यात्रा श्रीनाथ धाम की (संस्मरणात्मक यात्रा वृतान्त)

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वैष्णव मत के पुष्टि मार्ग या बल्लभ सम्प्रदाय के भक्ति योग के इष्ट भगवान श्रीनाथ जी के विषय में मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण बाल्यावस्था में ब्रजधाम स्थित गिरिराज गोवर्धन जतीपुरा (मथुरा) उ0 प्र0 से नाथद्वारा (राजस्थान) में पधारे थे । मैंने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि मुझे भगवान श्रीनाथ जी के बाल्य रूप के दर्शन मिलेंगे । 15 सितम्बर 2017 को वह शुभ घड़ी आई और मुझे भगवान श्रीनाथ जी के दर्शन प्राप्त हुए ।
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डाॅ0 चन्द्रपाल मिश्र ‘‘गगन’’ ने जो मेरे गुरु हैं, हाल ही में एक काव्यकृति ‘हम ढलानों पर खड़े हैं’ का प्रकाशन ’अयन प्रकाशन, महरौली (दिल्ली)’ से कराया था । प्रकाशन से पूर्व मेरे उनके बीच पुस्तक के लोकार्पण पर छुटपुट चर्चा होती रहती थी, पुस्तक प्रकाशन के बाद ये चर्चाएं तेज होने लगीं । इसी दौरन डाॅ0 गगन जी के एक अन्य शिष्य की माताश्री (श्रीमती) मधूलिका एवं पिताश्री श्री सुबोध कुमार गर्ग जी ने उन्हें सुझाव दिया कि आप नाथद्वारा (राज0) के भारत विख्यात मंच साहित्य-मण्डल श्री नाथद्वारा से अपनी पुस्तक का लोकार्पण कराएँ, वहाँ देश-विदेश के साहित्यकारों का प्रतिवर्ष महाकुम्भ लगता है, आपकी कृतियाँ मामूली नहीं हैं। रचनाओं को विद्वानों तक पहुँचाने के लिए मधूलिका जी ने दो महानुभावों से सम्पर्क करने का सुझाव दिया, पहला राव मुकुल मानसिंह जी का और दूसरा वरिष्ठ पत्रकार, साहित्य मर्मज्ञ रसज्ञ, आकाशवाणी के वरिष्ठ उद्घोषक डाॅ0 श्रीकृष्ण ‘शरद’ जी का। डाॅ0 शरद भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा ब्रजभूमि के साथ-साथ भगवान बराह की अवतार भूमि आदिवराह क्षेत्र स्थित सन्त तुलसीदास तथा उनके भ्राता अष्टछाप के कवि नन्द दास की जन्मभूमि सूकरक्षेत्र (सोरों) कासगंज में रहकर समाज सेवा एवं पत्रकारिता तथा साहित्यिक क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान निरन्तर देते रहते हैं। इकहत्तर वर्ष की आयु में भी आपके अन्दर अद्भुत फुर्ती है, बात करने का अन्दाज एकदम निराला है, लगता है कि हम रेडियो ही सुन रहे हैं। डाॅ0 गगन जी भी समीप में ही रहते हैं, मधूलिका जी के मन की बात डाॅ0 गगन जी ने डाॅ0 शरद जी से साझा की । डाॅ0 शरद जी ने पुस्तक लोकार्पण हेतु प्रारम्भिक तैयारी हेतु निर्देशन दिया, तब तक हालांकि डाॅ0 शरद जी से मेरा पहले कभी साक्षात्कार नहीं हुआ था। डाॅ0 गगन जी और डाॅ0 शरद जी का संवाद लोकार्पण के विषय में जारी था।

