साधू नहीं, शैतान हूं मैं

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साधू नहीं, शैतान हूं मैं
अध्यात्म का नहीं
हवश का पुजारी हूं मैं…
मैंने सैकडों कलियों को
फूल बनने से पहले ही मसला है
इंसानों की लाशों पर बैठकर बजाया तबला है |

मैं हूं नरपिशाच
रक्त की, मानवी रक्त की
भूख थी, प्यास थी
मिटाई – बुझाई
मैंने हजारों – हजार की चिता जलाई /
कब्र सजाई |

कौन भगवान, कैसा भगवान ?
मैंने अंधभक्ती की आंधी चलाई
अरबों – खरबों की प्रोपटी बनाई
कलयुग में सतयुग की अलख जगाई
मैंने ढोंगी अास्था रचाई…

साधू नहीं, शैतान हूं मैं
इसी की सजा आज मैंने पाई
ऊपर वाले के थप्पड़ से कब तक,
आखिर कब तक बचता रे भाई
मैंने अपने कुकर्मों की सजा
फिर भी बहुत छोटी पाई…
साधू नहीं, शैतान हूं मैं !

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

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