“पतली छरहरी थी वो काया” 

0
89
काले कजरारे से नयनों वाली, ऊपर से  मद था छाया।
यौवनं का श्रृंगार उस पर,पतली छरहरी थी वो काया।|

:-कटि मृग सी थी उसकी, मुख पर थी उसके लाली छाई।
पंखुड़ियों से होंठ थे उसके, गज सी उसने चाल थी पायी
कमर पर उसके काली वेणी, नागिन सी लहराती जाए।

मस्त मतवाली झूम रही,बेल जैसी वो बल खाये।

देख मेरा मन हुआ बावरा,अजब सा नशा था छाया।
यौवन का श्रृंगार उस पर,पतली छरहरी थी वो काया।।
     :-कमलनाल सी बाहें उसकी, हँसी में उसकी थी किलकारी।
       कपोल सुर्ख लाल थे उसकेफूलों की जैसे वो फुलवारी।
       कोयल किसी वाणी उसकी,मेरे हृदय को चीर गई।
शीतल जल सा हुआ हृदय मेरा, सारी तन की पीर गयी।
नजर भर जब उसको देखा, मदिरा का प्याला छलक आया,
मेरा मन तो झूमे बावरा, पतली छरहरी थी वो काया।।।

“सुषमा मलिक”

LEAVE A REPLY