डाॅ0 गगन जी से मिलने मैं उनके आवास पर आया था, तभी डाॅ0 शरद जी से मिलवाने की बात कही, मैं भी इस महान व्यक्तित्व से मिलने के लिए काफी समय से उत्सुक था, नाम तो बहुत पहले से सुन रखा था, मिलने का अवसर मिल रहा था तो उत्सुकता कई गुना बढ़ गई। डाॅ0 शरद जी के घर के सामने खडे़ होकर जोर से आवाज लगाई ‘पंडित जी’ डाॅ0 शरद जी तत्काल मकान की पहली मंजिल से दौड़ते हुए नीचे आए, उनके मुख मण्डल पर खुशी की रश्मियाँ सहज ही पढ़ी जा सकती थीं। हमने उनको सादर अभिवादन किया। हृदय से मिले डाॅ0 शरद जी, बातों से गुलाब झर रहे थे। मैं बहुत प्रभावित हुआ। डाॅ0 शरद जी की बातों से लगा कि डाॅ0 गगन जी की पुस्तक का लोकार्पण नाथद्वारा में सौ फीसदी सुनिश्चित है तो मन ही मन मैंने भी डाॅ0 गगन जी के साथ जाने का निर्णय कर ही लिया।

साहित्य के क्षेत्र में मेरी गहरी रुचि थी। डाॅ0 गगन जी की प्रेरणा से दो बार आकाशवाणी आगरा से एवं एक बार आकाशवाणी दिल्ली से कविता-पाठ प्रसारित हो चुकी थी मेरी। कच्छप गति से कलम भी चल रही थी। डाॅ0 गगन जी के काव्य संग्रह ‘हम ढलानों पर खड़े हैं’ का लोकार्पण साहित्य मण्डल श्रीनाथ द्वारा का साक्षी बनने का सौभाग्य मिलना मुझे अन्दर से रोमांचित कर रहा था। साहित्य मण्डल श्रीनाथ द्वारा के प्रधानमंत्री श्री श्याम प्रकाश देवपुरा जी का आदेश पाते ही डाॅ0 गगन जी ने कहा ‘‘अगर तुमको कोई परेशानी न हो तो चलो कुछ नया सीखने को मिलेगा’’। इतना सुनते ही मैं खुशी से झूम उठा, प्रत्युत्तर में हाँ कहने के लिए भी मैं निःशब्द था। फिर मैंने अपनी प्रबल इच्छाओं पर नियंत्रण करते हुये बात 10 अगस्त 2017 तक के लिए टाल दी, ये कहकर कि धर्मपत्नी श्रीमती अर्चना से पूँछ लूँ। श्रीनाथ जी के दर्शन के साथ-साथ झीलों की नगरी उदयपुर, अकबर व महाराणा प्रताप का युद्ध स्थल, हल्दी घाटी व मेवाड़ की धरती के पर्यटन का लालच भी साथ में धर्मपत्नी को दे दिया। मुझे सन्देह था कि कहीं केवल नाथद्वारा का प्रस्ताव धर्मपत्नी को पसन्द न आए और श्रीनाथ जी की नगरी देखने के अवसर पर ग्रहण न लग जाए। थोड़ा ना-नुकुर के बाद धर्मपत्नी ने हाँ कह दी, जैसा कि आम तौर पर महिलाओं की आदत होती है। डाॅ0 गगन जी को तत्काल दूरभाष पर पत्नी के भी साथ चलने की बात बताई तो प्रसन्नता व्यक्त कर बोले, ‘‘श्रीनाथ जी जिसको बुलाऐंगे वो स्वयं भी चाहे तो रुक नहीं पाऐगा’’। डाॅ0 गगन जी ने अपनी बेटी तुल्य रेखा और उनके पति गगनेश जी को भी तैयार कर लिया था। टेंशन एक ही था कि निमंत्रण-पत्र में दावत एक आदमी की थी और चल दिये सात। इस विषय पर जब डाॅ0 शरद जी से चर्चा हुई तो उन्होंने हर्ष व्यक्त करते हुए कहा अच्छा है सब लोग जाओ, श्रीनाथ जी के दर्शन करो और प्रसाद पाओ, उन्होंने बताया कि ‘बी’ पार्ट में परिवारीजन रुक सकते हैं । ‘ए’ पार्ट में साहित्यकारों के ठहरने का इन्जताम रहता है। हमारे सपनों को उड़ने के लिए मानो पंख मिल गये हों। भगवान श्रीनाथ जी के दर्शन की आस मन में लिए 14 सितम्बर 2017 यानि हिन्दी दिवस की हमने उल्टी गिनती गिनना शुरु कर दिया। तय कार्यक्रम के अनुसार 11 सितम्बर 2017 से 13 सितम्बर 2017 तक उदयपुर में रुककर घूमना-फिरना था शेष 14 सितम्बर से 16 सितम्बर तक श्रीनाथ जी की नगरी में रहनकर साहित्य मण्डल श्री नाथद्वारा के कार्यक्रमों में प्रतिभाग करना था।

