“गुरु की महिमा”- 77वीं गोष्ठी

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मन मेरा शीतल हुआ, छू कर गुरु के पांव । 

सत गुरु के सानिध्य मेंमिलती मन को छांव॥
 

पेड़ों की छांव तले  रचना पाठ की 77वीं गोष्ठी आज “गुरु की महिमा ” पर रची बसी भावपूर्ण कविताओं और गीतों के माध्यम से गुरु के प्रति असीम श्रद्धा और आस्था को समर्पित रही । पूर्व की भांति ही चौथे रविवार को निर्धारित यह साहित्यिक गोष्ठी स्ट्रीम यार्ड स्टूडियो के माध्यम से फेसबुक पटल पर देर शाम तक जीवंत रही ।  गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि कहानीकार सुरेन्द्र अरोरा ने निभाई वहीं संचालन को संस्था के संयोजक कवि अवधेश सिंह ने किया । इस अवसर पर साहित्य अकादेमी भारत सरकार के क्षेत्रीय सचिव डॉ देवेन्द्र कुमार देवेश की विशिष्ट उपस्थिती रही । इसे अभूतपूर्व साहित्यिक गोष्ठी में उक्त के अतिरिक्त मृत्युंजय साधक, सुमन साधक, पल्लवी मिश्रा शिखा व मंजू शाक्य ने अपनी रचनाएँ पढ़ कर नयी ऊँचाइयाँ प्रदान की ।

प्रारम्भ में गजलकार गीत कार मृत्युंजय साधक ने माँ सरस्वती के साथ गोष्ठी के लिए माँ का आशीर्वाद मांगा , फिर गुरु पर समर्पित दोहा पढ़ा पढ़ा “ गुरुपूनम के पर्व की अजब अनोखी बात। हर साधक के शीश परस्नेहसिक्त बरसात”। कवि कुल में सभी को प्रेमयुक्त आशीर्वाद देने वाले स्मृति शेष “कुँवर बेचैन जी” को नमन करते गीत पढ़ा “ मुझे मेरे गुरु जी की बहुत याद आती है…. गुरुजी कहीं चले गएन ये चर्चा सुहाती है”.…जिसने एक बार सबकी पलकों को नम कर दिया । 

डॉ देवेन्द्र कुमार  देवेश ने गंभीर कविता “लिफ्ट और जीवन” का पाठ किया , और पढ़ा , “क्या जीवन की असल यात्रा में भी / सारे रास्ते बंद हो जाने के बाद / वांछित रास्ता बतानेवाला / कोई बटन ढूँढ़ पाते हैं हम?। कि तभी चल पड़ती है लिफ्ट / नहीं जानता वह / कहाँ ले जाएगी उसे और / रुकने पर इसके खुलेगा दरवाजा जब जिंदगी का कौन-सा रूप दिखाएगी उसे?  

कवि अवधेश सिंह ने गुरु पर दोहे पढे “सत गुरु सगा न को सखामिलता सदा प्रकाश। मुश्किल में हर हल मिलेहोना नहीं निराश।। फिर कहा “ मन मेरा शीतल हुआछू कर गुरु के पांव । सत गुरु के सानिध्य में मिलती मन को छांव” । इसके साथ ही लंबी कविता “जिंदिगी यदि कविता होती” का वाचन किया 

आभासी मंच पर दिल्ली से पधारी  सशक्त कवयित्री मंजू शाक्य ने गुरु को याद करते कहा “मैं कीकड़ की लकड़ी थी पर मुझको चंदन बना दिया , अपना वरद हस्त रख सिर पर मुझको पावन बना दिया, हाँथ जोड़कर शीश नवाऊँ शत शत नमन करूँ गुरु को, अपने ज्ञान रूपी  पारस से मुझको कुंदन बना दिया”। फिर गीत पढ़ा “ मुझ में लाखों अवगुण फिर भी करो मुझे स्वीकार, गुरू जी तुम हो तारनहार”….. । माँ जीवन की पहली गुरु होती है उसको याद कर एक गीत पढ़ा “लौट आयीं बचपन की यादें आँखें गयीं पसीज़, छुई जब मैके की दहलीज़” और वाह वही लूटी । 

कवयित्री पल्लवी मिश्र शिखा ने अपने गुरु फिजिक्स के प्रोफेसर एचसी वर्मा को याद करते हुए कहा “गुरू-शिष्य परंपरा का कैसे करूं बखान -भारतवर्ष में हुए हैं / गुरू-शिष्य एक से बढ़कर एक महान”…. । फिर गजल पढ़ी “हमें अपने गुरू जैसा कोई फ़ाज़िल नहीं मिलता / कि उनके अंश जितना भी कोई क़ाबिल नहीं मिलता…, और वाह वही प्राप्त की । 

कवयित्री डॉ अंजु सुमन साधक ने भी अपने गुरु को समर्पित गीत पढ़ा “ तू बन अपना संबल, यूँ चलता चल अविरल । आगे के कारज में अपना ध्यान लगा ले, लक्ष्य उन्मुख होकर अपना ज्ञान जगा ले। तू जो चाहे तो ऐसा भी हो सकता है, घोर निराशा के छँट जाएँ बादल।।… यूँ चलता चल अविरल” ।

अध्यक्षता कर रहे कवि कथाकार सुरेन्द्र अरोरा ने गोष्ठी में पढ़ी गईं सभी कविताओं को विषपूरक श्रेष्ठ रचना के रूप में याद किया और सबको अपना आशीर्वाद देते हुए गुरु की महिमा को धर्म से जोड़ते हुए कविता पढ़ी तथा अशिक्षा और जाहिली से बाहर निकालने वाली लघु कथा “जाकिरा” का वाचन किया । 

श्रोताओं में क्रमशः अनीता सिंह , सुधीर कुमार दिवेदी , कपिल देव नगर , राजकुमार रत्नप्रिय वीरेंद्र जटवानी ईश्वर सिंह तेवतिया आदि ने पढ़ी गयी रचनाओं पर अपने विचार प्रकट किए । 

रिपोर्ट- अवधेश सिंह संयोजक संचालक , वैशाली गाजियाबाद से 

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