ठुमरी की रानी चिर मौन हुईं

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अस्सी वर्षीय शास्त्रीय एवं उप शास्त्रीय संगीत की सम्राज्ञी गिरिजा देवी उर्फ अप्पा का 24 अटूबर को कोलकाता में निधन हो गया । ये ठुमरी गायन में सुविख्यात थीं। इनका जन्म 8 मई 1929 को सकलडीहा जो कि अब चंदौली जिला में है (पहले वाराणसी में था), जमींदार रामदेव राय के घर  हुआ था। दो वर्ष की अल्पायु में ये बनारस चली आईं ।

बनारस के कबीरचौरा में इनका निवास रहा जहाँ पर पंडित कंठे महाराज, प0 किशन महाराज, हनुमान प्रसाद, बड़े रामदास, राम सहाय तथा राजन – साजन जैसे प्रसिद्ध शास्त्रीय गायकों, संगीतकारों और कई फनकारों का निवास है। पिता ने इन्हें छोटी उम्र में घुड़सवारी सिखाई फिर चार साल की उम्र में ही शास्त्रीय संगीत की कठोर साधना इन्होंने पंडित सरजू प्रसाद मिश्र से लेनी प्रारम्भ कीं। सारनाथ में अकेले रहकर इन्होंने अपनी संगीत साधना जारी रखी। 15 वर्ष की उम्र में मधुसूदन जैन से विवाह हुआ तदुपरान्त ये अपनी पुत्री को अपनी माँ को सौंपकर संगीत साधना में लगी रहीं। श्री चंद के रूप में इनको गुरु मिले जो प्रात: 3:30 बजे ही अभ्यास कराना शुरू कर देते थे। सिर्फ 20 साल की उम्र में ही इनकी कला का प्रदर्शन इलाहाबाद के रेडियो स्टेशन से 1949 में हुआ, फिर तो इन्होंने पेशेवर संगीतकार के रूप में अपना कैरियर प्रारम्भ किया।

इनके यह सब करने से घर में पिता और पति के आलावा कोई भी खुश नहीं था। फिर भी इनके कदम रुके नहीं । बनारस घराने की तान/चैती, ठुमरी, टप्पा जैसी तमाम विधाओं में इन्होनें महारत हासिल की। मशहूर रचनाकार श्री सुधीर सिंह ‘सुधाकर’ के शब्दों में, “शास्त्रीय संगीत की गंगा आज उदास है क्योंकि दिखता नहीं कोई ठुमरी के आसपास है” ।
एक फिल्म में इन्होंने अभिनय भी किया था। इनको 1972 में पद्मश्री,1989 में पद्म भूषण तथा 2016 में पद्म विभूषण मिला था। इनके जाने के साथ ही ‘ठुमरी की बादशाहत’ चली गई।

इनका साहित्य से वास्ता इन्हीं के शब्दों में,
“मुझे अपने दम पर जीवन जीने की व्यवस्था कभी नही करनी पड़ी। यहाँ तक की साधारण चीजें जैसे बिलों का भुगतान भी मेरी जिम्मेवारी नहीं थी। अचानक यह मेरी जिम्मेवारी बन गई । मैंने प्रदर्शन रोक दिया। पर दोस्तों और प्रशंसकों के आग्रह के पश्चात मैं मंच पर वापस आई। फिर मैंने गायन में  कविता और गीतों के महत्व को समझने का प्रयास किया। रस की अभियक्ति मेरी रचनाओं का प्राथमिक ध्यान बन गया। मैंने प्यार के विभिन्न रूपों को अपने कठिन परिश्रम से गायिकी के रूप में प्रस्तुत किया।कृष्ण की कहानियों पर आधारित मेरी ठुमरी मेरे अभ्यास का केंद्र बिंदु बन गया। मैंने ठुमरी गायन के पूरे रंग को बदलने का फैसला किया। ठुमरी को एक माध्यम के रूप में मैंने सोचा था, जिससे मैं खुद को अभिव्यक्त कर सकती हूँ। प्रेम ,लालसा और भक्ति की भावनाएं ठुमरी का एक अभिन्न हिस्सा हैं और मैंने सोचा की सही प्रकार के संगीत के साथ मैं गीत को जीवित कर सकती हूँ। यह सम्भव है कि गानों को एक भौतिक रूप दिया जाये।”

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय समेत कई संगीत शिक्षण संस्थाओं से अंत तक जुड़ी रहीं । इनकी नातिन अनन्या दत्ता अन्तिम पल में भी इनके साथ थीं । माँ एवं दादा का विरोध भी इनके पैर में बेड़ी नहीं डाल सका । संगीत के सार्वजनिक मंचों को अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाती रहीं अन्तिम समय तक । इनके निधन की खबर से संगीत जगत में अवर्णनीय शोक व्याप्त हो गया । ऐ ठुमरी ! तुझे अब सँवारेगा कौन !
ठुमरी की रानी हुईं चिर मौन !!

अवधेश कुमार ‘अवध’

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