सब लोग निश्चिन्त थे, चिन्ता की लकीरें मेरे माथे पर थीं क्योंकि मैं अपने विद्यालय का हैडमास्टर हूँ और मेरे हिसाब से उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद में हैडमास्टर का मतलब होता है हैडेक मास्टर। सोमवार को फलों की दुकान सजाओ, बुधवार को दूधिया बन जाओ, हलवाई तो रोज बनना ही है। घर पर साग-सब्जी, तेल-मसाला न हो तो चलेगा पत्नी तकलीफ समझ सकती है। लेकिन विद्यालय में किसी कमी के लिए माफी शब्द विभागीय अधिकारियों के शब्दकोष में नहीं है। डेªस वाला विधायक जी की धमकी देकर ड्रेस पटक गया, यही बटेगी नहीं तो भुगतना। छोटे-बड़े नाप के चक्कर में बच्चे जान खा रहे हैं, बैग वितरण भी अभी होना है, किताबें तो पूरे सत्र में तीन-चार बार बँटती हैं। फिर भी आपूर्ति पूरी नहीं होती, अभी कुछ बाँटने को शेष बची हैं। मध्याह्न भोजन कैसे बने राशन बीस दिन पहले ही खत्म हो गया, उधार लेकर काम चलाया जा रहा है। शिक्षा मित्रों का टिकिट माननीय उच्चतम न्यायालय ने जल्दी ही काटा है। सारी जिम्मेदारी हैडमास्टर के सिर पर है, अकेला चना क्या भाड़ फोडे़गा। 10 सितम्बर का ही रात्रि 9 बजे मेबाड़ एक्सप्रेस में रिजर्वेशन था। कासगंज से मथुरा की यात्रा कार से तय करनी थी। 10 सितम्बर से 16 सितम्बर तक कुल आठ दिन का सफर था। लगेज भारी होना स्वाभाविक था, जैसे-तैसे विद्यालय की व्यवस्थाएं करके भगवान श्रीनाथ जी का स्मरण करते हुए विद्यालय की चिन्ता छोड़ मैंने लक्ष्य की ओर ध्यान केन्द्रित किया। डाॅ0 गगन जी ने 9 सितम्बर को ही डाॅ0 शरद जी से आवश्यक जानकारियाँ हासिल कर सारे सम्पर्क सूत्र डायरी में लिख लिये। कार द्वारा हम सभी ने मथुरा को प्रस्थान किया। धर्मपत्नी की उत्सुकता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि घर से निकलते वक्त नाश्ते के सामान वाला थैला घर पर ही भूल आयीं थीं। श्रीनाथ जी की कृपा कहिए कि कासगंज पार नहीं हुआ था कि याद आ गया, उनकी उत्सुकता की कीमत शहर के जाम से बचने के लिए बीस रुपये रिक्शा वाले को अदा कर और धूप झेलकर चुकानी पड़ी मुझे। खैर! सफर शुरु हुआ, बातचीत मंे मथुरा कब आ गया पता ही नहीं चला। गन्तव्य समय से पूर्व प्लेटफार्म संख्या 1 पर थे हम, जैसे ही घड़ी में 8.55 हुए गाड़ी का प्लेटफार्म बदलने की घोषणा होने लगी, सुनते ही हाथ-पाँव फूल गये, इतना सामान लेकर तीन नम्बर प्लेटफार्म पर कैसे जाएं ? एक बार मन हुआ कि पटरी पार कर बदल लें किन्तु बच्चे और महिलाओं का ख्याल आते ही साहस बटोर कर उपरिगामी पुल से प्लेटफार्म नम्बर 3 पर पहुँच गये। भारतीय रेलवे विभाग भी कमाल का है। गाड़ी 3 नम्बर पर उद्घोषित हो रही थी, किन्तु आई 2 नम्बर पर। जैसे-तैसे भाग दौड़ कर गाड़ी में स्थान लिया। जैसे ही गाड़ी ने रफ्तार पकड़ी हमने भी कल्पनाओं के पंख लगाकर उड़ना शुरु किया। प्रातः 6 बजे उदयपुर स्टेशन पर थे हम लोग।

