नई शिक्षा नीति में प्राथमिक स्तर पर मातृ भाषा शिक्षण व्यवस्था पहल अच्छी: क्रियान्वयन सरल नहीं

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rajendra mohan
राजेन्द्र मोहन शर्मा
शिक्षाविद् और साहित्यकार और चिन्तक
केन्द्र सरकार द्वारा नई शिक्षानीति के अनुमोदन में प्राथमिक शिक्षा के प्रथम पांच वर्षों के लिए मातृभाषा में शिक्षण का प्रावधान कर हमारी संस्कृति की जड़ों को सिंचित करने का महत्वपूर्ण काम किया है ।वास्तव में मातृभाषा की भारतीय संकल्पना को पश्चिमी नजरिये से देखना न तो उचित है न ही हम इस आधार पर इसे समझ सकते हैं ।मातृभाषा का अर्थ है मां की भाषा अर्थात झूले-पालने की भाषा ।प्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक रवींद्रनाथ श्रीवास्तव लिखते हैं कि शिक्षा के प्रयोजन की दृष्टि से मातृभाषा के दो आयाम हैं। पहले रूप में मातृभाषा का अर्थ है मां की भाषा अर्थात झूलणे-पालणे की भाषा । इसी अवस्था में  शिशु अपने भाषाई बोध एवं जीवन बोध का निर्माण करता है । लेकिन पश्चिम से अलग भारत जैसे बहुभाषी देश में मातृभाषा का एक और भी आयाम है। वह भाषा भी मातृभाषा ही है जो चौराहों बाजारों के साथ व्यापक सामाजिक जीवन का आधार  है । जिसके माध्यम से व्यक्ति विचार, संस्कार और जातीय इतिहास एवं परंपरा से जुड़ता है। इसी के विस्तार को हम कह सकते हैं प्रादेशिक भाषाएं भी मातृभाषा का ही रूप हैैं । ये ही हमारे शिक्षण का माध्यम बन सकती हैै  उदाहरण के लिए अयोध्या में रहने वालों की मातृभाषा एक तरफ अवधी है तो दूसरी तरफ हिंदी भी। इसी तरह धनबाद में रहने वाले आदमी की मातृभाषा एक तरफ ‘खोरठा’ भाषा है तो हिंदी भी उसकी भाषा है। यही स्थिति कर्नाटक में भी देखी जा सकती है जहां एक बड़ी आबादी ‘तुलु’ नामक भाषा तो बोलती है, लेकिन व्यापक प्रयोजनों के लिए कन्नड़ का प्रयोग करती है। यही चीज तेलंगाना में ‘लंबाडी’ भाषा बोलने वालों और तेलुगु के संदर्भ में देख सकते हैं। कहने का तात्पर्य है कि प्रादेशिक भाषाएं भी एक स्तर पर मातृभाषा का ही रूप हैैं और जो सरकारी स्कूलों में शिक्षण का माध्यम भी हैैं। स्पष्ट है सारे जगत का यह सर्वश्रेष्ठ सिद्धांत माना गया  है  कि बच्चों के पूर्ण मनो-बौद्धिक विकास के लिए आरंभिक शिक्षण मातृभाषा में होनी चाहिए ।शिक्षाशास्त्र के विभिन्न शोध बताते हैं कि बच्चों के पूर्ण मनो-बौद्धिक विकास के लिए आरंभिक शिक्षण मातृभाषा में ही होना चाहिए। यूनेस्को ने भी जोर देकर कहा है कि आरंभिक शिक्षण मातृभाषा में होने से बोध एवं संज्ञान क्षमता बढ़ती है। छोटे बच्चों के संदर्भ में लगभग सभी शिक्षाविदों का अनुभव है कि गणित सहित  सामान्य चीजें भी अंग्रेजी में उन्हें नहीं समझ आतीं । जबकि वही चीज हिंदी या उनकी अपनी मातृभाषा में बताई जाए तो उनके लिए ज्यादा कठिनाई नहीं आती। शैक्षणिक मनोविज्ञान के अनुसार मातृभाषा में संप्रेषण एवं संज्ञान सहज तथा शीघ्र हो जाता है। इससे बच्चे कठिन चीजें भी आसानी से समझ लेते हैं, जबकि इतर भाषाओं में बच्चों को रटना पड़ता है, जो उनके पूर्ण मानसिक विकास के बाधक है।
