“३ तलाक़”…

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हिंदुस्तान ने भी आज़ाद किया आज तुमको तलाक़
तलाक़,…..तलाक़,…..तलाक़,…… तीन तलाक़…

जुदाई के छोटे तीन शब्द तलाक़, तलाक़, तलाक़
कहकर महिलाओं का, ख़ूब हुआ अबतक मज़ाक़

होते हो ख़ुश तुम तीन बार इन शब्दों को कहकर
मन मेरा भी भर गया है देखो अब ये सुन सुन कर

झूल रहे थे हम अब तक इस शब्दों के बवंडर में
लटक रहा था रिश्ता हमारा, धर्म के आडंबर में

कभी सोचा है तलाक़ सुनकर क्या बीतेगी मुझपर
कैसे रह पाऊँगी इस समाज में अकेली जीवन भर

खा जाएगी एक दिन मेरे इन आँसुओ की आग
तब तुम छोडोगे कहना ये तीन तलाक़ का राग

तकलीफ़ में थी ‘तलाक़’ से, अपनी ‘मुस्लिम’ बहेने
बिछड़ने नही आती, वो आती हमेशा तुम संग रहेने

पहेल किसी ने की तभी इन माताओं को न्याय मिला
अदालत की कारवाई को सुन आज हर चहेरा खिला

ऋणी रहेगा समाज प्रशासन व सर्वोच्चन्यायालय का
फिर कही आवाज़ न रहे ‘राज’ इस देश में तलाक़ का

✍? राज मालपाणी.. ( शोरापुर-कर्नाटक )

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