भारतीय इतिहास में मेवाड़ साम्राज्य का जिक्र आते ही शरीर के रोम-रोम में हलचल सी पैदा हो जाती है, मेवाड़ एकमात्र साम्राज्य था जिसने तत्कालीन आतताइयों की दासता स्वीकार नहीं की, अपने बलिदान, स्वाभिमान और सम्मान के लिए मेवाड़ साम्राज्य इतिहास में याद किया जाता है। भक्ति की पर्याय भगवान श्रीकृष्ण की दिवानी मीराबाई का नाम, अपने पुत्र का बलिदान मेवाड़ की रक्षार्थ करने वाली पन्नाधाय को इतिहास भुला दे ये भी सम्भव नहीं। मेवाड़ के अनेक राजाओं की वीर-गाथा जानने के लिए सर्वप्रथम हमने होटल के कमरे में सामान रखने के बाद सिटी पैलेसे की ओर रुख किया। इस पैलेस में महाराणाओं की वीरता, पराक्रम का यशगान सुनाई देता है, उनके रण-कौशल, शानो शौकत व जीने के रंग-ढंग दिखाई पड़ते हैं। गणेश चैक से प्रारम्भ होकर मानक महल, भीम विलास, कृष्ण विलास, मोतीमहल (पर्ल पैलेस), शीश महल, चीनी चित्रशाला, दिलकुश महल, बड़ी महल, रंग भवन (मोर चैक) एवं लक्ष्मी विलास सभी एक से बढ़कर एक थे। सिटी पैलेस भ्रमण के उपरान्त हमने जगदीश मंदिर के दर्शन किए और गुलाब बाग होते हुए पिछौला झील पहुँचे ।

दूर बादलों में लुका-छिपी करता छिपता हुआ लाल गोल सूर्य बार-बार अपनी सूरत उस झील के प्रतिबिम्बी पानी में निहारता, फिर रुई जैसे बादलों के विस्तर में छुप जाता। लाल-लाल किरणें नावों के आवागमन से उठ रही तरंगों से अठखेलियाँ कर रही थीं। झील के किनारे बैठकर हमने झील के शान्त पानी की चंचल लहरों में मचलती किरणों का प्रेमालाप देखा। सज्जनगढ़ का किला के लिए दुर्गम पहाड़ी रास्ता था। जैसे-जैसे टैक्सी से ऊपर की ओर जा रहे थे, नीचे का दृश्य देखकर साँसे अटक रही थीं, ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों और गहरी-गहरी खाइयों के बीच यात्रा रोमांचकारी थी, डर क्या होता है, उस रास्ते ने बताया। इस किले से बादलों को अपने नजदीक ही पाते हैं अधिक ऊँचाई पर होने के कारण। इनके अलावा फतेह सागर झील का भ्रमण भी हमने किया।

सभी राज्य सरकारें यदि राजस्थान की तरह ही महिलाओं को परिवहन निगम के किराये में छूट दें तो महिलाओं के उत्थान के लिए उपयोगी होगा। समाज में लैंगिक भेद-भाव की जो आग फैली है इस प्रकारकी राहतें पानी की बौछार का काम करेंगी उस पर। शिक्षा व रोजगार के लिए दूर-दराज यात्रा करने वाली माँ, बहिनों को प्रोत्साहन आवश्यक है। महिला सशक्तीकरण के यज्ञ में राजस्थान सरकार द्वारा दी गई आहूति से हमारी सरकार अगर सीख लें तो महिलाओं के विकास के साथ-साथ सरकार का भी कम फायदा नहीं होगा। उत्तर प्रदेश में ब्रज क्षेत्र तो पर्यटन का केन्द्र है, यहाँ भी इस तरह की सुविधाऐं होनी चाहिए। हम लोग 13 सितम्बर 2017 को जब उदयपुर रोडवेज बस स्टैण्ड पहुँचे तो नाथद्वारा की एक टिकिट पुरुषों के लिए 60 रुपये जबकि महिलाओं के लिए मात्र 45 रुपये की थी।

