तलाक़ शुदा का दर्द

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रोज दोराहे पे खड़ी ,जिंदगी चिढ़ाती है।

मुझको तो जिंदगी से, मौत अधिक भाती है।

शौहर के हाथों का, खिलौना मैं बनी हूँ जबसे।

आज ही लाई ,कल छोड़ दी गई हूँ तबसे।

जाने कब से झेल रही ,जुल्मों सितम शौहर के।

तलाक़ के तीन शब्द ,नासूर बने पीहर के।

बेबस लाचार अवला ,नारी बनी बेचारी।

बिना पढ़ी क्या करे ,सहन करे लाचारी।

जब चाहा अपनाया,जब चाहा छोड़ दिया।

मुझको ये कौन से ,क़ुसूर का सिला मिला।

तंग दिल लोगों की ,महफ़िल में कैसे रहें।

आंसू भी सूख चुके ,कहें भी तो किससे कहें।

चैन की हो जिंदगी, बस इतनी सी जुस्तजू है।

समझे जज्बातों को ,बस यही एक आरजु है।

✍?नाम-दीपासंजय*दीप*

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