              यह भी पहली बार हुआ है कि केंद्र सरकार ने पूर्व प्राथमिक शिक्षा को विधिवत मान्यता प्रदान कर दी है ।अभी तक तो यह हो रहा था की अभिभावकों और शिक्षाविदों का रुझान पूर्व प्राथमिक शिक्षा की ओर तेजी से बढ़ रहा था इसी का लाभ उठाकर हजारों स्कूल कुकुरमुत्तों की तरह पूर्व प्राथमिक शिक्षा के लिए खड़े हो गए थे । जिनके लिए न तो कोई नियम थे और ना ही कोई व्यवस्था थी अनेक स्थानों पर छोटे-छोटे कमरों में बिना किसी समुचित सुरक्षा और साधन के पूर्व प्राथमिक शिक्षा के नाम पर स्कूल खोल दिए गए थे । जहां न तो प्रशिक्षित शिक्षक थे और नहीं स्थानीय मातृभाषा का वर्चस्व । अपितु बाजार के दबाव के कारण पूर्व प्राथमिक कक्षाओं में भी अंग्रेजी का हव्वा खड़ा किया जा रहा है । छोटे छोटे  3 साल की उम्र में बच्चे स्कूल में तो पहुंच जाते थे लेकिन अपनी भाषा में बातचीत की कमी और शिक्षा के अभाव से बहुत जल्दी ही उनमें शिक्षा के प्रति रुचि उत्पन्न होने लगी है । कम से कम भारत सरकार ने इस दिशा में नीतिगत निर्णय लेकर पूर्व प्राथमिक शिक्षा को कानून के दायरे में ला दिया है और  मातृभाषा में शिक्षा देने के लिए समुचित कानूनी प्रावधान भी कर दिया है । अब आवश्यकता केवल इस बात की रहेगी के संबंधित एजेंसी सख्ती के साथ इन्हें लागू करने का काम करें और समुचित दिशा निर्देश प्रदान करे ।
 दुर्भाग्य से आज कथित मॉडर्न, एजुकेटेड, दिखावटी तथाकथित एलीट क्लास हिंदी भाषी लोग अपने बच्चों को हिंदी और मातृभाषा भी ठीक से नहीं बोलने दे रहे हैं । अंग्रेजी के दबाव ने बच्चों की नैसर्गिक प्रतिभा को कुंठित कर दिया है । ग्रामीण संस्कृति में जहां मातृभाषा में बच्चे सहजता और सरलता से अपना विकास कर पाते हैं वहां कुकुरमुत्तों की तरह उगे अंग्रेजी स्कूलों ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा। न तो वह ठीक ढंग से अपनी मातृभाषा में शिक्षा ग्रहण कर पा रहे हैं और ना ही उन्हें अंग्रेजी का समुचित ज्ञान मिल रहा है । अंग्रेजी के मोह ने अभिभावकों पर भी जादू कर रखा है, वहाँ बाजारवाद इतना हावी है कि उसने अंग्रेजी को सर्वोपरि उपलब्धि बताकर ख्याति प्रदान कर रखी है।  जिसे अंग्रेजी आती है मानो उसके लिए सकल विकास के सारे रास्ते अपने आप खुल जाते हैं जबकि वास्तविकता यह है की हिंदी भाषी या अन्य भाषाओं के लोग जितने बेरोजगार हैं उससे कहीं अधिक मात्रा में अंग्रेजी पढ़े लिखे लोग हमारे देश में बेरोजगारी भुगत रहे हैं।
           अंग्रेज़ी सिखाने के चक्कर में “बेटा सिट हो जाओ”  सिखाए जा रहे हैं। क्योंकि बच्चे क्विक लर्नर होते हैं, आपने सिट बोला, कल को आपके बालक ,बालिका की, किसी के सामने ज़ुबान फिसल गई और उसने “मम्मी शिट हो जाओ” बोल दिया तो गड़बड़ हो जाएगी। छोटे बच्चों को स, श और ष का अंतर बाद में समझ आता है। अत: ठीक से समझिए लीजिए कि हिंदी और मातृ भाषा बोलना अपराध नहीं है, ना ही अंग्रेज़ी बोलना ज्ञानी/मॉडर्न होने की निशानी। दोनों को मिलाकर कृपया गुड़गोबर ना करें। भाषा को महानता का पर्याय ना बनाएँ । मेरी एक परिचित ने भाषा मिश्रण का अद्भुत उदाहरण पेश किया वे बोली ” म्हारा टाबरिया ने राइस ( चावल) खा के मुंड्या (मुंह) ही भांड लिया ” सोचिए बच्चा क्या करेगा ।