बस में बैठते ही सूर्यदेव की तपन कम करने के लिए इन्द्रदेव ने बादलों का आदेश दिया, थोड़ी देर में देखते ही देखते काली घटाएं घिर आईं। दोनों ओर पहाड़ियों के बीच जैसे-जैसे बस का एक्सीलरेटर दब रहा था। घटाओं की घनघोरता तीव्र होती जा रही थी। पहाड़ों के ऊपर भूरे काले रुई जैसे बादल खेलने लगे। बारिश होने लगी, बादलों और पहाड़ों के प्रेम अलाप हुआ, परणति सुखद स्वाभाविक थी। भीगे पहाड़, भीगी वनस्पतियाँ, मानो गगन के घन! धरा का जलाभिषेक करते हुए आनन्दित हो रहे थे। बादल भी दूर नहीं थे, पहाड़ भी नजदीक थे। सड़क पर जगह-जगह पानी का भराव हो गया था, जैसे ही बस तेज रफ्तार से पानी के ऊपर से गुजरती पानी फब्बारे की तरह एक लय में दूर छिटक जाता था, मन बस से उतर कर भीगने का कर रहा था। बस की रफ्तार भी कम हो गई थी, मौसम के आनन्द ने ये अहसास ही नहीं होने दिया कि कब नाथद्वारा का बस स्टैण्ड आ गया। आॅटो द्वारा साहित्य मण्डल के लिए निकले, सड़के जल मग्न थीं, गलियों-कूचों में निहारा तो आँखों मेें निराली सी चमक थी, लगने लगा कि हम साक्षात ब्रज में आ गये हैं। गौ-माता गलियों में विचरण कर रही थीं। कान्हा की नगरी की प्रतिलिपि था नाथद्वारा। ब्रज में नाथद्वारा और नाथद्वारा में ब्रज, वही कुंज गलियाँ वैसे ही लोग। ब्रज की गंध अनायास ही तन और मन दोनों को प्रसन्न कर रही थी। श्री का अर्थ राधा और नाथ का मतलब श्रीकृष्ण अर्थात जब राधा और कृष्ण का वास है यहाँ तो समानताएं भी तो स्वाभाविक थीं। साहित्य मण्डल के कार्यक्रम में शामिल होने वाले अतिथियों के लिए आरक्षित स्थान पर पहुँच कर अपना सामान जमाया।

साहित्य मण्डल के प्रधानमंत्री श्री श्याम प्रकाश देवपुरा जी से मिलने मैं और डाॅ0 गगन जी सामने की विशाल इमारत में बने आॅफिस में पहुँच कर ‘‘श्याम प्रकाश देवपुरा जी से भेंट करनी है’’ कुर्सी पर बैठे व्यक्ति से पूछा। उस व्यक्ति ने कुर्सी पर बैठने को कहा, ‘‘कहिए मैं ही श्याम देवपुरा हूँ’’। हमने इस उत्तर की उम्मीद ही नहीं की थी। हमारे ख्याल में श्याम प्रकाश देवपुरा बहुत सशक्त कद काठी के रौबदार व्यक्ति होंगे। इतना सरल व्यक्ति इतने बडे़ पद पर आसानी से गले से उतरने वाली वास्तव में थी ही नहीं। आफिस में अलमारी, मेज, बैड इधर-उधर जिधर भी दृष्टि गई किताबें ही किताबें थीं। ‘‘फेसबुक के प्रोफाइल पर तो कोई और ही फोटो है’’, डाॅ0 गगन जी ने प्रश्न किया, सहज भाव से अपने पूज्य पिताजी की दीवार पर टंगी तस्वीर की ओर इशारा करते हुए बाऊजी का है सारा काम, उन्ही के नाम से उन्हीं के आशीर्वाद से है। डाॅ0 गगन जी ने बताया ‘‘ मैं डाॅ0 गगन कासगंज से, डाॅ0 शरद जी ने फोन किया होगा, पुस्तक लोकार्पण हेतु आपका निमंत्रण था’’। डाॅ0 शरद जी नाम सुनते ही उनके हृदय और मुखमण्डल के कमल-दल खिल गये मानो। तुरन्त पीछे अलमारी से ‘‘हम ढलानों पर खडे़ हैं’’ काव्यकृति की पाँचों प्रतियाँ उठाकर दिखाते हुए ये देखो, डाॅ0 शरद जी का फोन आते ही मैंने पुस्तकें निकालकर अलग रखी हैं।

