स्वत्व का पहाड़

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नही कोई झिझक
अपनी सामर्थ्य का बंटवारा हो जाये
ठीक रहेगा आखिर कुछ होगा सकारात्मक
ओर तपिश पाते पौधे
जीवन दायी बारिश से भीगकर
स्व स्फूर्त होकर प्रवृत्त होगे सृजन
फूटने लगेंगे अंकुर
अपने विस्तार से छाया निमित्त
आनंद घन बरसते जाते
मिटते अपने अस्तित्व से कि हो सके सृजन
ओर जगत का सौंदर्य हो नित नवीन
मधु मुकुल नवल रस से ओतप्रोत
मत करो कोशिश
सृजन को छीन कर नष्ट कर देने की
तुम्हारी यह इर्ष्या तुम्हारा ही नही
उस भावना का धौतक बन चुकी
जो कभी नही पा सकी आकार
नही ले सकी श्वास जीवंतता का
ओर हर बार होती रही नाकाम ओर
पोतती जाती कालिस अपने ही हाथो
अपने चेहरे
अच्छा होगा सकारात्मक रहो
ओर सीखते जाओ शैली सृजन की
पर नही होगा काफी यह
जर्रा जर्रा तपिश पाये बिना
प्राणों का राग बिना वेदना की कसक पाये
नहीं होता स्फुटित
मिटाना होगा स्वत्व का पहाड
तभी फूटेगा निर्झर
ओर सरित बन बहने लगेगा सृजन स्त्रोत ।


छगन लाल गर्ग विज्ञ ।

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