से झगड़ा हो जाये.
दहेज नहीं जुटा पाने के कारण शादी नहीं हो पाने या विलंब से शादी होने की मजबूरी अलग बात है और पति-पत्नी के भावनात्मक संबंधों की गहराई दूसरी बात. पति-पत्नी के संबंधों में जो स्थिरता है, वह अन्य किसी संबंध में नहीं है. माता-पिता जनक होते हैं. मगर गोद में खेलने, बड़ा होने, शादी के बाद बहू या दामाद बन जाने, संतान होने और बूढ़ा हो जाने पर उसी माता-पिता से हमारा संबंध समयानुसार बदलते रहता है. माता-पिता की तरह भाई-बहन, दादी-नानी, गुरु-षिष्य आदि भी सामाजिक संबंधों के रूप में पाये जाते हैं. रिष्ते की ये सारी पहचान परिवार में होता है, शादीसुदा परिवार में होता है. इससे भी शादी का महत्व पता चलता है.
जहां खुषी है, वहीं विषाद भी है. मगर पति-पत्नी के संबंध में इधर तनाव, कलह आदि की बढ़ोत्तरी हुई है. इसके लिये शादी को दोष नहीं दिया जा सकता. इसका कारण विज्ञान को अपने लिये उपयोगी बनाने हेतु किया जा रहा भागमभाग दोषी है. इसी का एक रूप है पति-पत्नी दोनों का कमासूत हो जाना. ईमानदारी की कमाई वाले परिवार में एक की कमाई से पूरे परिवार का बोझ नहीं चल सकता. और यदि बेईमानी की कमाई करनी हो तो इसके लिये पति-पत्नी दोनों की कमाई जरूरी भले नहीं हो, मगर औद्योगिकरण और शहरीकरण के इस युग में जिंदगी तो तनावपूर्ण हो ही जाती है. इसके लिये हम शादी को दोष हरगिज नहीं दे सकते.
यह सोचना कि पत्नी से प्राप्त सुख की तुलना में शादी से होने वाला दुख अधिक है, अनुचित होगा. शादी केवल पत्नी, दैहिक संबंध या भावना तक ही सीमित नहीं है. यह समाज की एक सुव्यवस्थित आवष्यकता है, जिससे सुसंस्कृत सभ्यता का विकास होता है और रिष्ते की एक परम्परा बनती है तथा अराजकता की स्थिति बढ़ने से रूकती है.
सृष्टि के विकास में शादी का महत्वपूर्ण योगदान है. इसलिये यह आवष्यक हो जाता है कि पति-पत्नी बनने के लिये युवक-युवती की उम्र सही हो. कम उम्र में अनुभव का अभाव रहता है और अधिक उम्र में बच्चे के जन्म में कठिनाई होती है और जो बच्चे जन्मते हैं, उनका पालन-पोषण कठिन होता है. पति से पत्नी का कम उम्र का होना भी दोनों के स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिये आवष्यक प्रमाणित हो चुका है. 25 वर्ष के युवक और 20 वर्ष की युवती को शादी के योग्य माना जाना श्रेयष्कर है.
पति-पत्नी का रिष्ता दो अनजानों के बीच शुरू होता है और फिर जिंदगी का साष्वत रिष्ता बन जाता है. इस रिष्ते का बुनियाद आपसी समझदारी पर टिका होता है. कुछ लोग शादी से पूर्व एक-दूसरे को जान चुके होते हैं. मगर इससे वैवाहिक जीवन सफल हो ही जाये ऐसा नहीं सोचना चाहिये. समझदारी के अभाव में रिष्ता बदबूदार हो जाता है. समझौतावादी रूख अख्तियार कर लेने के बाद तो जिंदगी में खुषबू ही खुषबू फैल जाती है.

अंकुश्री
प्रेस काॅलोनी, सिदरौल,
नामकुम, रांची (झारखण्ड)-834 010

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