डाॅ0 शरद जी ने चलते समय कहा था कि जहाँ ठहरोगे उसी के सामने हरी भाई चाय वाले की दुकान है, मेरा परिचय देना चाय अच्छी मिलेगी। जैसा बताया वैसा ही पाया। बाजार एकदम नजदीक था, सोचा बाजार की रौनक देखी जाए, घूमे खूब। बाजार दुल्हन की तरह सज रहा था। देखते ही बनता था निगाह जहाँ रुकी, रुकी ही रह गई। मेरा बेटा बड़ा प्रसन्न था खिलौनों की दुकान पर अड़ गया। कभी गेंद-बल्ला, कभी दूरबीन कहता, कभी ट्रेक्टर कभी क्रेन तो कभी खिलौनों में ही खो जाता, नाम तक नहीं जानता था कुछ खिलौनों के। पत्नी कपड़ों व पर्सों की दुकानों में व्यस्त दिखीं, सब अपने-अपने मतलब का सामान तलाश रहे थे, मैं भगवान श्रीनाथ जी की एक तस्वीर लेना चाहता था। डाॅ0 गगन जी ने बताया कि डाॅ0 शरद जी ने चलते समय बताया था कि नाथद्वारा में पण्डित जी दूध वाले हैं, वहाँ दूध पीना, काफी तलाश के बाद पंडित जी मिले, बड़ी-बड़ी मूँछो वाले, काफी लम्बे चैड़े, दूध फेंट रहे थे एक हाथ कंधे से ऊपर खूब ऊँचा, एक जाँघ से नीचे दोनों में बर्तन, ऐसे जैसे दूध की धार एक बर्तन ये दूसरे को जोडे़ थी, ऊपर-नीचे, नीचे-ऊपर दूध फेंटने के कार्य से मुक्त होकर हमारी सुध ली। डाॅ0 शरद जी का परिचय देते ही पंडित जी ने ‘वही मथुरा आकाशवाणी वाले शरद जी! आइये! आइये!’ कहकर विनम्रता पूर्वक सत्कार किया। गऊ-दूध पिया, मन भर गया मानों अमृत पी लिया हो।

भगवान श्रीनाथ जी के दिव्य दर्शन के लिए जैसे ही हम लोग मन्दिर की ओर चले, भक्तों की भारी भीड़ में चलना मुश्किल था, द्वार पर पहुँच कर अपने जूते-चप्पल उतार कर मन्दिर परिसर में दाखिल हुए। महिलाएँ अलग गेट से प्रवेश पा रहीं थीं, इसलिए पत्नी और हम अलग-अलग हो गये, बेटा मेरे साथ था, कपाट बन्द थे, सीढ़ियों पर ही बैठकर लोग इन्तजार कर रहे थे, जैसे ही कपाट खुले तो पीछे से दर्शनार्थियों का सैलाब इतना था कि कुछ ही सैकेण्ड में हमको भगवान श्रीनाथ जी की छवि दूर से दिखने लगी थी, बेटा भीड़ में दबा जा रहा था, छोटा था ऊँचे कद के लोगेां के सामने होने से वह नाथ जी को निरख नहीं पा रहा था। मैंने कंधों पर दोनों पैर आगे की ओर निकालते हुए बैठा लिया, अब दोनों लोग आराम से भगवान की श्री विग्रह का दर्शन कर रहे थे, धीरे-धीरे हम श्रीनाथ जी के सम्मुख थे। भव्य मूरत नख से सिर तक सुन्दरता ही सुन्दरता आँखों में बस गये श्रीनाथ जी। भीड़ के रैले में पाँव स्थिर न रह सके। जितनी देर भी वहाँ रहे कभी आगे कभी पीछे कभी दाऐं तो कभी बाएं। शरीर ने कितनी गतियाँ की गिनना मुमकिन न था, परन्तु मन और आँखे श्रीनाथ जी के साथ एक डोर की तरह बँधे रहे । दिव्य मूर्ति बोल बोल पडे़गी ऐसा प्रतीत होता था।

