मध्यप्रदेश सरकार का शर्मनाक नजरिया…

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Devendraraj
हाल में मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में कोचिंग से घर लौटती एक छात्रा के साथ कुछ असामाजिक तत्वों ने गैंगरेप किया। गैंगरेप के बाद जब छात्रा ने मां-बाप के साथ पुलिसथाने में जाकर अपने साथ हुई इस वीभत्स घटना की रिपोर्ट लिखवानी चाही, तो तकरीबन बीस घंटे तक रिपोर्ट नहीं लिखी गई। पुलिस की उदासीनता का जब सरकार को पता चला तो बहुत से अफसरों को सरकार ने हटा दिया। इसके बाद मध्यप्रदेश सरकार का जो नजरिया सबके सामने आया वो कोई कम हैरत में डालने वाला नहीं था। सरकार ने कहा कि कोचिंग कक्षाओं से छात्राओं की वापिसी सात बजे तक हो जाए, या फिर कोचिंग सेंटर इन छात्राओं की मोबाइल टेक्नोलॉजी से मॉनिटरिंग की गारंटी करे। सरकार की इस सोच से साबित होता है कि दुष्कर्म, बलात्कार जैसी घटनाओं के लिए एकमात्र लडकियां ही दोषी है। रूढ़िवादी व पुरापंथी मानसिकता से ग्रस्त सरकार का ये रवैया हर किसी के समझ से परे है। एक तरफ देश और राज्य में बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की बात हो रही है, वहां बेटियां कैसे पढ़ पायेगी जब उसी के घर से सौ मीटर दूर कुछ बदमाश उसकी अस्मत लूटकर व बलात्कार करके चले जाते है। फिर जहां सरकार व पुलिस तंत्र ऐसी घटनाओं को रोकने में निष्फल होने लगे तो सरकार यह कह दे कि शाम सात बजे के बाद बेटियों को घर से बाहर न निकलने दे। दरअसल, मध्यप्रदेश सरकार का ये नजरिया हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तरप्रदेश की खाप पंचायतों के फरमानों से पृथक नहीं है।
ये खाप पंचायतें लडकियों के साथ हो रहे बलात्कारों का कारण उनका रात में जींस पहनकर घूमना और मोबाइल का प्रयोग करना बताती है। यहीं कारण था कि कुछ महीनों पहले राजस्थान की एक खाप पंचायत ने बेटियों के जींस पहनने व मोबाइल के प्रयोग करने पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन, बेटियों ने यह प्रतिबंध तोडकर ऐसी गैर-कानूनी खाप पंचायतों के गलत फैसले को दरकिनार कर दिया। अब जहां मध्यप्रदेश सरकार को यह भय है कि रात को सात बजे के बाद लडकियां का शिक्षण संस्थाओं से आना बलात्कार का कारण बनता है तो सरकार सात बजे बाद बेटियों की जगह बेटों को घर से बाहर ही न निकलने दे। आखिर बेटियों पर ही हर बार पाबंदी क्यों ? सच तो यह है कि जिन सरकारों के पास कोई जबाव नहीं होता वे अकसर उलूल-जुलूल बकवास करके अपनी हंसी उडाती रहती है। अगर वाकई में ऐसा है कि सात बजे के बाद ही बेटियों के साथ बलात्कार होते है और जिसकी तथाकथित वजह जींस पहनना और मोबाइल रखना है तो दिल्ली, गुडगांव और कर्नाटक में पांच-छह साल की बच्चियों के साथ बलात्कार के लिए कौनसे कारण जिम्मेदार ठहराये जायेंगे है ? क्या वे अश्लील कपड़े पहनी होती हैं ? क्या वे मोबाइल का इस्तेमाल करती हैं ?
हकीकत तो यह है कि आज भी हमारे पूरे समाज पर पुरुष प्रधानता हावी है। हर काम में पुरुषों को प्राथमिकता दी जाती है। औरत को आज भी दूसरे दर्जे का नागरिक समझा जाता है। भले वे मुहावरे हो, कहावते हो, नारे हो सभी जगह पुरुषों का वर्चस्व दिखाया जाता है। कोई काम करने से पहले पुरुषों की राय व रजामंदी लेना हमारे समाज में मानो एक रस्म है। दीगर, समाज में लडकियों को घास-फूस की तरह बताकर उसे पराया धन ही समझने की भूल की गयी है। आज भी बेटी के जन्म से लेकर शिक्षा व शादी की विदाई तक परिवार में कोई खास स्थान व अहमियत नहीं दी जाती है। बचपन में ही रसोई में धकेलकर उनके साथ नौकर की तरह बर्ताव किया जाता है। पुरानी कहावत आज भी प्रचलन में है – मां बेटे की खिचड़ी में घी ज्यादा डालती है। सबको कमाऊ पूत पसंद है ! यह समझने की जरूरत है कि बलात्कार करने वाले तो बदमाश नौजवान थे, लेकिन उसके बाद अपने हिंसक बर्ताव से बलात्कार की शिकार युवती और उसके परिवार के साथ और बलात्कार करने वाले तो सरकारी कुर्सियों पर बैठे हुए वर्दीधारी लोग थे। इन विषम हालातों में सरकार योजनाओं पर योजनाएं ही क्यों न लागू कर दे, यहां फिर सरकार भले ही खुद को बेटियों का मामा ही घोषित क्यों न कर दे व उनका कन्यादान ही क्यों न करा दे, लेकिन तभी भी बलात्कार रुकने संभव नहीं है। जब तक मूलभूत समस्या का जड़ पतन नहीं होगा, तब तक समाज से दुष्कर्म का दंश काला कलंक बनकर सिर पर मंडराता ही रहेगा।
यह भी अजब द्वंद्व है देवियों के नाम पर योजनाएं चलाने वाले समाज में खुद देवियां ही सुरक्षित नहीं है। अंततः सरकारों को समझना होगा कि समस्या का समाधान सात बजे के बाद बेटियों को घर के बाहर निकलने या कोचिंग संस्था से देर रात तक घर लौटने पर रोक लगना नहीं है, बल्कि नारी मूल्यों के प्रति गैर जिम्मेदार होते समाज को दिशा देना है। बेटियों को कामुकता को शै दिखानी वाली फिल्मों व विज्ञापनों पर नकेल कसना है, अश्लील फिल्मों के निर्माण व प्रचार-प्रसार पर रोक लगाना है, बेटियों को आत्मसुरक्षा के गुर सिखाना है, पुलिस तंत्र को दुरुस्त करना है, संदिग्ध इलाकों पर विशेष ध्यान रखना है, बेटियों में आत्मविश्वास भरना है व बदमाशों के दिलो-दिमाग में डर कायम करना है। यह कुछ उपाय काफी हद तक इस बीमारी की रोकथाम कर सकते है।
– देवेंद्रराज सुथार
जिला-जालोर, राजस्थान

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