        आज मातृ भाषा शिक्षण की चुनौतियां बहुत व्यापक हैं । अभी तो यही पता नहीं है कि स्वयं अभिभावक इस बात के लिए कितने तैयार होंगे क्योंकि पिछले तीन-चार दशकों में मातृ भाषा शिक्षण की जड़ों में पूरी तरह मट्ठा डाल दिया गया है । अगर  अभिभावक ही अपने बच्चों को मातृभाषा से सिखाने को तैयार नहीं होंगे तो फिर इस तरह के शिक्षण का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा। फिर सवाल उठेगा पढ़ाने वाले शिक्षकों का , वे कहां से लाए जाएंगे । इस क्षेत्र में बनाए जाने वाले पाठ्यक्रम का क्या होगा पुस्तकें कैसे बनेंगी और उनका मूल्यांकन कैसे होगा ।    राष्ट्रीय स्तर पर मातृ भाषा शिक्षण के जो आंकड़े हैं वह बुरी तरह डराने वाले हैं पिछले कुछ वर्षों में तेजी से मात्र भाषा शिक्षण कराने वाली शिक्षण संस्थाओं पर ताले लगते जा रहे हैं । आज पूरे देश में मुश्किल से  10 प्रतिशत प्राथमिक विद्यालय होंगे जो  मातृभाषा में काम कर रहे हैं, वे भी मजबूरी के मारे हैं । अतः सरकार को अपने इस निर्णय को क्रियान्वित करने के लिए चौतरफा कमर कसने पड़ेगी । सबसे बड़ी बात अंग्रेजी का जो हौव्वा खड़ा हो गया है और उसके प्रति जो मोह पैदा हुआ है उसके दुष्चक्र को कैसे तोड़ा जाएगा यह देखने वाली बात होगी । मातृ भाषा शिक्षण की सबसे बड़ी चुनौती सरकार का निर्णय ही है जिसमें कहा गया है कि भारतीय संविधान में स्वीकृत 22 क्षेत्रीय भाषाओं को ही मातृभाषा के रूप में पढ़ाई के लिए स्वीकार किया जाएगा यही सबसे बड़ी समस्या है कि इतने बड़े देश में जहां पर हर 4 कोस में बोली और 10 कोस में भाषा बदल जाती है वहां मातृभाषा में यदि संवैधानिक बाध्यता को बरकरार रखा गया तो इसका लाभ मिलना कठिन होगा । सरकार ने भाषा की दृष्टि से 3 भाषाएं पढ़ाने के लिए प्राथमिक स्तर पर निर्धारित की हैं ।लेकिन यहां भी राज्यों को यह छूट दी गई है कि वे हिंदी के स्थान पर किसी अन्य भाषा को चुन सकते हैं  यही सबसे बड़ी समस्या है कि एक तरफ हम हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दे रहे हैं और दूसरी तरफ प्राथमिक स्तर पर भी हिंदी को पढ़ाने में हिचक रहे हैं ।  वास्तव में हिंदी के नाम पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन से ठीक पहले ही राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया था और तमिलनाडु ने इसका भारी विरोध किया था । यह दुर्भाग्य की बात है कि ऐसे विवादास्पद मुद्दों पर कांग्रेस भी खुलकर हिंदी के पक्ष में खड़ी नहीं होती है । नतीजा यह हुआ कि केंद्र सरकार को बीच का रास्ता अपनाते हुए राज्य सरकारों पर भाषाई सूत्र छोड़ना पड़ा है । अब आप सोचिए की हिंदी भाषी क्षेत्रों में तो हम अपनी मातृभाषा  के साथ साथ तीसरी भाषा  सीखेंगे लेकिन दक्षिण भारत के लोग मातृभाषा ,अंग्रेजी और अन्य कोई तीसरी भाषा सीखेंगे अर्थात उनके यहां हिंदी नहीं होगी । यह स्थिति राष्ट्रीय एकता पर भी प्रहार करती है और शिक्षा को भी कुंठित करती है ।लगता है कुछ जगहों पर केंद्र सरकार को कठोरता अपना कर इसे लागू करना चाहिए ।
 यदि किसी रूप में भी हम मात्र भाषा शिक्षण को जमीन पर उतारने में सफल हो गए तो निश्चित रूप से हमारी संस्कृति के लिए यह एक महान उपलब्धि होगी और शिक्षा प्राप्त करने वाले बच्चों को उज्जवल भविष्य के मार्ग पर जाने से कोई नहीं रोक सकेगा ।

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