श्री नाथद्वारा से 22 किमी. की दूरी पर हल्दी घाटी है। जहाँ महाराणा प्रताप और अकबर के बीच युद्ध लड़ा गया। यहाँ एक अत्याधुनिक संग्रहालय देखा जिसमें महाराणा प्रताप के जीवन से सम्बन्धित दृश्य लाइट्स और साउण्ड के माध्यम से दिखाये गये। पास ही एक पार्क भी है जिसमें महाराणा स्मारक है। नाथद्वारा की दो ही शान हैं, जहाँ तक मैंने अनुभव किया पहली भगवान श्रीनाथ जी और दूसरी उनके परम भक्त साहित्य व समाजसेवी स्व0 भगवती प्रसाद देवपुरा जी। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन साहित्य सेवा को समर्पित कर दिया। उनकी मेहनत और लगन का ही परिणाम था कि प्रभात फेरी में जिस भाव से पूरा नगर अपनी सहभागिता कर रहा था, दर्शनीय थी। मैं उस पल का साक्षी बना ये मेरे लिए सौभाग्य के क्षण थे। बाजार में दुकानदार और ग्राहक दोनों अपनी सुधियाँ खोकर प्रभात फेरी के आँखों से ओझल होने तक मूर्तिवत देख रहे थे। आगे-आगे बैण्ड बाजा, हिन्दी का जयगान करते स्कूली बच्चे और थिरकते साहित्यकारों का अभिनन्दन करने पूरा नगर उमड़ पड़ा था।

प्रभातफेरी के बाद देश-विदेश की जानी मानी पत्रिकाओं, पुस्तकों की प्रदर्शनी लगी। डाॅ0 भगवती प्रसाद देवपुरा की अमूल्य धरोहर पुस्तक सूरसागर और सम्पादित पत्रिका हरसिंगार को देखकर मैं धन्य हो गया। ब्रजभाषा और हिन्दी के उत्थान की साधना जो डाॅ0 देवपुरा जी ने उनकी पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं में अमिट स्याही से सदैव अंकित रहेगी तथा शोधार्थियों को प्रेरणा एवं एक नई ऊर्जा प्रदान करती रहेगी।

डाॅ0 भगवती प्रसाद देवपुरा द्वारा स्थापित पुस्तकालय अनूठा है, मैंने अपने जीवन मेें हिन्दी साहित्य का इतना बड़ा संग्रह, वो भी व्यक्तिगत रूप से किया गया, कभी नहीं देखा। साधारण व्यक्ति के वश का काम नहीं था यह। अष्ट छाप कक्ष निर्माण में ब्रजभाषा के प्रति उनका सहज समर्पण प्रतिबिम्बित था। स्वरचित पाण्डुलिपियाँ, मोती जैसे अक्षरों में थी। साहित्यकार कक्ष भी अवलोकनीय था।

