विराट’ का ‘अग्निकुञ्ज’

0
35

IMG_20171119_144952 IMG-20171021-WA0003 (1)

पुस्तक का नाम – अग्निकुञ्ज (काव्य संग्रह)
रचनाकार – श्री श्रीमन्नारायणचारी ‘विराट’
प्रकाशक एवं मुद्रक – उत्कर्ष प्रकाशन
आई एस बी एन – 978-93-87289-००-०
मूल्य – रुपये 150 मात्र

माता – पिता को समर्पित कवि ‘विराट’ विरचित अग्निकुञ्ज 35 छंदों में 52 रचनाओं का गुलदस्ता है । भारतीय साहित्य की गौरवमयी परम्परा का पालन देवार्चना के साथ किया गया । तेलुगू मूल का रचनाकार पूर्ण विनय के साथ भाषाई सहानुभूति का पात्र बनने से मना करके आत्मबल का परिचय देता है ।

भारतीय संस्कृति, सभ्यता, प्रथा, परम्परा, गौरवशाली अतीत और यथार्थ वर्तमान के बीच जीता है कवि । पड़ोसी देशों द्वारा बार – बार छले जाने कर कवि – हृदय विद्रोह कर उठता है –
‘विराट रूप धार लो, प्रकीर्ति विश्व व्याप्त हो,
कुरीति नीतियाँ यहाँ, सदा – सदा समाप्त हो,
स्वधर्म शक्तिमान हो, अधर्म हेतु याग हो,
प्रभास हास वास हो, सुदेह ही प्रयाग हो ।’

कवि की नज़र में नारी सजी – धजी पराश्रित गुड़िया नहीं होनी चाहिए । नारी हेतु कवि के सुझाव देख सकते हैं-
‘सज – धजकर श्रृंगार ही नहीं,
धरना है तलवार ।
जैसे   झासी   की रानी ने,
धरकर किया प्रहार ।
तूँ लक्ष्मी, भारती, भवानी,
तूँ रखना अभिमान ।
नारी तो जीवन आधारी,
नारी शक्ति महान ।’

आन्तरिक गद्दारों से त्रस्त होकर भारतीय प्रधानमन्त्री मोदी जी का आह्वान करते हुए कहता है कवि –
‘बीन बजाना छोड़ो मोदी, अब तो अस्त्रों को धरना ।
पाक चीन तो बहुत दूर हैं, प्रथम स्वच्छ घर को करना ।।’

कवि ने छन्द के परिमाण पर अधिक ध्यान दिया है, परिणाम स्वरूप लगातार छंदों में परिवर्तन अटकाव उत्पन्न करता है । मापनी आधारित मात्रिक छंदों में कवि की प्रौढ़ता देखी जा सकती है जबकि ताटंक, लावणी या चौपाई जैसे छंदों में मात्रिक संयोजन में कुछ कमजोरियाँ हैं । वार्णिक छंद में भाव पक्ष कला पक्ष को पीछे ढकेल देता है । शब्दों के चयन में कवि का अधिकार सराहनीय है । लिंग एवं वचन में कुछेक जगहों पर त्रुटि है परिलक्षित है ।
काव्य के सफलीभूत होने के लिए भाव पक्ष एवं कला पक्ष को समानान्तर चलना चाहिए, चले भी हैं किन्तु कहीं – कहीं आगे -पीछे हो जाने से कुछ अभाव जनित है ।

‘भारत मेरा देश है, भोग रहा अभिशाप ।
पर भाषा की घात से, हिन्दी करे विलाप ।।,
हिन्दी के प्रति अगाध प्रेम, राष्ट्रीयता की भावना, समग्र समन्वय की सोच छंदों पर मजबूत पकड़, निर्मल भाव की अविरल धारा एवं बर्फीले व्यक्तित्व की छाप, विराट अग्निकुञ्ज का अक्षय अक्षुण्ण परिचय है । ज़र्रे – ज़र्रे पर पाठक एवं श्रोता को स्वयं के होने का अहसास होना ही रचनाकार की मजदूरी है । गुरुजनों के प्रति विनम्रता, बड़ों के प्रति कृतज्ञता एवं छोटों के प्रति सहृदयता अग्निकुञ्ज की प्राण वायु है ।

समीक्षक
अवधेश कुमार ‘अवध’
मेघालय

LEAVE A REPLY