सोचती हूँ अक्सर-डॉ सुलक्षणा अहलावत

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सोचती हूँ अक्सर
कब पूरी होगी मेरे सपनों की तस्वीर   unnamed-1
कब बदलेगा वक़्त ये
और कब बदलेगी मेरे देश की तकदीर

नजर नहीं आता क्या
आज़ाद देश के गुलाम बनकर रह गए
कहने को हैं निरपेक्ष
पर धर्म जात के नाम पर तनकर रह गए

क्या इसी दिन के लिए
उन नौजवानों ने सीने पर गोलियाँ खाई थी
ज़मीर से पूछो तो सही
क्या इसी दिन के लिए आज़ादी दिलाई थी

कब तक जिंदा रहोगे
अपनी आँखों की शर्म को तुम मार कर
कब तक चुप रहोगे
ले जायेगा कोई शीश तुम्हारा उतार कर

जरा आँख खोलकर देखो
लहूलुहान पड़ी सुबक रही है भारत माता
इंसानियत दफना दी
एक कोने में दुबक रही है भारत माता

एकता हमारी लापता है
संस्कृति बचाने की किसी में शक्ति नहीं रही
एक हकीकत ये भी है
जवानी में जोश है पर वो देशभक्ति नहीं रही

खुद सोचते नहीं हम
बस भेड़चाल चलने की हमें आदत हो गयी
कलम बिक गयी
चौथे स्तंभ को भी अय्याशी की लत हो गयी

देखो कैसी विडंबना है ये
भारत में भारतीय कोई कोई नजर आता है
झूठ नहीं पसंद किसी को
पर सच का कोई हिमायती नहीं पाता है

मत लिखा कर “सुलक्षणा”
सच सुनने का शौक अब किसी को नहीं रहा
दर्द बढ़ जाता है दिल का
जब लोग कहते हैं पढ़कर कि “बहुत खूब कहा”

डॉ सुलक्षणा अहलावत

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