साहित्य मण्डल परिवार द्वारा देश के विभिन्न कोनों से आमंत्रित किये गये माँ भारती के सपूत हिन्दी और ब्रजभाषा के सेवक अग्रणी साहित्यकारों का सम्मान डाॅ0 देवपुरा जी की शुरु की हुई परम्परा भी अपनी आँखों से देखी। ‘‘ट्रू मीडिया’’ सम्पादक श्री ओऽम प्रकाश प्रजापति, पूर्व डी.जी.पी. डाॅ0 महेश चन्द्र द्विवेदी, डाॅ0 नीरजा द्विवेदी, डाॅ0 विक्रम सिंह, डाॅ0 अनिल गहलौत ‘भैया जी’, डाॅ0 आग्नेय एवं श्री वीरेन्द्र लोढ़ा आदि साहित्यकारों का सम्मान उत्तरी पहनाकर, मन्दिर का प्रसाद, श्रीनाथजी की मनमोहक तस्वीर और प्रशस्ति-पत्र भेंट कर किया गया। हिन्दी के विकास के सन्दर्भ में विभिन्न दृष्टिकोण भी पत्रों के माध्यम से विभिन्न साहित्यकारों द्वारा प्रस्तुत किये गये।

‘ट्रू मीडिया’ चैनल की पत्रिका के अंक का लोकार्पण साहित्य मण्डल के भव्य मंच से हुआ, जिसमें श्री ओम प्रकाश प्रजापति ने हिन्दी भाषा उत्थान एवं साहित्यकार सम्मान के प्रणेता डाॅ0 देवपुरा के विषय को उकेरा है। डाॅ0 चन्द्रपाल मिश्र गगन की मनोवैज्ञानिक कसौटी पर खरी रचनाओं एवं ब्रजभाषा के छन्दों से परिपूर्ण काव्य संग्रह ‘हम ढलानों पर खड़े हैं’ का लोकार्पण भी डाॅ0 अमर सिंह वधान, विट्ठल पारीक, हरीलाल मिलन डाॅ0 अमी आधार निडर एवं करतार योगी की गरिमामयी उपस्थिति में हुआ। दोनों शाम कवि सम्मेलनों से रंगीन रही। जिसमें काव्य प्रेमी साहित्यकारों ने अपनी सहभागिता की। डाॅ0 उमाशंकर ‘साहिल’ अजीम अंजुम, देवी प्रसाद पाण्डेय, डाॅ0 गगन आदि ने अपनी रचनाओं से मंत्रमुग्ध किया। साहित्य मण्डल परिवार के मुखिया श्री श्याम प्रकाश देवपुरा जी के प्रबन्धन की प्रशंसा करनी पडे़गी क्योंकि इतना भव्य आयोजन निर्विघ्न और बड़ी सहजता से सम्पन्न करा देना उनकी क्षमता का द्योतक है, अपने पद का घमण्ड उनको कहीं से स्पर्श नहीं कर पाया था, विनम्रता के सुगंधित पुष्प उनके अंग-अंग से झरते। श्री श्याम प्रकाश देवपुरा के इस प्रबन्धन रथ के सारथी डाॅ0 विट्ठल पारीक कहे जा सकते हैं जिनके अनूठे संचालन से कार्यक्रम अपने चरम विन्दु तक गया। साहित्यकारों के सम्मान में सुबह का नाश्ता, दोपहर व रात का भोजन एवं शाम की चाय, सब में उनके मृदुल व्यवहार एवं मेवाड़ तथा मारवाड़ी महक घुली हुई थी। ऐसा प्रसाद और श्रीनाथ जी की कृपा हम सबको हमेशा मिलती रहे, इसी आशा एवं विश्वास के साथ हम लोग श्रीनाथ द्वारा से मावली जंकशन को रवाना हुए और मधुर स्मृतियों में डूबते-उछलते ब्रजधाम स्थित ग्रह नगर कासगंज आ गये।

नरेन्द्र ‘मगन’
मौहल्ला मण्डी, कस्बा बिलराम
जनपद: कासगंज (उ0 प्र0)

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  1. ट्रू मीडिया की पूरी टीम को हार्दिक धन्यवाद, मेरे दिल की आवाज को पूरी दुनिया में पहुचाने के लिए, साहित्यिक क्षेत्र में आपका योगदान सराहनीय है, आज ऐसी ही पत्रकारिता की आवश्यकता है, सादर अभिवादन

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